यह ओजपूर्ण कविता रानी लक्ष्मीबाई के बचपन, संघर्ष, देशप्रेम, युद्ध-कौशल और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्वितीय बलिदान का वर्णन करती है।
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सारांश, व्याख्या और महत्वपूर्ण अध्ययन-बिंदु
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यह कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की अत्यंत प्रसिद्ध वीर-रस प्रधान कविता है। पाठ्यपुस्तक में बताया गया है कि यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है और रानी लक्ष्मीबाई के जीवन, संघर्ष, विद्रोह, वीरता और देशप्रेम को ओजपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है।
कवयित्री परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 1904 में प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में हुआ। वे प्रसिद्ध कवयित्री होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थीं। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाई। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और ओजपूर्ण है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं— मुकुल, त्रिधारा, बिखरे मोती, उन्मादिनी आदि।
कविता का केंद्रीय भाव
इस कविता का मुख्य भाव वीरता, देशभक्ति, स्वतंत्रता-प्रेम और बलिदान है। कवयित्री बताती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई केवल झाँसी की रानी नहीं थीं, बल्कि वे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक शक्ति थीं। उन्होंने अंग्रेजों के अन्याय के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना।
शीर्षक की सार्थकता
“झाँसी की रानी” शीर्षक पूरी तरह सार्थक है क्योंकि कविता का केंद्र रानी लक्ष्मीबाई का जीवन और उनका संघर्ष है। कविता में उनके बचपन, विवाह, शोक, संघर्ष, युद्ध, पराक्रम और बलिदान का क्रमिक वर्णन है। वे झाँसी की असली पहचान बन जाती हैं। इसलिए कवयित्री अंत में कहती हैं कि उनका स्मारक वही स्वयं हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह कविता 1857 की क्रांति से जुड़ी है। उस समय अंग्रेज भारत के अनेक राज्यों पर कब्ज़ा कर रहे थे। डलहौजी की हड़प नीति के अंतर्गत जिन राज्यों का कोई स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं होता था, उन्हें अंग्रेज अपने अधिकार में ले लेते थे। झाँसी के राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने झाँसी को भी हड़पना चाहा। रानी लक्ष्मीबाई ने इसे अन्याय माना और युद्ध किया।
पद्यानुसार भावार्थ / व्याख्या
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में कवयित्री 1857 की क्रांति का वातावरण दिखाती हैं। अंग्रेजों के अत्याचारों से पूरे भारत में क्रोध फैल गया था। राजाओं और राजवंशों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का निश्चय कर लिया था। “बूढ़े भारत में नई जवानी” का अर्थ है कि लंबे समय से गुलामी झेल रहे भारत में फिर से साहस, जोश और स्वतंत्रता की भावना जाग उठी। सबने समझ लिया कि आजादी बहुत मूल्यवान है और अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना आवश्यक है।
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी, वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का वर्णन है। बचपन में उन्हें प्यार से “छबीली” कहा जाता था। वे नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं। वे अपने पिता की अकेली संतान थीं। उनका बचपन सामान्य बच्चों जैसा नहीं था। वे नाना साहब के साथ पढ़ती और खेलती थीं। उन्हें गुड़िया-खिलौनों के बजाय बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे शस्त्र प्रिय थे। उन्हें शिवाजी जैसे वीरों की गाथाएँ याद थीं। इससे स्पष्ट होता है कि वे बचपन से ही साहसी और वीर स्वभाव की थीं।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार, महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
यहाँ कवयित्री लक्ष्मीबाई की वीरता को देवी-शक्ति के समान बताती हैं। वे कहती हैं कि लक्ष्मीबाई मानो लक्ष्मी या दुर्गा का रूप थीं। उनकी तलवारबाजी देखकर मराठे भी प्रसन्न और रोमांचित हो उठते थे। उन्हें नकली युद्ध करना, युद्ध की योजना बनाना, शिकार खेलना, सेना को घेरना और किले तोड़ना प्रिय था। उनके आराध्य रूप में भवानी देवी थीं। इस पद्यांश से रानी की युद्ध-कला, रणनीति और असाधारण साहस का परिचय मिलता है।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में, सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में लक्ष्मीबाई के विवाह और झाँसी आगमन का वर्णन है। उनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। उनके आने से झाँसी में आनंद और उल्लास छा गया। कवयित्री कहती हैं कि जैसे वीर अर्जुन को योग्य संगिनी मिली थी और जैसे शिव को भवानी मिली थीं, वैसे ही झाँसी को लक्ष्मीबाई जैसी वीर रानी मिली। यहाँ रानी के आगमन को झाँसी के लिए सौभाग्य माना गया है।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं, रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई, निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में झाँसी के सुखद समय के बाद आए दुख का वर्णन है। रानी के आने से राजमहल में खुशियाँ थीं, लेकिन भाग्य ने अचानक करवट ली। राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई और रानी विधवा हो गईं। राजा की कोई संतान भी नहीं थी, इसलिए झाँसी के भविष्य पर संकट आ गया। “तीर चलाने वाले कर में चूड़ियाँ कब भाईं” का अर्थ है कि वीर रानी के हाथ युद्ध के लिए बने थे, केवल असहाय होकर दुख सहने के लिए नहीं। यह पद्यांश करुणा और आने वाले संघर्ष की भूमिका तैयार करता है।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया, फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया, अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में अंग्रेजों की हड़प नीति का संकेत है। राजा की मृत्यु के बाद डलहौजी को झाँसी पर अधिकार करने का अवसर मिल गया। अंग्रेजों ने झाँसी के किले पर अपना झंडा फहरा दिया। “लावारिस का वारिस” का अर्थ है कि अंग्रेजों ने झाँसी को बिना उत्तराधिकारी का राज्य बताकर उस पर कब्जा कर लिया। रानी ने आँसू भरी आँखों से देखा कि उनकी अपनी झाँसी पराई हो गई। यहाँ अंग्रेजों के अन्याय और रानी के दुख को दिखाया गया है।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया, रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में अंग्रेजों की चालाकी और विस्तारवादी नीति का वर्णन है। अंग्रेज पहले भारत में व्यापारी बनकर आए थे और दया चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सत्ता पर कब्जा करना शुरू कर दिया। डलहौजी ने अपनी नीति से भारतीय राज्यों को हड़पना शुरू किया। उसने राजाओं और नवाबों तक को अपमानित किया। रानी को अंग्रेजों ने अधीन बनाना चाहा, लेकिन वही रानी आगे चलकर संघर्ष की महान नायिका बन गईं। यहाँ अन्याय के विरुद्ध रानी के आत्मसम्मान का संकेत है।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात, कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात, उदैपुर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात, जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात, बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में कवयित्री बताती हैं कि अंग्रेजों का अत्याचार केवल झाँसी तक सीमित नहीं था। उन्होंने दिल्ली, लखनऊ, नागपुर, सतारा, पंजाब, बंगाल, मद्रास आदि अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। भारतीय राजाओं और राज्यों की शक्ति को कमजोर किया जा रहा था। इस पद्यांश से पता चलता है कि अंग्रेजों की नीति पूरे भारत को अपने अधीन करने की थी। यह पूरे देश में फैले राजनीतिक संकट को दिखाता है।
रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार, उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार, सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार, ‘नागपुर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’, यों परदे की इज़्ज़त पर- देशी के हाथ बिकानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में अंग्रेजों द्वारा राजघरानों के अपमान का वर्णन है। रानियाँ और बेगम दुखी थीं क्योंकि उनके गहने-कपड़े तक बाजारों में नीलाम किए जा रहे थे। अंग्रेजों के अखबार खुलेआम इन नीलामियों की घोषणा करते थे। इससे राजपरिवारों की प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुँचती थी। “परदे की इज़्ज़त” से तात्पर्य स्त्रियों और राजघरानों की मर्यादा से है। यह पद्यांश अंग्रेजी शासन की क्रूरता और अपमानजनक व्यवहार को दिखाता है।
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान, वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान, हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में स्वतंत्रता-संग्राम की तैयारी दिखाई गई है। झोपड़ियों में आम जनता दुख झेल रही थी और महलों में अपमान था। सैनिकों के मन में अपने वीर पूर्वजों का गर्व जाग रहा था। नाना साहब युद्ध की तैयारी कर रहे थे और रानी लक्ष्मीबाई ने रणचंडी के रूप में संघर्ष का आह्वान किया। “सोई ज्योति जगानी थी” का अर्थ है कि लोगों के भीतर सोई हुई स्वतंत्रता और वीरता की भावना को जगाना था। यह पद्यांश जन-जागरण को दिखाता है।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी, झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं, मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
यहाँ कवयित्री बताती हैं कि स्वतंत्रता की भावना केवल राजमहलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि झोपड़ियों तक भी फैल गई। आम जनता और शासक वर्ग दोनों अंग्रेजों के विरुद्ध जाग उठे। झाँसी, दिल्ली, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, पटना, जबलपुर और कोल्हापुर जैसे स्थानों पर विद्रोह की लहर फैल गई। “स्वतंत्रता की चिनगारी” का अर्थ है आजादी की वह छोटी शुरुआत, जो आगे चलकर बड़ी ज्वाला बन गई। यह पद्यांश राष्ट्रीय एकता और विद्रोह के प्रसार को दिखाता है।
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम, लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में 1857 के स्वतंत्रता-संग्राम के वीरों का उल्लेख है। नाना साहब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और कुँवर सिंह जैसे वीरों ने देश के लिए अपना योगदान दिया। कवयित्री कहती हैं कि उनके नाम भारत के इतिहास में अमर रहेंगे। उस समय अंग्रेजों की दृष्टि में उनका संघर्ष “जुर्म” था, लेकिन वास्तव में वह देश के लिए महान बलिदान था। यह पद्यांश स्वतंत्रता-सेनानियों के सम्मान और गौरव को व्यक्त करता है।
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में, लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में, जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
अब कवयित्री अन्य वीरों की चर्चा छोड़कर फिर झाँसी के युद्ध-मैदान की ओर आती हैं। रानी लक्ष्मीबाई वीर योद्धाओं के बीच स्वयं वीर योद्धा की तरह खड़ी थीं। लेफ्टिनेंट वॉकर अंग्रेज सैनिकों के साथ आया। रानी ने तलवार निकालकर उसका सामना किया। युद्ध में वॉकर घायल होकर भाग गया और उसे रानी की वीरता पर आश्चर्य हुआ। यह पद्यांश रानी की युद्ध-कुशलता और निर्भीकता को दिखाता है।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार, यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार, अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में रानी के झाँसी से कालपी और फिर ग्वालियर तक के संघर्ष का वर्णन है। रानी ने बहुत लंबी दूरी तय की। उनका घोड़ा थककर गिर गया और मर गया। इसके बाद भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी। यमुना के किनारे अंग्रेजों को फिर हार का सामना करना पड़ा। रानी ने आगे बढ़कर ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। सिंधिया अंग्रेजों का मित्र था, इसलिए उसने राजधानी छोड़ दी। यह पद्यांश रानी के साहस, धैर्य और निरंतर संघर्ष को दिखाता है।
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं, युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी, पर, पीछे ह्यू रोज आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में रानी की विजय के बाद फिर अंग्रेजों की सेना के आक्रमण का वर्णन है। इस बार जनरल स्मिथ सामने था, लेकिन उसे भी हार का सामना करना पड़ा। रानी की सखियाँ काना और मंदरा भी युद्ध में उनके साथ थीं और उन्होंने बहादुरी से युद्ध किया। तभी पीछे से ह्यू रोज की सेना आ गई और रानी चारों ओर से घिर गईं। यह पद्यांश युद्ध की कठिन स्थिति और रानी की वीर सखियों के साहस को दिखाता है।
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार, किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार, घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार, घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में रानी के अंतिम युद्ध का वर्णन है। चारों ओर से घिरने के बाद भी रानी ने हार नहीं मानी। वे शत्रु सेना को काटती हुई आगे बढ़ीं, लेकिन सामने एक नाला आ गया। उनका नया घोड़ा नाले को पार करने में रुक गया। इतने में शत्रु सैनिक आ पहुँचे। रानी अकेली थीं और शत्रु बहुत अधिक थे। फिर भी वे वीरता से लड़ती रहीं। अंत में वे घायल होकर सिंहनी की तरह धरती पर गिर पड़ीं और वीरगति को प्राप्त हुईं। यह पद्यांश अत्यंत वीरतापूर्ण और भावुक है।
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस पद्यांश में रानी की वीरगति के बाद उनके महान व्यक्तित्व का वर्णन है। कवयित्री कहती हैं कि रानी की चिता भी मानो उनकी दिव्य सवारी बन गई। वे तेजस्वी थीं और सचमुच तेज की अधिकारी थीं। उनकी आयु केवल तेईस वर्ष थी, फिर भी उनका कार्य असाधारण था। कवयित्री उन्हें साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि अवतारी शक्ति मानती हैं। वे भारत को स्वतंत्रता के लिए जगाने आई थीं। उन्होंने देशवासियों को साहस, स्वाभिमान और बलिदान की सीख दी।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी, तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
अंतिम पद्यांश में कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि देती हैं। वे कहती हैं कि भारतवासी रानी के बलिदान को सदा याद रखेंगे। उनका बलिदान स्वतंत्रता की भावना को हमेशा जगाता रहेगा। चाहे इतिहास मौन हो जाए, चाहे सच्चाई को दबाने की कोशिश की जाए, चाहे अंग्रेज झाँसी को मिटा दें, फिर भी रानी की स्मृति अमर रहेगी। रानी स्वयं अपना स्मारक हैं, क्योंकि उनका जीवन और बलिदान ही उनकी अमिट निशानी है।
पूरी कविता का समग्र भाव
यह कविता रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, आत्मसम्मान, देशभक्ति और बलिदान की गाथा है। कवयित्री ने रानी को केवल झाँसी की शासिका नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की प्रेरक नारी के रूप में प्रस्तुत किया है। कविता हमें सिखाती है कि अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए और देश की स्वतंत्रता के लिए साहस, एकता और त्याग आवश्यक हैं।
कविता का सरल सारांश
कविता में रानी लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर उनके वीरगति प्राप्त करने तक की कथा कही गई है। बचपन में उनका नाम लक्ष्मीबाई था और वे नाना साहब के साथ पढ़ती-खेलती थीं। सामान्य लड़कियों की तरह गुड़ियों से खेलने के बजाय उन्हें बरछी, ढाल, तलवार, कृपाण और युद्ध-कला प्रिय थी। विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं। राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने झाँसी पर अधिकार करने की कोशिश की। रानी ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने वीर सैनिकों और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर युद्ध किया। कालपी और ग्वालियर तक उन्होंने अंग्रेजों का सामना किया। अंत में वे वीरगति को प्राप्त हुईं, पर उनका बलिदान भारतवासियों के लिए अमर प्रेरणा बन गया।
रानी लक्ष्मीबाई का चरित्र-चित्रण
रानी लक्ष्मीबाई का व्यक्तित्व बहुत प्रेरणादायक है। वे बचपन से ही साहसी, तेजस्वी और आत्मविश्वासी थीं। उन्हें युद्ध-कला, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणनीति में रुचि थी। वे अन्याय के सामने झुकी नहीं। पति की मृत्यु और झाँसी पर अंग्रेजी कब्ज़े के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे कुशल योद्धा, योग्य शासक, देशभक्त, स्वाभिमानी और बलिदानी थीं। इसलिए कवयित्री ने उन्हें “वीरता की अवतार” और “स्वतंत्रता नारी” कहा है।
प्रमुख पात्र और उनका महत्व
| पात्र | महत्व |
|---|---|
| रानी लक्ष्मीबाई | कविता की नायिका, वीरता और स्वतंत्रता की प्रतीक |
| नाना धुंधूपंत / नाना साहब | 1857 की क्रांति के प्रमुख नेता |
| डलहौजी | अंग्रेज अधिकारी, हड़प नीति से झाँसी पर अधिकार चाहता था |
| तात्या टोपे | स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा |
| अज़ीमुल्ला | 1857 के संघर्ष से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारी |
| अहमद शाह मौलवी | 1857 के आंदोलन के वीर |
| कुँवर सिंह | स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध योद्धा |
| काना और मंदरा | रानी की वीर सखियाँ |
| वॉकर, स्मिथ, ह्यू रोज | अंग्रेज अधिकारी, जिनसे रानी का संघर्ष हुआ |
| सिंधिया | अंग्रेजों का मित्र, ग्वालियर छोड़कर भाग गया |
प्रमुख घटनाओं की समय-रेखा
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | लक्ष्मीबाई का बचपन और नाना साहब के साथ शिक्षा-खेल |
| 2 | युद्ध-कला, तलवारबाजी और वीरगाथाओं में रुचि |
| 3 | झाँसी के राजा गंगाधर राव से विवाह |
| 4 | राजा की मृत्यु और झाँसी पर संकट |
| 5 | डलहौजी द्वारा झाँसी हड़पने की कोशिश |
| 6 | रानी का अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष |
| 7 | 1857 की क्रांति का प्रसार |
| 8 | झाँसी, कालपी और ग्वालियर में युद्ध |
| 9 | अंतिम युद्ध में रानी का वीरगति प्राप्त करना |
| 10 | रानी का बलिदान अमर प्रेरणा बन जाना |
पाठ्यपुस्तक में भी इस कविता को कथात्मक कविता बताया गया है, जिसमें लक्ष्मीबाई के बचपन से वीरगति तक की घटनाएँ क्रम से आती हैं।
महत्वपूर्ण पंक्तियों का भाव
“बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी”
इसका अर्थ है कि लंबे समय से पराधीन भारत में फिर से विद्रोह, साहस और स्वतंत्रता की भावना जाग उठी।
“बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी”
यह पंक्ति बताती है कि लक्ष्मीबाई बचपन से ही वीर और युद्ध-कला में रुचि रखने वाली थीं।
“बुझा दीप झाँसी का”
इसका भाव है कि राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झाँसी की आशाएँ धूमिल हो गईं।
“महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी”
यह पंक्ति बताती है कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजाओं का नहीं था, बल्कि आम जनता भी इसमें शामिल थी।
“अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी”
रानी की कम उम्र के बावजूद उनका साहस, बलिदान और नेतृत्व इतना महान था कि कवयित्री उन्हें दिव्य शक्ति के समान मानती हैं।
कविता की भाषा और शैली
कविता की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और ओजपूर्ण है। इसमें लोकगीत जैसी गेयता है। बार-बार आने वाली पंक्तियाँ — “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…” — कविता को गीतात्मक और यादगार बनाती हैं। कविता की शैली कथात्मक है क्योंकि इसमें घटनाएँ कहानी की तरह क्रम से आगे बढ़ती हैं।
काव्य-सौंदर्य
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| रस | वीर रस मुख्य है; करुण रस भी कुछ स्थानों पर है |
| भाव | देशभक्ति, साहस, स्वाभिमान, बलिदान |
| शैली | कथात्मक और ओजपूर्ण |
| भाषा | सरल, प्रभावशाली, लोकधर्मी |
| अलंकार | उपमा, रूपक, अनुप्रास, अतिशयोक्ति |
| टेक | बार-बार आने वाली पंक्तियाँ कविता को लय और प्रभाव देती हैं |
अलंकार के उदाहरण
| अलंकार | उदाहरण / संकेत | अर्थ |
|---|---|---|
| रूपक | रानी को दुर्गा, लक्ष्मी, रणचंडी जैसा कहा गया | रानी की वीरता को देवी-शक्ति के रूप में दिखाया गया |
| उपमा | सिंहनी के समान रानी का गिरना | रानी की निर्भीकता दिखाई गई |
| अनुप्रास | “खूब लड़ी मर्दानी” | ध्वनि-सौंदर्य और लय |
| अतिशयोक्ति | “सिंहासन हिल उठे” | क्रांति के प्रभाव को तीव्र रूप में दिखाना |
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| फिरंगी | अंग्रेज / विदेशी |
| मर्दानी | बहादुर, वीर |
| छबीली | सुंदर, तेजस्वी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली |
| बरछी | छोटा भाला |
| ढाल | वार रोकने का हथियार |
| कृपाण | तलवार |
| कटारी | छोटी तलवार / खंजर |
| गाथा | वीरों की कहानी या प्रशंसा-गीत |
| अवतार | दिव्य रूप |
| दुर्ग | किला |
| बिरानी | पराई |
| बिसात | हैसियत, क्षमता |
| निपात | विनाश, पतन |
| बेजार | दुखी |
| कृतज्ञ | उपकार मानने वाला |
| अविनाशी | जिसका नाश न हो |
| स्मारक | याद दिलाने वाला चिन्ह या स्थान |
कविता का संदेश
कविता हमें सिखाती है कि अन्याय और अत्याचार के सामने झुकना नहीं चाहिए। देश की स्वतंत्रता के लिए साहस, त्याग और एकता आवश्यक है। रानी लक्ष्मीबाई का जीवन यह संदेश देता है कि उम्र, लिंग या परिस्थिति किसी व्यक्ति की शक्ति को सीमित नहीं कर सकती। सच्चा साहस व्यक्ति को अमर बना देता है।
परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु
कविता की कवयित्री — सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता का विषय — रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
मुख्य रस — वीर रस
शैली — कथात्मक और गेय
रानी का बचपन — नाना साहब के साथ पढ़ना-खेलना, युद्ध-कला में रुचि
अंग्रेजों की नीति — हड़प नीति
मुख्य संदेश — देशभक्ति, स्वाभिमान, साहस और बलिदान
सबसे प्रसिद्ध पंक्ति का भाव — रानी ने असाधारण वीरता से युद्ध किया और अमर हो गईं।
अभ्यास और पुनरावृत्ति
संपूर्ण प्रश्नोत्तर और भाषा-अभ्यास
प्रश्न, उत्तर, तर्क, काव्य-बोध, व्याकरण तथा गतिविधियाँ मूल अध्ययन सामग्री के क्रम में दी गई हैं।
मौलिक अध्ययन-मार्गदर्शिका: NCERT Hindi Tutor · ncerthinditutor.com
मेरे उत्तर मेरे तर्क
प्रश्न 1. ‘झाँसी की रानी’ कविता की पंक्ति “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” में ‘नई जवानी’ शब्द किस भाव को व्यक्त करता है?
(ख) विद्रोह की चिंगारी
“नई जवानी” का अर्थ है कि गुलामी से दुखी भारत में फिर से जोश, साहस और संघर्ष की भावना जाग उठी थी। लोगों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना पैदा हो गई थी। इसलिए यह विकल्प उचित है।
प्रश्न 2. लक्ष्मीबाई को ‘छबीली’ कहना उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(ख) शोभायुक्त
“छबीली” शब्द का अर्थ है सुंदर, तेजस्वी, आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली। लक्ष्मीबाई बचपन से ही तेजस्वी और आकर्षक व्यक्तित्व की थीं। इसलिए यह उत्तर उचित है।
प्रश्न 3. “बुझा दीप झाँसी का” पंक्ति का भावार्थ है-
(ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
इस पंक्ति से राजा गंगाधर राव की मृत्यु की ओर संकेत है। राजा के निधन से झाँसी का सहारा समाप्त हो गया और राज्य पर संकट आ गया। इसलिए “बुझा दीप झाँसी का” का सबसे सटीक भावार्थ राजा की मृत्यु है।
प्रश्न 4. “इस स्वतंत्रता – महायज्ञ में कई वीरवर आए काम” पंक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन की किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
(ग) 1857 की क्रांति
कविता में रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला, कुँवर सिंह आदि वीरों का उल्लेख है। ये सभी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे। इसलिए यह पंक्ति 1857 की क्रांति की ओर संकेत करती है।
प्रश्न 5. “व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया” पंक्ति में ‘यह’ शब्द किसके लिए कहा गया है?
(घ) ब्रिटिश राज के लिए
अंग्रेज भारत में पहले व्यापारी बनकर आए थे, लेकिन बाद में उन्होंने शासन करना शुरू कर दिया। उन्होंने भारतीय राजाओं और नवाबों को भी अपमानित किया। इसलिए यहाँ ‘यह’ शब्द ब्रिटिश राज या अंग्रेजी सत्ता के लिए प्रयुक्त हुआ है।
मेरी समझ मेरे विचार
प्रश्न 1. ‘झाँसी की रानी’ कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसरों से किस प्रकार भिन्न था?
कविता के आधार पर लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल नकली युद्ध करना, व्यूह रचना करना, शिकार खेलना, सेना को घेरना और दुर्ग तोड़ना थे। उन्हें बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे शस्त्र बहुत प्रिय थे।
उनका बचपन सामान्य बच्चों से अलग था। वे गुड़िया-खिलौनों से खेलने के बजाय युद्ध-कला और शस्त्रों से जुड़ी गतिविधियों में रुचि रखती थीं। वे नाना साहब के साथ पढ़ती और खेलती थीं तथा वीर शिवाजी की गाथाएँ उन्हें याद थीं। इससे पता चलता है कि वे बचपन से ही साहसी, वीर और स्वाभिमानी थीं।
प्रश्न 2. “किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई” पंक्ति के माध्यम से किस घटना की ओर संकेत किया गया है?
इस पंक्ति के माध्यम से राजा गंगाधर राव की मृत्यु और रानी लक्ष्मीबाई के विधवा होने की घटना की ओर संकेत किया गया है। झाँसी में पहले सुख और सौभाग्य का वातावरण था, लेकिन अचानक दुख का समय आ गया। राजा की निःसंतान मृत्यु के कारण झाँसी राज्य पर भी संकट छा गया। इसी दुख और संकट को कवयित्री ने “काली घटा” कहा है।
प्रश्न 3. “महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी” पंक्ति समाज के विभिन्न वर्गों की एकता को दर्शाती है, इस एकता का स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में क्या महत्व है?
इस पंक्ति का अर्थ है कि स्वतंत्रता की भावना केवल राजमहलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि झोपड़ियों में रहने वाली आम जनता भी अंग्रेजों के विरुद्ध जाग उठी थी। राजा, रानी, सैनिक और सामान्य जनता—सभी के मन में अंग्रेजी शासन के प्रति क्रोध था।
स्वतंत्रता संग्राम में ऐसी एकता बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि विदेशी शासन से मुक्ति केवल एक वर्ग के संघर्ष से संभव नहीं थी। जब समाज के सभी वर्ग एक साथ खड़े हुए, तब स्वतंत्रता आंदोलन को शक्ति, विस्तार और जनसमर्थन मिला।
प्रश्न 4. “सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार” पंक्ति में ‘नीलाम छापते’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? यह भी बताइए कि किसकी नीलामी की जाती थी और क्यों?
“नीलाम छापते” शब्द अंग्रेजों द्वारा अखबारों में नीलामी की सूचना छापने की ओर संकेत करता है। अंग्रेज जिन भारतीय राज्यों पर अधिकार कर लेते थे, वहाँ के राजघरानों की संपत्ति, गहने और कपड़े जब्त कर लेते थे।
कविता में नागपुर के जेवर और लखनऊ के नौलखा हार की नीलामी का उल्लेख है। इन वस्तुओं को कलकत्ता के बाजारों में बेचा जाता था। ऐसा अंग्रेज भारतीय राजघरानों को अपमानित करने और उनकी संपत्ति पर कब्जा करने के लिए करते थे।
प्रश्न 5. “अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी” पंक्ति में ‘अवतारी’ शब्द व्यक्ति के विशेष गुणों की ओर इंगित कर रहा है। कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के किन गुणों के कारण उनको ‘अवतारी’ कहा गया है?
लक्ष्मीबाई को ‘अवतारी’ इसलिए कहा गया है क्योंकि उनमें असाधारण साहस, वीरता, आत्मसम्मान, देशभक्ति और नेतृत्व-शक्ति थी। वे बहुत कम उम्र में ही अंग्रेजों जैसी शक्तिशाली सत्ता से भिड़ गईं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।
वे कुशल योद्धा थीं, तलवार चलाना जानती थीं और युद्ध-नीति में निपुण थीं। उन्होंने अपने राज्य, सम्मान और देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों का बलिदान दे दिया। केवल तेईस वर्ष की आयु में इतना महान कार्य करने के कारण कवयित्री ने उन्हें साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि अवतारी शक्ति के समान बताया है।
विधा से संवाद
कविता में कहानी
समय-रेखा / टाइमलाइन
| क्रम | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1. | लक्ष्मीबाई का बचपन कानपुर के नाना साहब के साथ बीता। वे नाना के साथ पढ़ती और खेलती थीं। |
| 2. | बचपन से ही उन्हें बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी, नकली युद्ध, शिकार, व्यूह-रचना और दुर्ग तोड़ने जैसे खेल प्रिय थे। |
| 3. | लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। |
| 4. | झाँसी में खुशियाँ छा गईं, पर कुछ समय बाद राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। |
| 5. | राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने झाँसी को लावारिस राज्य बताकर उस पर अधिकार करने की कोशिश की। |
| 6. | डलहौजी ने हड़प नीति के आधार पर झाँसी राज्य पर कब्जा करना चाहा। |
| 7. | रानी ने अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का निश्चय किया। |
| 8. | 1857 की क्रांति की चिंगारी झाँसी, दिल्ली, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, पटना आदि स्थानों तक फैल गई। |
| 9. | नाना साहब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी, कुँवर सिंह आदि वीरों ने स्वतंत्रता-संग्राम में भाग लिया। |
| 10. | रानी ने झाँसी के मैदान में अंग्रेज अधिकारी वॉकर का सामना किया और उसे घायल होकर भागना पड़ा। |
| 11. | रानी कालपी पहुँचीं और आगे चलकर ग्वालियर पर अधिकार किया। |
| 12. | अंग्रेजों ने फिर से रानी को घेर लिया। रानी ने वीरता से युद्ध किया। |
| 13. | अंतिम युद्ध में रानी घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुईं। |
| 14. | रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतवासियों के लिए अमर प्रेरणा बन गया। |
विषयों से संवाद
साझा साथ / साझा संघर्ष
प्रश्न 1. “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”, ब्रिटिश राज किस नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था ? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस नीति के विषय में लिखिए।
ब्रिटिश राज हड़प नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था। इसे अंग्रेज़ी में Doctrine of Lapse कहा जाता है। यह नीति लॉर्ड डलहौजी ने अपनाई थी।
इस नीति के अनुसार यदि किसी भारतीय राजा की मृत्यु बिना वास्तविक उत्तराधिकारी के हो जाती थी, तो अंग्रेज उस राज्य को अपने अधिकार में ले लेते थे। कई बार गोद लिए हुए पुत्र को भी वे उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर देते थे। झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को अंग्रेजों ने उत्तराधिकारी नहीं माना और झाँसी पर अधिकार करने की कोशिश की। इसी कारण कविता में कहा गया है— “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।”
प्रश्न 2. इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा शिक्षक की सहायता से 1857 की क्रांति में उनके योगदान के विषय में लिखिए।
| क्रम | वीर / वीरांगना | 1857 की क्रांति में योगदान |
|---|---|---|
| 1. | रानी लक्ष्मीबाई | झाँसी की रक्षा के लिए अंग्रेजों से वीरतापूर्वक युद्ध किया। कालपी और ग्वालियर तक संघर्ष किया और अंत में वीरगति प्राप्त की। |
| 2. | नाना धुंधूपंत / नाना साहब | कानपुर क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। वे पेशवा वंश से जुड़े प्रमुख नेता थे। |
| 3. | तात्या टोपे | वे कुशल सेनानायक थे। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब के साथ मिलकर अंग्रेजों से युद्ध किया। |
| 4. | अज़ीमुल्ला | वे नाना साहब के सहयोगी और चतुर रणनीतिकार थे। उन्होंने क्रांति की योजना और संगठन में सहायता की। |
| 5. | अहमद शाह मौलवी | उन्होंने अवध और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को संगठित किया। |
| 6. | ठाकुर कुँवर सिंह | उन्होंने बिहार के जगदीशपुर क्षेत्र में 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया। वे वृद्ध अवस्था में भी अंग्रेजों से लड़े। |
| 7. | काना और मंदरा | ये रानी लक्ष्मीबाई की वीर सखियाँ थीं। कविता में इनके युद्ध-क्षेत्र में रानी के साथ लड़ने का उल्लेख है। |
| 8. | झलकारी बाई | वे रानी लक्ष्मीबाई की विश्वसनीय सहयोगी थीं। उन्होंने रानी का रूप धारण कर अंग्रेजों को भ्रमित किया और रानी को सुरक्षित निकलने में सहायता की। पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त पाठ में भी उनके साहस का उल्लेख है। |
प्रश्न 3. यह कविता जिस समय और परिवेश में लिखी गई है, उसमें युद्ध और अन्य साहसिक कार्य करना सामान्यतः पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वर्तमान में लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्षेत्र दिए गए हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाली स्त्रियों के नाम और उनके विषय में लिखिए। आप चाहें तो इसमें अपनी समझ के अनुसार कुछ और कार्यक्षेत्र भी जोड़ सकते हैं।
| कार्यक्षेत्र | स्त्री का नाम | उनके विषय में जानकारी |
|---|---|---|
| 1. दमकल केंद्र / फायर ब्रिगेड | हर्षिनी कान्हेकर | उन्हें भारत की पहली महिला फायर इंजीनियरों में गिना जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहस और सेवा के कार्य केवल पुरुषों तक सीमित नहीं हैं। |
| 2. रेलगाड़ी चालक | सुरेखा यादव | वे भारत की पहली महिला लोको पायलट मानी जाती हैं। उन्होंने रेलगाड़ी चलाकर महिलाओं के लिए नए अवसरों का मार्ग खोला। |
| 3. खेल के विभिन्न क्षेत्र | एम. सी. मैरी कॉम | वे प्रसिद्ध भारतीय मुक्केबाज़ हैं। उन्होंने विश्व स्तर पर भारत का नाम ऊँचा किया और अनेक पदक जीते। |
| 4. व्यापार और प्रबंधन | किरण मज़ूमदार-शॉ | वे बायोकॉन कंपनी की संस्थापक हैं। उन्होंने व्यापार और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। |
| 5. विज्ञान और तकनीक | टेसी थॉमस | वे भारत की प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं। उन्हें मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। |
| 6. अंतरिक्ष / विज्ञान | कल्पना चावला | वे भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री थीं। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारतीयों को प्रेरित किया। |
| 7. पुलिस सेवा | किरण बेदी | वे भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी थीं। उन्होंने प्रशासन और पुलिस सेवा में महिलाओं की क्षमता को सिद्ध किया। |
प्रश्न 4. कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनेक स्थानों के नाम आए हैं। अपने शिक्षक की सहायता से दिए गए मानचित्र में उन स्थानों / नगरों को चिह्नित करके नाम लिखिए।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
शब्द एक अर्थ अनेक
प्रश्न 1. कविता के संदर्भ में सही अर्थ चुनिए।
| काव्य-पंक्ति | रेखांकित शब्द | कविता के संदर्भ में सही अर्थ |
|---|---|---|
| तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं | तीर | बाण |
| रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई | विधि | विधाता |
| रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में | द्वंद्व | युद्ध |
| हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी | गोलों | तोप से दागने वाले गोले |
| मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी | तेज | आभा / प्रकाश / ओज |
प्रश्न 2. कविता में मानक वर्तनी से भिन्न प्रयोग ढूँढ़कर लिखिए।
कविता में कुछ शब्दों की वर्तनी सामान्य या मानक रूप से थोड़ी भिन्न मिलती है। कवयित्री ने ऐसा प्रयोग कविता की लय, तुक, छंद और भाव-सौंदर्य को बनाए रखने के लिए किया है।
| कविता में प्रयोग | सामान्य / मानक रूप | टिप्पणी |
|---|---|---|
| कानपूर | कानपुर | लय और उच्चारण के प्रभाव के लिए |
| देहली | दिल्ली | पुराने/काव्यात्मक प्रयोग के रूप में |
| बंगाले | बंगाल | तुक और लय के लिए |
| करनाटक | कर्नाटक | उच्चारण को सरल और लयबद्ध बनाने के लिए |
| रजधानी | राजधानी | काव्य-लय के कारण बदला हुआ रूप |
| बँदुले / बुंदेले | बुंदेले | लोक-भाषा और लय का प्रभाव |
चर्चा के बिंदु: कविता में ऐसे प्रयोग इसलिए किए जाते हैं ताकि पंक्तियों की लय बनी रहे, उच्चारण में प्रवाह आए और कविता गीतात्मक लगे। कई बार लोकभाषा, बोलचाल और क्षेत्रीय उच्चारण का प्रभाव भी कविता की भाषा में दिखाई देता है।
मुहावरे
दिए गए मुहावरों का प्रयोग
| काव्य-पंक्ति | प्रयुक्त मुहावरा | अर्थ | नया वाक्य |
|---|---|---|---|
| अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी | मुँह की खाना | हार जाना / पराजित होना | शत्रु ने घमंड में युद्ध किया, पर अंत में उसे मुँह की खानी पड़ी। |
| डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया | पैर पसारना | अपना प्रभाव या अधिकार बढ़ाना | अंग्रेज धीरे-धीरे भारत में पैर पसारने लगे। |
| डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया | काया पलटना | स्थिति पूरी तरह बदल जाना | नई शिक्षा नीति आने से विद्यालय की काया पलट गई। |
| राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया | पैरों ठुकराना | अपमान करना / महत्व न देना | घमंडी व्यक्ति दूसरों की सलाह को पैरों ठुकरा देता है। |
| हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो / सोई ज्योति जगानी थी | सोई ज्योति जगाना | छिपी हुई चेतना या साहस को जगाना | गुरुजी ने विद्यार्थियों के मन में ज्ञान की सोई ज्योति जगा दी। |
| मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी | धूम मचाना | बहुत प्रसिद्धि या हलचल पैदा करना | हमारी टीम ने प्रतियोगिता में जीतकर पूरे विद्यालय में धूम मचा दी। |
सृजन
प्रश्न 1. लक्ष्मीबाई की सखियों काना तथा मंदरा की ओर से लक्ष्मीबाई को एक पत्र लिखिए जिसमें काना तथा मंदरा द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध की रणनीति पर चर्चा की गई हो।
स्थान: झाँसी का किला दिनांक: 15 जून, 1858
आदरणीया रानी लक्ष्मीबाई जी,
सादर प्रणाम।
हम दोनों, आपकी सखियाँ काना और मंदरा, आने वाले युद्ध की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आपसे कुछ बातें साझा करना चाहती हैं। अंग्रेजी सेना झाँसी को घेरने की तैयारी कर रही है, इसलिए हमें बहुत समझदारी, साहस और एकता के साथ युद्ध की योजना बनानी होगी।
सबसे पहले किले के मुख्य द्वारों पर चुने हुए वीर सैनिकों को तैनात किया जाए। किले की ऊँची दीवारों से शत्रु की गतिविधियों पर नज़र रखी जाए। धनुष, तलवार, तोप और अन्य शस्त्रों की व्यवस्था ठीक रखी जाए। भोजन, पानी और औषधियों का पर्याप्त प्रबंध भी आवश्यक है, ताकि लंबे संघर्ष में सैनिकों और जनता को कठिनाई न हो।
हमारा सुझाव है कि महिलाओं की टुकड़ी को भी अलग-अलग मोर्चों पर तैयार रखा जाए। वे घायल सैनिकों की सहायता करें और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध में भी भाग लें। गुप्त संदेश पहुँचाने के लिए विश्वसनीय दूतों को नियुक्त किया जाए। किसी भी सैनिक को बिना संकेत के किले का द्वार नहीं खोलना चाहिए।
महारानी, आपके साहस से हम सभी को शक्ति मिलती है। हम आपके साथ अंतिम क्षण तक खड़ी रहेंगी। हमारा विश्वास है कि यदि हम सब एकजुट रहेंगे, तो अंग्रेजी हुकूमत को कड़ा उत्तर मिलेगा।
आपकी वीर सखियाँ, काना और मंदरा
प्रश्न 2. युद्धपूर्व रात्रि में झाँसी की रानी के मन में अगले दिन की संभावनाओं को लेकर कई तरह के भाव और विचार उठ रहे होंगे। आपके जीवन में भी कई ऐसे क्षण आए होंगे जब आपने मानसिक ऊहापोह का अनुभव किया होगा। ऐसी किसी घटना के विषय में अपनी डायरी में लिखिए।
दिनांक: 10 मार्च, 2026 दिन: मंगलवार समय: रात्रि 9:30 बजे
प्रिय डायरी,
आज मेरा मन बहुत बेचैन है। कल मेरी वार्षिक परीक्षा का पहला पेपर है। पूरे दिन मैंने पढ़ाई की, पर फिर भी मन में यह डर है कि कहीं कोई प्रश्न छूट न जाए। कभी लगता है कि मैंने अच्छी तैयारी कर ली है, तो कभी लगता है कि अभी बहुत कुछ पढ़ना बाकी है।
माँ ने मुझे समझाया कि घबराने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि शांत मन से दोहराई करूँ और समय पर सो जाऊँ। मुझे भी लगता है कि परीक्षा से पहले आत्मविश्वास रखना बहुत जरूरी है। मैंने अपने सभी जरूरी सामान जैसे पेन, पेंसिल, प्रवेश-पत्र और पानी की बोतल रख ली है।
आज मुझे समझ आया कि कठिन समय में मन को संभालना भी एक प्रकार का साहस है। जैसे रानी लक्ष्मीबाई युद्ध से पहले हिम्मत और धैर्य रखती होंगी, वैसे ही मुझे भी अपनी परीक्षा का सामना आत्मविश्वास से करना चाहिए।
अब मैं भगवान से प्रार्थना करके सोने जा रहा/रही हूँ। आशा है कि कल का दिन अच्छा होगा।
तुम्हारा / तुम्हारी _______
गतिविधियाँ
1. शौर्य के समाचार
शीर्षक: झाँसी की रणभूमि में रानी लक्ष्मीबाई का अद्भुत शौर्य
समाचार-वाचन:
नमस्कार। आज के मुख्य समाचार में हम आपको झाँसी की रणभूमि से एक महत्वपूर्ण समाचार दे रहे हैं।
आज झाँसी की रणभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अद्भुत वीरता और शौर्य का परिचय दिया। अंग्रेजी सेना ने झाँसी पर अधिकार करने के उद्देश्य से भारी आक्रमण किया, किंतु रानी लक्ष्मीबाई ने हार मानने के बजाय तलवार उठाकर युद्ध का नेतृत्व किया।
रानी ने अपनी सेना के साथ अंग्रेजों का डटकर सामना किया। युद्धभूमि में उनकी वीरता देखकर सैनिकों में नया उत्साह भर गया। रानी की सखियाँ काना और मंदरा भी उनके साथ युद्ध में उतरीं और उन्होंने भी अंग्रेजी सेना को कड़ा उत्तर दिया।
इसके बाद रानी कालपी पहुँचीं और फिर ग्वालियर पर अधिकार किया। अंग्रेजी सेना ने फिर उन्हें घेर लिया, परंतु रानी ने अंतिम क्षण तक युद्ध किया। वे अकेली होते हुए भी अनेक शत्रुओं से भिड़ीं। अंत में वे वीरगति को प्राप्त हुईं, लेकिन उनका साहस और बलिदान भारतवासियों के लिए अमर प्रेरणा बन गया।
रानी लक्ष्मीबाई ने यह सिद्ध कर दिया कि देश और सम्मान की रक्षा के लिए साहस, आत्मविश्वास और बलिदान आवश्यक हैं। आज पूरा देश उनकी वीरता को नमन कर रहा है।
समाचार समाप्त।
2. ‘हरबोलों’ और हमारी कहानी
प्रश्न: आपके क्षेत्र में अथवा आपकी भाषा में प्रचलित लोकगायक और देशभक्तिपूर्ण गीतों का संकलन तैयार कीजिए।
‘हरबोले’ बुंदेलखंड क्षेत्र के लोकगायक थे। वे वीरों की गाथाएँ गीतों के रूप में गाकर जन-जन तक पहुँचाते थे। इसी तरह भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में लोकगायक देशभक्ति, वीरता और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े गीत गाते हैं। ये गीत हमारी संस्कृति, इतिहास और समाज की स्मृति को जीवित रखते हैं।
देशभक्तिपूर्ण लोकगीतों / लोकगायन परंपराओं का संकलन
| क्रम | क्षेत्र / भाषा | लोकगायन परंपरा / गीत | मुख्य विषय |
|---|---|---|---|
| 1. | बुंदेलखंड | हरबोले / आल्हा गायन | वीरता, युद्ध, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य वीरों की गाथा |
| 2. | उत्तर प्रदेश / मध्य प्रदेश | आल्हा | वीर योद्धाओं का साहस और बलिदान |
| 3. | बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश | बिरहा | लोकजीवन, संघर्ष, देशभक्ति और सामाजिक संदेश |
| 4. | महाराष्ट्र | पवाड़ा | वीर शिवाजी और मराठा वीरों की शौर्य गाथाएँ |
| 5. | राजस्थान | पधारो / वीर-गीत / लोकगाथाएँ | वीरता, स्वाभिमान और बलिदान |
| 6. | पंजाब | वार / ढाडी गायन | वीरता, धर्म, देशभक्ति और बलिदान |
| 7. | हरियाणा / पश्चिमी उत्तर प्रदेश | रागिनी | देशप्रेम, सामाजिक चेतना और वीरता |
| 8. | बंगाल | देशभक्ति लोकगीत | मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता की भावना |
लोकगायक केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि वे समाज को इतिहास, संस्कृति और वीरता से भी जोड़ते हैं। रानी लक्ष्मीबाई की गाथा हरबोलों ने गाकर लोगों तक पहुँचाई, इसलिए उनकी वीरता आज भी जनमानस में जीवित है।
भाषा संगम
‘बहन’ शब्द अन्य भाषाओं में
पाठ में ‘बहन’ शब्द के लिए अनेक भारतीय भाषाओं के शब्द दिए गए हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य भाषाओं में ‘बहन’ के लिए ये शब्द प्रयोग किए जा सकते हैं—
| भाषा | ‘बहन’ के लिए शब्द |
|---|---|
| अंग्रेज़ी | Sister |
| भोजपुरी | बहिनी / बहिन |
| मैथिली | बहिन / बहिनी |
| राजस्थानी | बाई / बहन |
| हरियाणवी | भैण |
| अवधी | बहिनी |
| ब्रज | बहिन |
उपर्युक्त वाक्य को मातृभाषा में लिखिए
मूल वाक्य: “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी।”
हिंदी में: कानपुर के नाना साहब की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी।
भोजपुरी में उदाहरण: कानपुर के नाना साहब के मुँहबोली बहिन ‘छबीली’ रहली।
अंग्रेज़ी में उदाहरण: Chhabili was the adopted sister of Nana Sahib of Kanpur.