कक्षा 9 हिंदी · गंगा · अध्याय 10

भारति, जय, विजयकरे!

कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 10 भारति, जय, विजयकरे! का सारांश, व्याख्या, शब्दार्थ, NCERT प्रश्न उत्तर, भाषा-अभ्यास और वीडियो समाधान।

वीडियो पाठसारांशव्याख्याशब्दार्थसंपूर्ण प्रश्नोत्तर
लेखक / कवि
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
पुस्तक
गंगा
पाठ्यपुस्तक पृष्ठ
166–175
विधा
काव्य
अध्याय 10 के लिए संपूर्ण अध्ययन सामग्री

यह देशभक्ति-गीत भारत माता के प्राकृतिक सौंदर्य, पवित्रता, समृद्धि और राष्ट्र-गौरव का वंदन करते हुए उनकी जय और विजय की कामना करता है।

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वीडियो पाठ

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सारांश, व्याख्या और महत्वपूर्ण अध्ययन-बिंदु

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कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ विधा: देशभक्ति-गीत / स्तुति-गीत मुख्य भाव: भारत माता की महिमा, प्रकृति-सौंदर्य और राष्ट्र-गौरव

1. कविता का सरल परिचय

इस कविता में कवि ने भारत माता को एक देवी के रूप में चित्रित किया है। कवि भारत माता से विजय की कामना करता है और उनके प्राकृतिक सौंदर्य, पवित्रता, उदारता और महानता का वर्णन करता है।

कवि भारत की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संपदा को सुंदर प्रतीकों में दिखाते हैं— भारत माता के चरणों को सागर धो रहा है, गंगा उनके गले का हार है, हिमालय उनका मुकुट है, पेड़-पौधे उनके वस्त्र हैं और खेतों की सुनहरी फसलें उनकी शोभा बढ़ाती हैं।

शीर्षक का अर्थ — भारति, जय, विजयकरे!

भारति का अर्थ यहाँ भारत माता है। जय, विजयकरे का अर्थ है— हे भारत माता! आपकी जय हो, आप हमेशा विजयी हों।

यह शीर्षक कविता के पूरे भाव को प्रकट करता है, क्योंकि पूरी कविता भारत माता की वंदना और उनकी विजय की कामना पर आधारित है।

कविता का केंद्रीय भाव

इस कविता का केंद्रीय भाव है कि भारत माता प्रकृति, संस्कृति, पवित्रता और आध्यात्मिकता से पूर्ण हैं। भारत की धरती धन-धान्य से भरी है। गंगा, हिमालय, सागर, वन, लताएँ और पुष्प भारत माता को दिव्य रूप प्रदान करते हैं। कवि भारत माता की जय और विजय की कामना करता है।

पद्यांशवार व्याख्या / भावार्थ

“भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!”

शब्दार्थ

भारति — भारत माता

जय — जीत, सम्मान

विजयकरे — विजय प्रदान करने वाली / विजयी होने वाली

कनक — सोना

शस्य — फसल

कमलधरे — कमल धारण करने वाली

भावार्थ

कवि भारत माता को संबोधित करते हुए कहते हैं— हे भारत माता! आपकी जय हो, आप विजय प्रदान करें। आप सोने जैसी चमकती फसलों और सुंदर कमलों से सजी हुई हैं। यहाँ कवि भारत की समृद्धि और सुंदरता को दिखा रहे हैं।

विशेष बात: “कनक-शस्य” से भारत की उपजाऊ धरती और कृषि-समृद्धि का संकेत मिलता है।

“लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”

शब्दार्थ

लंका — श्रीलंका

पदतल — चरणों के नीचे / पैरों के पास

शतदल — सौ पंखुड़ियों वाला कमल

गर्जितोर्मि — गर्जना करती हुई लहरें

सागर-जल — समुद्र का जल

शुचि — पवित्र

चरण युगल — दोनों चरण

स्तव — स्तुति, प्रशंसा

बहु-अर्थ-भरे — अनेक अर्थों से भरे हुए

भावार्थ

कवि भारत माता की भौगोलिक स्थिति को सुंदर रूप में दिखाते हैं। लंका भारत माता के चरणों के पास स्थित है। समुद्र की गर्जन करती हुई लहरें उनके पवित्र चरणों को धो रही हैं। ऐसा लगता है जैसे सागर स्वयं भारत माता की स्तुति कर रहा हो।

विशेष बात: यहाँ भारत को देवी के रूप में कल्पित किया गया है और समुद्र को उनके चरण धोने वाला भक्त बताया गया है।

“तरु-तृण-वन-लता वसन, अंचल में खचित सुमन; गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल धार हार गले।”

शब्दार्थ

तरु — पेड़

तृण — घास

वन — जंगल

लता — बेल

वसन — वस्त्र

अंचल — साड़ी का पल्लू / आँचल

खचित — जड़ा हुआ, सजा हुआ

सुमन — फूल

ज्योतिर्जल-कण — चमकते हुए जल-कण

धवल — सफेद, उज्ज्वल

धार — जलधारा

हार — माला

भावार्थ

कवि कहते हैं कि भारत माता ने पेड़, घास, वन और लताओं को अपने वस्त्र के रूप में धारण किया है। उनके आँचल में सुंदर फूल सजे हुए हैं। गंगा की चमकती हुई सफेद जलधारा उनके गले में हार की तरह शोभा दे रही है।

विशेष बात: यहाँ भारत की प्राकृतिक सुंदरता को स्त्री के शृंगार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”

शब्दार्थ

मुकुट — crown, सिर का आभूषण

शुभ्र — सफेद, उज्ज्वल

हिम-तुषार — बर्फ, हिमकण

प्राण — जीवन

प्रणव — ओंकार

ओंकार — ‘ॐ’ की पवित्र ध्वनि

ध्वनित — गूँजती हुई

दिशाएँ — दिशाएँ

उदार — विशाल, महान

शतमुख — सौ मुखों वाली / अनेक मुखों वाली

शतरव — अनेक स्वरों वाली

मुखरे — गूँजती हुई, बोलती हुई

भावार्थ

कवि भारत माता के सिर पर हिमालय की सफेद बर्फ को मुकुट के रूप में देखते हैं। उनके प्राणों में पवित्र ओंकार की ध्वनि बसी हुई है। चारों दिशाएँ भारत माता की महिमा से गूँज रही हैं। अनेक मुख और अनेक स्वर मिलकर भारत माता की स्तुति कर रहे हैं।

विशेष बात: हिमालय भारत की महानता, ऊँचाई और गौरव का प्रतीक है। ओंकार भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का प्रतीक है।

कविता का सरल सारांश

कवि भारत माता की स्तुति करते हुए कहते हैं— हे भारत माता! आपकी जय हो, विजय हो। आप सुनहरी फसलों और कमलों से सुशोभित हैं। लंका आपके चरणों के पास है और गर्जन करती हुई समुद्र की लहरें आपके पवित्र चरणों को धो रही हैं।

आपके वस्त्र पेड़, घास, वन और लताएँ हैं। आपके आँचल में सुंदर फूल सजे हैं। गंगा की उज्ज्वल जलधारा आपके गले में सफेद हार की तरह शोभा दे रही है। हिमालय की शुभ्र बर्फ आपके सिर का मुकुट है। आपके प्राणों में पवित्र ओंकार की ध्वनि है। आपकी महिमा चारों दिशाओं में अनेक मुखों और अनेक स्वरों से गूँज रही है।

कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
भारतिभारत माता
कनकसोना
शस्यफसल
कमलधरेकमल धारण करने वाली
पदतलचरणों के पास
शतदलकमल
गर्जितोर्मिगर्जना करती हुई लहरें
शुचिपवित्र
चरण युगलदोनों चरण
स्तवस्तुति
वसनवस्त्र
अंचलआँचल
खचितसजा हुआ / जड़ा हुआ
सुमनफूल
धवलसफेद
हिम-तुषारबर्फ
प्रणवओंकार
ध्वनितगूँजती हुई
मुखरेबोलती / गूँजती हुई

कविता में भारत माता का रूप

कवि ने भारत माता को एक सुंदर देवी के रूप में दिखाया है—

भारत की वस्तुकविता में रूप
खेतों की सुनहरी फसलेंभारत माता की शोभा
सागरचरण धोने वाला जल
पेड़, घास, वन, लताएँवस्त्र
फूलआँचल की सजावट
गंगागले का सफेद हार
हिमालय की बर्फसिर का मुकुट
ओंकारप्राणों की पवित्र ध्वनि

कविता की भाषा-शैली

इस कविता की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। इसमें तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है, जैसे— शुचि, चरण, स्तव, वसन, धवल, प्रणव, ओंकार, ध्वनित आदि।

कविता की शैली गीतात्मक और स्तुतिपरक है। इसमें भारत माता की वंदना की गई है।

कविता में प्रकृति-चित्रण

कवि ने प्रकृति के माध्यम से भारत की सुंदरता दिखाई है। समुद्र, गंगा, हिमालय, फूल, वन, लताएँ और फसलें—ये सभी भारत माता के सौंदर्य को बढ़ाते हैं।

कवि का प्रकृति-चित्रण केवल सुंदरता दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से भारत की समृद्धि, पवित्रता और महानता को भी प्रकट किया गया है।

काव्य-सौंदर्य / अलंकार

1. मानवीकरण अलंकार

भारत को माता/देवी के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण: भारत माता के चरण, अंचल, गले का हार, मुकुट आदि।

2. रूपक अलंकार

गंगा को भारत माता के गले का हार बताया गया है। उदाहरण: “धवल धार हार गले”

3. अनुप्रास अलंकार

एक ही वर्ण की पुनरावृत्ति हुई है। उदाहरण:

“कनक-शस्य-कमलधरे”

“तरु-तृण-वन-लता”

“प्राण प्रणव”

“शतमुख-शतरव”

4. प्रतीकात्मकता

गंगा — पवित्रता का प्रतीक

हिमालय — गौरव और महानता का प्रतीक

सागर — विशालता का प्रतीक

फसलें — समृद्धि का प्रतीक

ओंकार — आध्यात्मिकता का प्रतीक

कविता का संदेश

कविता हमें भारत की महानता, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा का अनुभव कराती है। कवि चाहता है कि हम अपने देश पर गर्व करें और भारत माता की जय-विजय की कामना करें।

परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. “भारति” शब्द से कवि का क्या आशय है?

उत्तर

“भारति” शब्द से कवि का आशय भारत माता से है। कवि ने भारत को एक देवी के रूप में चित्रित किया है और उनकी जय-विजय की कामना की है।

प्रश्न 2. “कनक-शस्य-कमलधरे” का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

“कनक-शस्य-कमलधरे” का अर्थ है— सोने जैसी चमकती फसलों और कमलों को धारण करने वाली। इस शब्द से कवि ने भारत की कृषि-समृद्धि और प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है।

प्रश्न 3. सागर भारत माता के चरणों को कैसे धोता है?

उत्तर

कवि के अनुसार गर्जना करती हुई समुद्र की लहरें भारत माता के पवित्र चरणों को धोती हैं। इसका अर्थ है कि भारत के दक्षिण में समुद्र स्थित है और वह भारत की शोभा बढ़ाता है।

प्रश्न 4. कवि ने गंगा को किस रूप में चित्रित किया है?

उत्तर

कवि ने गंगा को भारत माता के गले के सफेद हार के रूप में चित्रित किया है। गंगा की उज्ज्वल जलधारा भारत माता के गले में धवल हार की तरह शोभा देती है।

प्रश्न 5. हिमालय को भारत माता का मुकुट क्यों कहा गया है?

उत्तर

हिमालय भारत के उत्तर में स्थित है और उसकी बर्फ सफेद मुकुट की तरह दिखाई देती है। इसलिए कवि ने हिमालय को भारत माता का शुभ्र मुकुट कहा है।

प्रश्न 6. कविता में भारत की आध्यात्मिकता कैसे व्यक्त हुई है?

उत्तर

कविता में “प्राण प्रणव ओंकार” के माध्यम से भारत की आध्यात्मिकता व्यक्त हुई है। ओंकार भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का पवित्र प्रतीक है।

प्रश्न 7. कविता में भारत माता के वस्त्र किसे कहा गया है?

उत्तर

कवि ने पेड़, घास, वन और लताओं को भारत माता के वस्त्र कहा है। इससे भारत की प्राकृतिक हरियाली और सुंदरता प्रकट होती है।

प्रश्न 8. “शतमुख-शतरव-मुखरे” का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

इसका भाव है कि भारत माता की महिमा अनेक मुखों और अनेक स्वरों से गूँज रही है। अर्थात् देश के अनेक लोग, अनेक भाषाएँ और अनेक दिशाएँ भारत माता की स्तुति कर रही हैं।

याद रखने योग्य मुख्य बिंदु

कविता में भारत माता की वंदना की गई है।

कवि ने भारत को देवी के रूप में चित्रित किया है।

गंगा को हार, हिमालय को मुकुट और वन-लताओं को वस्त्र कहा गया है।

कविता में देशभक्ति, प्रकृति-सौंदर्य और आध्यात्मिकता का सुंदर मेल है।

भाषा संस्कृतनिष्ठ, लयात्मक और प्रभावशाली है।

अभ्यास और पुनरावृत्ति

संपूर्ण प्रश्नोत्तर और भाषा-अभ्यास

प्रश्न, उत्तर, तर्क, काव्य-बोध, व्याकरण तथा गतिविधियाँ मूल अध्ययन सामग्री के क्रम में दी गई हैं।

मौलिक अध्ययन-मार्गदर्शिका: NCERT Hindi Tutor · ncerthinditutor.com

मेरे उत्तर मेरे तर्क

प्रश्न 1. “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से- (क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है। (ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है। (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है। (घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।

उत्तर

सही विकल्प — (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

तर्क

यह उत्तर उपयुक्त है क्योंकि कविता में भारत माता की प्राकृतिक सुंदरता, गंगा, हिमालय, सागर, वन-लता, फसल और आध्यात्मिक ध्वनि ‘ओंकार’ का वर्णन किया गया है। इससे भारत की प्रकृति, संपन्नता और आध्यात्मिक ज्ञान की महिमा प्रकट होती है।

प्रश्न 2. “कनक- शस्य- कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है- (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता (ख) भारत की नदियों का सौंदर्य (ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता (घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास

उत्तर

सही विकल्प — (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

तर्क

“कनक” का अर्थ सोना और “शस्य” का अर्थ फसल है। “कनक-शस्य” से सोने जैसी चमकती फसलों का भाव मिलता है। इसलिए यह पंक्ति भारत की कृषि-संपन्नता और धन-धान्य से भरी धरती का वर्णन करती है।

प्रश्न 3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं- (क) गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले (ख) गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल (ग) भारति, जय, विजयकरे / कनक शस्य कमलधरे! (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख- शतरव- -मुखरे!

उत्तर

सही विकल्प — (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार / शतमुख-शतरव-मुखरे!

तर्क

इन पंक्तियों में भारत की महिमा चारों दिशाओं में गूँजने की बात कही गई है। “शतमुख” और “शतरव” का भाव है कि अनेक मुखों और अनेक स्वरों से भारत की महिमा का उद्घोष हो रहा है। इसलिए ये पंक्तियाँ पूरे विश्व में भारत के महत्व को व्यक्त करती हैं।

प्रश्न 4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है? (क) सरल, बोल-चाल की भाषा (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त (ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण (घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक

उत्तर

सही विकल्प — (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

तर्क

कविता में संस्कृतनिष्ठ शब्दों और समासयुक्त पदों का प्रयोग अधिक है, जैसे— “कनक-शस्य-कमलधरे”, “गर्जितोर्मि”, “ज्योतिर्जल-कण”, “हिम-तुषार”, “शतमुख-शतरव” आदि। इसलिए इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है।

प्रश्न 5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं? (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक (ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम (ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक (घ) सामाजिक और राजनीतिक

उत्तर

सही विकल्प — (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक

तर्क

‘तरु-तृण-वन-लता’ प्रकृति और पर्यावरण का प्रतीक हैं। ‘गंगा-धारा’ भारतीय संस्कृति और पवित्रता का प्रतीक है। इसलिए कवि इन चित्रों के माध्यम से पर्यावरणीय और सांस्कृतिक चेतना का संदेश देते हैं।

अर्थ और भाव

(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”

उत्तर

इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता के दिव्य रूप का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि लंका भारत माता के चरणों के पास कमल के समान स्थित है। समुद्र की गर्जना करती हुई लहरें भारत माता के पवित्र दोनों चरणों को धो रही हैं।

भाव

इन पंक्तियों का भाव यह है कि भारत की भौगोलिक स्थिति को कवि ने अत्यंत सुंदर और भक्तिपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया है। समुद्र को भारत माता के चरण धोने वाला भक्त बताया गया है। इससे भारत माता की पवित्रता, महानता और गौरव प्रकट होता है।

(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”

उत्तर

इन पंक्तियों में कवि भारत माता की आध्यात्मिक महिमा का वर्णन करते हैं। कवि कहते हैं कि भारत माता के प्राणों में पवित्र ‘ओंकार’ की ध्वनि बसी हुई है। उनकी महिमा उदार दिशाओं में अनेक मुखों और अनेक स्वरों से गूँज रही है।

भाव

इन पंक्तियों का भाव यह है कि भारत केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही महान नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महान है। ‘ओंकार’ भारतीय संस्कृति, ज्ञान और अध्यात्म का प्रतीक है। भारत की महिमा चारों ओर फैल रही है और अनेक लोग अनेक स्वरों में उसका गुणगान कर रहे हैं।

मेरी समझ मेरे विचार

प्रश्न 1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?

उत्तर

कविता में कवि की देशभक्ति, राष्ट्र-गौरव और भारत माता के प्रति श्रद्धा की भावना व्यक्त हुई है। कवि भारत को माता के रूप में देखकर उसकी जय और विजय की कामना करता है। वह भारत की प्रकृति, पवित्रता, आध्यात्मिकता और संपन्नता की प्रशंसा करता है।

प्रश्न 2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?

उत्तर

कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। कवि ने पेड़, घास, वन और लताओं को भारत माता के वस्त्र बताया है। फूलों को उनके आँचल की सजावट, गंगा को उनके गले का हार और हिमालय की बर्फ को उनका मुकुट कहा गया है। समुद्र की लहरें भारत माता के चरण धोती हुई दिखाई गई हैं।

हाँ, मैं मानता हूँ कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है, क्योंकि देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं होता, बल्कि उसकी नदियाँ, पर्वत, वन, खेत और जीव-जंतु भी देश की पहचान होते हैं। यदि हम प्रकृति की रक्षा करते हैं, तो हम अपने देश की सुंदरता, संपदा और जीवन को सुरक्षित रखते हैं।

प्रश्न 3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?

उत्तर

“कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की समृद्धि, उर्वरता और सुंदरता की ओर संकेत करती है। “कनक” का अर्थ सोना है और “शस्य” का अर्थ फसल है। इससे भारत की सोने जैसी चमकती फसलों और धन-धान्य की संपन्नता का भाव मिलता है। “कमलधरे” शब्द भारत की प्राकृतिक सुंदरता और पवित्रता को प्रकट करता है।

प्रश्न 4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?

उत्तर

“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट इसलिए बताया गया है क्योंकि हिमालय भारत के उत्तर में स्थित है और उसकी बर्फ से ढकी चोटियाँ मुकुट जैसी दिखाई देती हैं। हिमालय भारत की ऊँचाई, गौरव, शक्ति और पवित्रता का प्रतीक है। इसलिए कवि ने उसे भारत माता के सिर का शुभ्र मुकुट कहा है।

विधा से संवाद

कविता का सौंदर्य

“भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!”

इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता को विजय देने वाली और सोने जैसी फसलों तथा कमलों से सुशोभित बताया है। यहाँ भारतभूमि का सुंदर, समृद्ध और पवित्र चित्र प्रस्तुत किया गया है।

कविता की विशेषताएँ और पंक्तियाँ

विशेषताएँकविता की पंक्तियाँ
प्रकृति का मानवीकरण“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”
प्रकृति का मानवीकरण“तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल में खचित सुमन”
अलंकारिक प्रयोग“धवल धार हार गले”
अलंकारिक प्रयोग“कनक-शस्य-कमलधरे!”
समस्त पद / सामासिक पद का प्रयोग“कनक-शस्य-कमलधरे!”
समस्त पद / सामासिक पद का प्रयोग“गंगा ज्योतिर्जल-कण”
समस्त पद / सामासिक पद का प्रयोग“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”
समस्त पद / सामासिक पद का प्रयोग“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“धोता शुचि चरण युगल”
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“प्राण प्रणव ओंकार”
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“ध्वनित दिशाएँ उदार”

इस कविता में कवि ने भारत माता का चित्र एक देवी के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रकृति के माध्यम से भारत की सुंदरता, गंगा के माध्यम से पवित्रता, हिमालय के माध्यम से गौरव और ओंकार के माध्यम से आध्यात्मिकता को व्यक्त किया गया है।

विषयों से संवाद

प्रश्न 1. स्वतंत्रता – पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक / परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?

उत्तर

वर्तमान भारत को मैं विज्ञान, तकनीक, युवा शक्ति, लोकतंत्र, विविध संस्कृति, कृषि, योग, अंतरिक्ष उपलब्धियों और डिजिटल विकास के रूप में प्रस्तुत करूँगा। भारत में अनेक भाषाएँ, धर्म, पर्व, पहनावे, भोजन और लोककलाएँ हैं। साथ ही आज भारत शिक्षा, चिकित्सा, खेल, स्टार्टअप, अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में भी आगे बढ़ रहा है।

प्रश्न 2. “शतमुख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करते हैं?

उत्तर

“शतमुख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति भारत की अनेक भाषाओं, बोलियों, पर्वों और परंपराओं की ओर संकेत करती है। भारत में दीपावली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, पोंगल, बिहू, ओणम, नवरात्रि आदि अनेक उत्सव मनाए जाते हैं। अलग-अलग रीति-रिवाज होने पर भी सभी भारतीय एकता और प्रेम से जुड़े हैं। यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना है।

प्रश्न 3. भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।

उत्तर

भारत को सुदृढ़ बनाने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान परंपरा का बहुत महत्त्व है। भारत की नदियाँ, वन, पर्वत और उपजाऊ भूमि जीवन का आधार हैं। हमारी संस्कृति हमें सहिष्णुता, एकता, सेवा और शांति का संदेश देती है। योग, आयुर्वेद, वेद, उपनिषद, गणित और दर्शन जैसी ज्ञान-परंपराएँ भारत की पहचान हैं। यदि हम प्रकृति की रक्षा करें, संस्कृति का सम्मान करें और ज्ञान को आगे बढ़ाएँ, तो भारत और अधिक शक्तिशाली तथा समृद्ध बनेगा।

प्रश्न 4. कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?

उत्तर

वर्तमान समय में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को बहुत प्रभावित किया है। गंगा जैसी नदियों पर प्रदूषण और अधिक जल-निकासी का दबाव है; इसी कारण गंगा की सफाई और संरक्षण के लिए “नमामि गंगे” कार्यक्रम चलाया गया है।

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने और पीछे हटने की समस्या बढ़ रही है। हिमालयी ग्लेशियर गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के लिए महत्त्वपूर्ण जल-स्रोत हैं। काला कार्बन और वायु प्रदूषण भी ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ा सकते हैं। इसलिए नदियों को स्वच्छ रखना और जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयास करना आज बहुत आवश्यक है।

विविध रंग भारत के

आप अपने कक्षा – समूह में मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता पर आधारित एक पावरपॉइंट प्रस्तुति / पोस्टर / चार्ट / कोलाज तैयार कीजिए और इसे अपनी कक्षा में दिखाइए। आप भारत के विभिन्न राज्यों पर केंद्रित पावरपॉइंट प्रस्तुति / पोस्टर / चार्ट / कोलाज भी बना सकते हैं।
उत्तर

सृजन

प्रश्न 1. मान लीजिए, आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?

उत्तर

यदि मुझे भारत को मनुष्य के रूप में सजाने का अवसर मिले, तो मैं अपने राज्य की पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, लोककला, पुष्प और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग करूँगा। उदाहरण के लिए, पारंपरिक पोशाक, लोकनृत्य से जुड़े आभूषण, राज्य का प्रसिद्ध फूल, हस्तकला, लोकवाद्य और स्थानीय त्योहारों के प्रतीक इसमें शामिल किए जा सकते हैं। इससे भारत के रूप में क्षेत्रीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता दोनों दिखाई देंगी।

प्रश्न 2. भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?

उत्तर

भारत पर आधारित डाक टिकट/पोस्टर/आवरण पृष्ठ में मैं ये प्रतीक शामिल करूँगा— तिरंगा, क्योंकि यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। गंगा, क्योंकि यह पवित्रता और जीवन का प्रतीक है। हिमालय, क्योंकि यह शक्ति और गौरव का प्रतीक है। कमल, क्योंकि यह सुंदरता और पवित्रता का प्रतीक है। किसान और फसलें, क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। विभिन्न राज्यों की पोशाकें, क्योंकि भारत विविधता में एकता का देश है।

प्रश्न 3. नदी की यात्रा

गंगा नदी की अपने उद्गम स्रोत से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा- वृत्तांत लिखिए।

(संकेत – पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि)

उत्तर

मैं गंगा हूँ। मेरा जन्म हिमालय की गोद में गंगोत्री हिमनद से होता है। पर्वतों के बीच बहते हुए मैं स्वच्छ, ठंडी और चंचल धारा के रूप में आगे बढ़ती हूँ। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम से मेरा विस्तृत रूप सामने आता है।

हरिद्वार पहुँचकर मैं मैदानों में प्रवेश करती हूँ। यहाँ मेरी धारा श्रद्धा और आस्था से जुड़ जाती है। लोग मेरे तट पर स्नान करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और पटना जैसे नगरों से गुजरते हुए मैं भारत की संस्कृति, भाषा और लोकजीवन को देखती हूँ।

मेरे किनारे कहीं हिंदी बोली जाती है, कहीं भोजपुरी, कहीं अवधी और कहीं बंगला। मेरे तटों पर मेले, आरती, लोकगीत, खेती और व्यापार दिखाई देते हैं। वाराणसी में मेरी आरती भारतीय संस्कृति की अद्भुत झलक दिखाती है। आगे बढ़ते हुए मैं बंगाल पहुँचती हूँ और अंत में गंगासागर में बंगाल की खाड़ी से मिल जाती हूँ।

मेरी यात्रा केवल जल की यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की प्रकृति, संस्कृति, आस्था और जीवन की यात्रा है।

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

1. बहुभाषी देश हमारा

भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए।
उत्तर

मैं भारत से समाज, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति और एकता जैसे विषयों पर संवाद करना चाहूँगा।

नोट: नीचे मातृभाषा के उदाहरण के रूप में सरल हिंदी दी गई है। विद्यार्थी अपनी मातृभाषा के अनुसार इसे बदल सकते हैं।

विषयमातृभाषा में संवादहिंदी में संवाद
समाजमेरे भारत, मैं चाहता हूँ कि सभी लोग मिल-जुलकर रहें।हे भारत! मैं चाहता हूँ कि समाज में सब लोग प्रेम, समानता और सहयोग से रहें।
पर्यावरणमेरे देश, तेरी नदियाँ, पेड़ और पहाड़ हमेशा सुरक्षित रहें।हे भारत! मैं चाहता हूँ कि हम नदियों, वनों, पर्वतों और जीव-जंतुओं की रक्षा करें।
संस्कृतिभारत, तेरी भाषा, त्योहार और परंपराएँ बहुत सुंदर हैं।हे भारत! आपकी विविध भाषाएँ, त्योहार, वेशभूषा और परंपराएँ हमारी पहचान हैं।
शिक्षामेरे भारत, हर बच्चे को पढ़ने का अवसर मिले।हे भारत! मैं चाहता हूँ कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा और आगे बढ़ने का अवसर मिले।
एकताभारत, हम सब अलग होकर भी एक हैं।हे भारत! आपकी अनेकता में एकता ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है।

2. मातृभाषा और भाव

“स्तव कर बहु-अर्थ-भरे”

आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।

उत्तर

मातृभाषा में कविता — हिंदी उदाहरण

मेरे भारत की महिमा न्यारी, गंगा-यमुना धारा प्यारी। हिमगिरि इसका ऊँचा मान, खेतों में सोने-सा धान।

भाषाएँ अनेक, भाव एक, सबके मन में प्रेम अनेक। त्योहारों से जगमग देश, भारत मेरा सबसे विशेष।

हिंदी में भावार्थ: इस कविता में भारत की महानता और सुंदरता का वर्णन किया गया है। गंगा-यमुना भारत की पवित्र नदियाँ हैं। हिमालय भारत के गौरव और सम्मान का प्रतीक है। खेतों में लहराती फसलें भारत की समृद्धि दिखाती हैं। भारत में अनेक भाषाएँ और त्योहार हैं, फिर भी सबके मन में प्रेम और एकता की भावना है।

3. समास — समस्त पद एवं विग्रह

दिए गए सामासिक पदों का विग्रह

समस्त पदसमास-विग्रहसरल अर्थ
शतदलशत दलों वालासौ पंखुड़ियों वाला कमल
ज्योतिर्जलज्योति के समान जलचमकता हुआ जल
शतमुखशत मुखों वालाअनेक मुखों वाला
सागरजलसागर का जलसमुद्र का पानी

शतदल में “शत” का अर्थ सौ और “दल” का अर्थ पंखुड़ी है। ज्योतिर्जल में जल की चमक को ज्योति जैसा बताया गया है। शतमुख में अनेक मुखों से बोलने या गाने का भाव है। सागरजल में समुद्र के जल का संकेत है।

4. अलंकार — समझ और प्रयोग

प्रश्न (क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।

उत्तर

अनुप्रास अलंकार वहाँ होता है जहाँ एक ही वर्ण या ध्वनि की बार-बार पुनरावृत्ति होती है।

कविता में अनुप्रास अलंकार के उदाहरण—

पंक्तिअनुप्रास का कारण
“कनक-शस्य-कमलधरे!”‘क’ ध्वनि की पुनरावृत्ति
“गर्जितोर्मि सागर-जल”‘ग’ और ‘ज’ ध्वनियों का प्रभाव
“तरु-तृण-वन-लता वसन”‘त’ और ‘व’ ध्वनियों की पुनरावृत्ति
“गंगा ज्योतिर्जल-कण”‘ज’ ध्वनि की पुनरावृत्ति
“प्राण प्रणव ओंकार”‘प्र’ ध्वनि की पुनरावृत्ति
“शतमुख-शतरव-मुखरे!”‘श’ ध्वनि की पुनरावृत्ति

प्रश्न (ख) कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?

उत्तर

रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान को एक ही मान लिया जाता है। इस कविता में कवि ने भारत माता के रूप में प्रकृति का सुंदर चित्र बनाया है।

पंक्तिरूपक अलंकार का आधारकवि ने किसे क्या रूप दिया है?
“तरु-तृण-वन-लता वसन”पेड़, घास, वन और लताओं को वस्त्र मान लिया गया है।प्रकृति की हरियाली को भारत माता का वस्त्र बताया गया है।
“अंचल में खचित सुमन”फूलों को आँचल में जड़े आभूषण जैसा बताया गया है।फूलों को भारत माता के आँचल की सजावट माना गया है।
“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले”गंगा की धारा को हार मान लिया गया है।गंगा को भारत माता के गले का सफेद हार बताया गया है।
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”हिमालय की बर्फ को मुकुट माना गया है।हिमालय को भारत माता का शुभ्र मुकुट बताया गया है।

कवि ने भारत को एक देवी या माता के रूप में चित्रित किया है। भारत की नदियाँ, पर्वत, वन, फूल और खेत उसके सौंदर्य, पवित्रता और गौरव को प्रकट करते हैं।

गतिविधियाँ

मिलकर लें शपथ

“तरु-तृण-वन-लता वसन / अंचल में खचित सुमन” — वन, लता, पुष्प आदि भारत के अमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों के बारे में सूचना एकत्रित कीजिए और वन संरक्षण के लिए बनाए नियमों पर विचार कीजिए।

उत्तर

भारत में वन, पेड़-पौधे, वन्यजीव, नदियाँ और जैव-विविधता के संरक्षण के लिए कई अधिनियम बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य प्रकृति की रक्षा करना, वनों की कटाई रोकना, वन्यजीवों को बचाना और पर्यावरण को सुरक्षित रखना है।

अधिनियम / कानूनमुख्य उद्देश्य
वन संरक्षण अधिनियम, 1980 / वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियमवनों की रक्षा करना और वन-भूमि को गैर-वन कार्यों में बदलने पर नियंत्रण रखना। इस अधिनियम का उद्देश्य forests के conservation से जुड़ा है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972जंगली animals, birds और plants की रक्षा करना तथा ecological security बनाए रखना।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986वायु, जल, मिट्टी और अन्य environmental pollution को नियंत्रित करना। इसमें सरकार को प्रदूषण रोकने के लिए नियम बनाने और उद्योगों पर नियंत्रण लगाने की शक्ति दी गई है।
जैव-विविधता अधिनियम, 2002जैविक संसाधनों और biodiversity के संरक्षण, उनके sustainable use और उनसे जुड़े ज्ञान की रक्षा करना।

वन संरक्षण के लिए बनाए गए नियमों पर विचार

वन संरक्षण के लिए बनाए गए नियम बहुत आवश्यक हैं, क्योंकि वन हमारे जीवन का आधार हैं। वन हमें ऑक्सीजन, वर्षा, औषधियाँ, लकड़ी, फल-फूल और अनेक प्रकार के जीवों का घर प्रदान करते हैं। यदि जंगल नष्ट होंगे, तो जलवायु, मिट्टी, वर्षा और जीव-जंतुओं पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

वन संरक्षण के लिए हमें इन बातों का पालन करना चाहिए—

पेड़ों की अनावश्यक कटाई नहीं करनी चाहिए।

अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए।

जंगलों में आग लगने से बचाव करना चाहिए।

वन्यजीवों का शिकार नहीं करना चाहिए।

प्लास्टिक और कचरा जंगलों या नदियों में नहीं फेंकना चाहिए।

प्राकृतिक संसाधनों का सीमित और समझदारी से उपयोग करना चाहिए।

स्कूल और समाज में पर्यावरण जागरूकता फैलानी चाहिए।

वन संरक्षण की शपथ

मैं शपथ लेता/लेती हूँ कि मैं पेड़-पौधों, वनों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा करूँगा/करूँगी। मैं अनावश्यक रूप से पेड़ नहीं काटूँगा/काटूँगी और दूसरों को भी प्रकृति की रक्षा के लिए प्रेरित करूँगा/करूँगी। मैं अपने देश की प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित रखने में अपना योगदान दूँगा/दूँगी।

भाषा संगम

इनके अतिरिक्त कुछ और भाषाओं में

भाषाशब्द
भोजपुरीफसल / उपज
अवधीफसल / उपज
मैथिलीफसल / उपज
राजस्थानीफसल / पैदावार
हरियाणवीफसल / पैदावार

“कनक शस्य कमलधरे” का सरल अर्थ

कनक शस्य कमलधरे का अर्थ है— हे सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली भारत माता!

उपर्युक्त वाक्य को मातृभाषा में लिखिए

नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं। विद्यार्थी अपनी मातृभाषा के अनुसार इनमें बदलाव कर सकते हैं।

भाषावाक्य
हिंदीहे सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली भारत माता!
भोजपुरीहे सोना जइसन फसल अउर कमल धारण करे वाली भारत मइया!
अवधीहे सोना जइसी फसल अउर कमल धारण करै वाली भारत माता!
मराठीसोन्यासारखी पिके आणि कमळ धारण करणारी भारतमाता!
अंग्रेज़ीO Mother India, bearer of golden crops and lotus!