रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया यह प्रसंग परशुराम के क्रोध, लक्ष्मण के साहसपूर्ण व्यंग्य और राम की विनम्र, धैर्यवान तथा मर्यादित वाणी को प्रस्तुत करता है।
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सारांश, व्याख्या और महत्वपूर्ण अध्ययन-बिंदु
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यह पाठ तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। इसमें सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष टूटने के बाद परशुराम के क्रोध, सभा के भय, राम की विनम्रता और लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण उत्तरों का वर्णन है।
कवि-परिचय: गोस्वामी तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के महान भक्त कवि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश में माना जाता है। वे संस्कृत, अवधी और ब्रज भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस है। इसके अलावा कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में श्रीराम को मर्यादा, नीति, विनम्रता, त्याग, शील और आदर्श जीवन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।
पाठ का संदर्भ
यह प्रसंग सीता-स्वयंवर से जुड़ा है। राजा जनक ने सीता के स्वयंवर में यह शर्त रखी थी कि जो वीर शिव-धनुष को उठाकर तोड़ेगा, वही सीता से विवाह करेगा। श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से शिव-धनुष उठाया और वह टूट गया। जब यह समाचार परशुराम को मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आए। उनके आने से राजा, देवता, नगरवासी और सभा के सभी लोग भयभीत हो गए।
मुख्य पात्र
श्रीराम — विनम्र, शांत, धैर्यवान और मर्यादित। लक्ष्मण — साहसी, तीखे वचन बोलने वाले और राम के प्रति अत्यंत प्रेम रखने वाले। परशुराम — क्रोधी, तेजस्वी, शिव-भक्त और परशु धारण करने वाले ऋषि। राजा जनक — शिष्ट, विनम्र और चिंतित राजा। सीता — भयभीत और चिंतित, क्योंकि प्रसंग उनके विवाह से जुड़ा है। सभा के राजा — परशुराम के क्रोध से भयभीत, कुछ राजा मन-ही-मन प्रसन्न भी हैं।
पाठ का मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव यह है कि कठिन परिस्थिति में मनुष्य का वास्तविक स्वभाव सामने आता है। परशुराम क्रोध का प्रतीक हैं, लक्ष्मण साहस और व्यंग्य का, जबकि राम विनम्रता, धैर्य और मर्यादा के प्रतीक हैं। तुलसीदास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह बताया है कि क्रोध को शांत करने के लिए विनम्रता और संतुलन सबसे प्रभावी मार्ग है।
पद्यांश-वार सरल व्याख्या
पद्यांश 1
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
शब्दार्थ: भृगुपति — भृगुवंशी परशुराम। बेषु कराला — भयानक रूप। भुआला — राजा। दंड प्रनामा — दंडवत प्रणाम।
जब सभा में उपस्थित राजाओं ने परशुराम का भयानक और क्रोधपूर्ण रूप देखा, तो वे भय से व्याकुल होकर खड़े हो गए। वे अपने पिता सहित अपना-अपना नाम बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे।
यहाँ सभा में उपस्थित लोगों के भय और शिष्टाचार दोनों का वर्णन है।
पद्यांश 2
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
शब्दार्थ: सुभायँ — स्वभाव से। चितवहिं — देखते हैं। खुटानी — समाप्त हो जाना। बहोरि — फिर। सीय — सीता।
परशुराम जिसे अपने स्वभाव के अनुसार हितकारी समझकर देखते, वह व्यक्ति अपने को धन्य समझता, मानो उसके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया हो। राजा जनक फिर आए, उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम किया और सीता को बुलाकर परशुराम को प्रणाम करवाया।
इसमें राजा जनक की विनम्रता, शिष्टाचार और संस्कारशीलता दिखाई देती है।
पद्यांश 3
आसिष दीन्हहि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
शब्दार्थ: आसिष — आशीर्वाद। हरषानीं — प्रसन्न हुईं। सयानीं — समझदार सखी। पद सरोज — कमल जैसे चरण।
परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया। यह देखकर सीता की सखियाँ प्रसन्न हो गईं और समझदार सखियाँ सीता को अपने साथ ले गईं। इसके बाद परशुराम विश्वामित्र से मिले। फिर राम और लक्ष्मण आए तथा दोनों भाइयों ने परशुराम के चरणों में प्रणाम किया।
यहाँ गुरु, ऋषि और बड़ों के प्रति आदर-सम्मान की परंपरा दिखाई देती है।
पद्यांश 4
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हहि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।
शब्दार्थ: ढोटा — पुत्र। भल जोटा — सुंदर जोड़ी। लोचन — आँखें। मार मद मोचन — कामदेव के अभिमान को नष्ट करने वाला सौंदर्य।
विश्वामित्र ने परशुराम को बताया कि ये दोनों राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। परशुराम ने दोनों को देखकर आशीर्वाद दिया। वे राम के अद्भुत सौंदर्य को देखकर उन्हें निहारते रह गए। राम का रूप इतना मनोहर था कि वह कामदेव के गर्व को भी नष्ट कर सकता था।
इसमें राम के दिव्य सौंदर्य और तेज का वर्णन है।
पद्यांश 5
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
शब्दार्थ: बिदेह — राजा जनक। भीर — भीड़। जानि अजान — जानते हुए भी अनजान बनकर पूछना। कोपु — क्रोध।
परशुराम ने फिर चारों ओर देखा और राजा जनक से पूछा कि यह इतनी भीड़ क्यों है? वे कारण जानते थे, फिर भी अनजान बनकर पूछ रहे थे। यह पूछते समय उनका पूरा शरीर क्रोध से भर गया।
यहाँ परशुराम के भीतर बढ़ते क्रोध और सभा की तनावपूर्ण स्थिति का वर्णन है।
पद्यांश 6
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥ सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
शब्दार्थ: समाचार — घटना का विवरण। महीप — राजा। चापखंड — धनुष के टुकड़े। महि — पृथ्वी।
राजा जनक ने परशुराम को पूरी घटना बताई कि किस कारण ये सभी राजा यहाँ आए हैं। यह सुनकर परशुराम ने इधर-उधर देखा और भूमि पर पड़े शिव-धनुष के टूटे हुए टुकड़ों को देखा।
यहाँ घटना का कारण स्पष्ट होता है और परशुराम का क्रोध और बढ़ने लगता है।
पद्यांश 7
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
शब्दार्थ: रिस — क्रोध। कठोरा — कठोर। जड़ — मूर्ख। बेगि — शीघ्र। महि — पृथ्वी। लहि — तक।
परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर कठोर वचन बोले। उन्होंने राजा जनक से कहा, “हे मूर्ख जनक! बताओ, यह धनुष किसने तोड़ा? उसे तुरंत दिखाओ, नहीं तो आज जहाँ तक तुम्हारा राज्य है, वहाँ तक की पृथ्वी को उलट दूँगा।”
यहाँ परशुराम के रौद्र रूप और उनकी कठोर चेतावनी का वर्णन है।
पद्यांश 8
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
शब्दार्थ: नृपु — राजा जनक। कुटिल भूप — कपटी राजा। सुर — देवता। त्रास — भय।
राजा जनक अत्यधिक डर के कारण कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। यह देखकर कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। देवता, मुनि, नाग, नगरवासी, पुरुष और स्त्रियाँ सभी भय और चिंता में डूब गए।
यहाँ सभा के भय, चिंता और कुछ राजाओं की ईर्ष्यापूर्ण मानसिकता का चित्रण है।
पद्यांश 9
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
शब्दार्थ: सीय महतारी — सीता की माता। बिधि — विधाता। सँवरी बात — बनी हुई बात। अरध निमेष — आधा क्षण। कलप — बहुत लंबा समय।
सीता की माता मन-ही-मन पछता रही थीं और सोच रही थीं कि विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुराम के स्वभाव और क्रोध के बारे में सुनकर सीता को आधा क्षण भी कल्प के समान बहुत लंबा लगने लगा।
यहाँ सीता और उनकी माता की चिंता और भय का सुंदर चित्रण है। “अरध निमेष कलप सम बीता” में अतिशयोक्ति अलंकार है।
पद्यांश 10
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
शब्दार्थ: सभय — भयभीत। बिलोके — देखा। जानकी — सीता। भीरु — भयभीत। हरषु — प्रसन्नता। बिषादु — दुख।
श्रीराम ने देखा कि सभी लोग भयभीत हैं और जानकी यानी सीता भी डरी हुई हैं। उनके हृदय में न तो अधिक प्रसन्नता थी और न ही दुख। वे पूर्ण संतुलित और शांत भाव से बोले।
यहाँ राम का धैर्य, संतुलन, मर्यादा और शांत स्वभाव स्पष्ट होता है।
पद्यांश 11
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
शब्दार्थ: नाथ — स्वामी। संभुधनु — शिव-धनुष। भंजनिहारा — तोड़ने वाला। आयसु — आज्ञा। कोही — क्रोधी।
राम ने विनम्रता से परशुराम से कहा, “हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, आप मुझसे क्यों नहीं कहते?” यह सुनकर क्रोधी परशुराम और अधिक क्रोधित हो गए।
यहाँ राम की विनम्रता, शालीनता और मर्यादित भाषा दिखाई देती है।
पद्यांश 12
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥ सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
शब्दार्थ: सेवकाई — सेवा का कार्य। अरि — शत्रु। सहसबाहु — परशुराम का प्रसिद्ध शत्रु। रिपु — दुश्मन।
परशुराम ने कहा, “सेवक वही होता है जो सेवा करे। जिसने शत्रु जैसा काम किया है, उससे युद्ध किया जाता है। सुनो राम! जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहसबाहु के समान मेरा शत्रु है।”
यहाँ परशुराम अपने क्रोध में धनुष तोड़ने वाले को अपना शत्रु घोषित कर देते हैं।
पद्यांश 13
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥ सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
शब्दार्थ: बिलगाउ — अलग कर दो। बिहाइ — छोड़कर। जैहहिं — जाएँगे। परसुधर — परशु धारण करने वाले परशुराम। अपमाने — अपमान करते हुए।
परशुराम ने कहा, “जिसने धनुष तोड़ा है, उसे इस सभा से अलग कर दो, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।” यह सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराए और परशुराम से व्यंग्यपूर्ण ढंग से बोले।
यहाँ से लक्ष्मण और परशुराम के बीच व्यंग्यपूर्ण संवाद शुरू होता है। इससे कविता में नाटकीयता बढ़ती है।
पद्यांश 14
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाइ। कबहुँ न असि रिस कीन्हहि गोसाइ॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
शब्दार्थ: लरिकाइ — बचपन में। रिस — क्रोध। ममता — लगाव। भृगुकुलकेतू — भृगुवंश के गौरव, परशुराम।
लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा, “हे स्वामी! हमने तो बचपन में ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं, तब आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इस धनुष से आपको इतनी ममता क्यों है?” लक्ष्मण की यह बात सुनकर परशुराम और अधिक क्रोधित हो गए।
यहाँ लक्ष्मण का साहस, व्यंग्य और निर्भीकता दिखाई देती है।
पद्यांश 15
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
शब्दार्थ: नृप बालक — राजकुमार। काल बस — विनाश के वश में। तिपुरारि — शिव। बिदित — प्रसिद्ध।
परशुराम ने लक्ष्मण से कहा, “अरे राजकुमार! तुम काल के वश होकर बिना सोचे-समझे बोल रहे हो। यह कोई साधारण धनुष नहीं था। यह त्रिपुरारी भगवान शिव का धनुष था, जिसे सारा संसार जानता है।”
यहाँ परशुराम के क्रोध, शिव-धनुष के महत्व और लक्ष्मण को दी गई चेतावनी का वर्णन है।
संक्षिप्त सारांश
सीता-स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष टूटने का समाचार सुनकर परशुराम क्रोधित होकर राजा जनक की सभा में आते हैं। उनका भयानक रूप देखकर सभी राजा भयभीत होकर उन्हें प्रणाम करते हैं। राजा जनक सीता को बुलाकर परशुराम को प्रणाम करवाते हैं। राम और लक्ष्मण भी परशुराम के चरणों में प्रणाम करते हैं। परशुराम राम के सुंदर रूप को देखकर कुछ क्षण उन्हें देखते रह जाते हैं, परंतु जब वे शिव-धनुष के टूटे हुए टुकड़े देखते हैं, तो उनका क्रोध फिर बढ़ जाता है।
वे राजा जनक से कठोर शब्दों में पूछते हैं कि धनुष किसने तोड़ा है। भय के कारण जनक कोई उत्तर नहीं दे पाते। सभा में सब लोग डर जाते हैं। सीता और उनकी माता भी बहुत चिंतित हो जाती हैं। तब श्रीराम शांत और विनम्र भाव से कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा। इस पर परशुराम क्रोधित होकर कहते हैं कि जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह उनका शत्रु है। वे उसे सभा से अलग करने की चेतावनी देते हैं।
यह सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराते हैं और व्यंग्य में कहते हैं कि हमने बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब आपने कभी इतना क्रोध नहीं किया। लक्ष्मण के इन वचनों से परशुराम और अधिक क्रोधित हो जाते हैं और कहते हैं कि यह साधारण धनुष नहीं, बल्कि भगवान शिव का प्रसिद्ध धनुष था।
विस्तृत सारांश
यह पाठ रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। इसका प्रसंग सीता-स्वयंवर से संबंधित है। राजा जनक की सभा में अनेक राजा उपस्थित थे। स्वयंवर की शर्त थी कि जो शिव-धनुष को उठाकर तोड़ेगा, वही सीता से विवाह करेगा। कई बड़े-बड़े राजा उस धनुष को उठा भी नहीं सके, परंतु श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष उठाया और वह टूट गया।
शिव-धनुष टूटने का समाचार सुनकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठे। वे सभा में भयानक रूप में पहुँचे। उनके आते ही सभी राजा भय से व्याकुल होकर खड़े हो गए और अपना-अपना परिचय देकर उन्हें प्रणाम करने लगे। राजा जनक ने भी उन्हें प्रणाम किया और सीता से भी प्रणाम करवाया। परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया। इसके बाद राम और लक्ष्मण ने भी उनके चरणों में प्रणाम किया।
जब परशुराम ने सभा में भीड़ का कारण पूछा, तो राजा जनक ने स्वयंवर की पूरी बात बताई। फिर परशुराम की दृष्टि शिव-धनुष के टूटे हुए टुकड़ों पर पड़ी। इसे देखकर उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने राजा जनक को कठोर वचन कहे और पूछा कि धनुष किसने तोड़ा है। उन्होंने धमकी दी कि यदि दोषी को तुरंत नहीं दिखाया गया, तो वे जनक के राज्य को नष्ट कर देंगे।
सभा में भय का वातावरण फैल गया। जनक डर के कारण उत्तर नहीं दे पाए। कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि अब राम संकट में पड़ेंगे। देवता, मुनि, नगरवासी, पुरुष, स्त्रियाँ सभी चिंतित हो गए। सीता की माता ने मन में सोचा कि विधाता ने बनी हुई बात बिगाड़ दी। सीता भी परशुराम के क्रोध से बहुत भयभीत हो गईं।
ऐसी स्थिति में श्रीराम ने अत्यंत शांत और विनम्र स्वर में परशुराम से कहा कि शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा, आप मुझे आज्ञा दें। राम की विनम्र बात सुनकर भी परशुराम शांत नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सेवक वही होता है जो सेवा करे, शत्रु जैसा काम करने वाले से युद्ध किया जाता है। जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह उनका शत्रु है।
परशुराम ने चेतावनी दी कि धनुष तोड़ने वाले को सभा से अलग कर दिया जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे। यह सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराए और व्यंग्य करते हुए बोले कि हमने बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब आप कभी क्रोधित नहीं हुए। इस धनुष पर इतनी ममता क्यों है? लक्ष्मण के इन वचनों से परशुराम का क्रोध और बढ़ गया। वे लक्ष्मण को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यह कोई साधारण धनुष नहीं, बल्कि भगवान शिव का प्रसिद्ध धनुष था।
इस प्रकार पाठ में राम की विनम्रता, लक्ष्मण की निर्भीकता, परशुराम का क्रोध और सभा की भयभीत मनःस्थिति का सुंदर चित्रण किया गया है।
शीर्षक की सार्थकता
इस पाठ का शीर्षक राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद पूर्णतः सार्थक है, क्योंकि पूरे प्रसंग का विकास संवादों के माध्यम से होता है। परशुराम का क्रोध, राम की विनम्रता और लक्ष्मण का व्यंग्य — ये सब संवादों के द्वारा ही प्रकट होते हैं। संवादों के कारण पाठ में नाटकीयता, रोचकता और चरित्रों की विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं।
पात्र-चित्रण
श्रीराम का चरित्र
श्रीराम शांत, धैर्यवान, विनम्र और मर्यादित हैं। जब पूरी सभा भयभीत है, तब भी वे न प्रसन्न होते हैं, न दुखी। वे संतुलित मन से परशुराम से विनम्र भाषा में बात करते हैं। वे परशुराम को “नाथ” कहकर संबोधित करते हैं और स्वयं को उनका सेवक मानते हैं। इससे उनका उदात्त चरित्र स्पष्ट होता है।
लक्ष्मण का चरित्र
लक्ष्मण साहसी, निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण भाषा बोलने वाले हैं। वे परशुराम की धमकी से नहीं डरते। वे मुस्कुराकर उत्तर देते हैं और कहते हैं कि बचपन में उन्होंने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं। उनके वचनों में राम के प्रति प्रेम और परशुराम के क्रोध के प्रति चुनौती दिखाई देती है।
परशुराम का चरित्र
परशुराम तेजस्वी, शिव-भक्त, पराक्रमी और क्रोधी ऋषि हैं। शिव-धनुष टूटने से वे अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। वे कठोर वचन बोलते हैं और सभा को धमकी देते हैं। उनकी भाषा से उनका रौद्र रूप और शिव-धनुष के प्रति गहरा लगाव प्रकट होता है।
राजा जनक का चरित्र
राजा जनक शिष्ट, विनम्र और मर्यादित राजा हैं। वे परशुराम को प्रणाम करते हैं और सीता से भी प्रणाम करवाते हैं। लेकिन परशुराम के क्रोध के सामने वे भयभीत हो जाते हैं और उत्तर नहीं दे पाते।
सीता का चरित्र
सीता इस प्रसंग में भयभीत और चिंतित दिखाई देती हैं। परशुराम के क्रोध को सुनकर उन्हें आधा क्षण भी कल्प के समान लंबा लगने लगता है। इससे उनके मन की चिंता और आशंका स्पष्ट होती है।
प्रमुख भाव
इस पाठ में कई भाव हैं—
भय: परशुराम के आने से सभा भयभीत हो जाती है। क्रोध: परशुराम शिव-धनुष टूटने से क्रोधित हैं। विनम्रता: राम परशुराम से शांत और नम्र भाषा में बात करते हैं। व्यंग्य: लक्ष्मण परशुराम से व्यंग्यपूर्ण वचन कहते हैं। चिंता: सीता और उनकी माता भविष्य को लेकर चिंतित हैं। कुटिलता: कुछ राजा जनक की स्थिति देखकर मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं।
भाषा-शैली
इस पाठ की भाषा अवधी है। इसमें दोहा और चौपाई छंद का प्रयोग हुआ है। भाषा सरल होते हुए भी भावपूर्ण और प्रभावशाली है। संवादों के कारण कविता में नाटकीयता आ गई है।
विशेषताएँ: संवादात्मक शैली, नाटकीयता, व्यंग्य, वीर और रौद्र रस, अवधी भाषा, दोहा-चौपाई छंद, पौराणिक संदर्भ।
काव्य-सौंदर्य
इस कविता में तुलसीदास ने संवादों के माध्यम से चरित्रों को जीवंत बना दिया है। परशुराम के कठोर वचन उनके क्रोध को दिखाते हैं, राम के विनम्र वचन उनके धैर्य को दिखाते हैं और लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण वचन उनके साहस को प्रकट करते हैं।
अलंकार
1. अनुप्रास अलंकार “अरि करनी करि करिअ लराई” यहाँ ‘र’ और ‘क’ ध्वनि की पुनरावृत्ति है।
2. अतिशयोक्ति अलंकार “अरध निमेष कलप सम बीता” आधे क्षण को कल्प के समान लंबा बताया गया है।
3. रूपक अलंकार “पद सरोज मेले दोउ भाई” यहाँ चरणों को कमल के समान न कहकर सीधे कमल कहा गया है।
रस
इस पाठ में मुख्य रूप से रौद्र रस और वीर रस है।
रौद्र रस: परशुराम के क्रोधपूर्ण वचनों में। वीर रस: लक्ष्मण के निर्भीक उत्तरों में। शांत भाव: श्रीराम के विनम्र और संतुलित व्यवहार में। भयानक भाव: सभा के भयभीत वातावरण में।
मुख्य पंक्तियाँ और उनका भाव
“हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” भाव: राम अत्यंत संतुलित, शांत और धैर्यवान हैं।
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” भाव: राम की विनम्रता और मर्यादा।
“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाइ।” भाव: लक्ष्मण का व्यंग्य और निर्भीकता।
“अति रिस बोले बचन कठोरा।” भाव: परशुराम का क्रोध और रौद्र रूप।
“अरध निमेष कलप सम बीता।” भाव: सीता की चिंता और भय।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
भृगुपति — परशुराम। कराला — भयानक। भुआला — राजा। सुभायँ — स्वभाव से। चितवहिं — देखते हैं। खुटानी — समाप्त होना। आसिष — आशीर्वाद। ढोटा — पुत्र। जोटा — जोड़ी। लोचन — आँखें। अनत — दूसरी ओर। चापखंड — धनुष के टुकड़े। रिस — क्रोध। बेगि — शीघ्र। महि — पृथ्वी। त्रास — भय। बिधि — विधाता। अरध निमेष — आधा क्षण। कलप — बहुत लंबा समय। भीरु — भयभीत। भंजनिहारा — तोड़ने वाला। आयसु — आज्ञा। कोही — क्रोधी। रिपु — शत्रु। बिहाइ — छोड़कर। लरिकाइ — बचपन। तिपुरारि — भगवान शिव। बिदित — प्रसिद्ध।
परीक्षा उपयोगी बिंदु
इस पाठ में सबसे महत्वपूर्ण बात राम और लक्ष्मण की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ हैं। राम कठिन परिस्थिति में भी विनम्र रहते हैं, जबकि लक्ष्मण अन्यायपूर्ण क्रोध का उत्तर व्यंग्य और तर्क से देते हैं। परशुराम का क्रोध पूरे वातावरण को भयभीत कर देता है। तुलसीदास ने इस प्रसंग में संवादों के माध्यम से चरित्रों की मानसिक स्थिति और स्वभाव को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया है।
पाठ से मिलने वाली शिक्षा
इस पाठ से हमें सीख मिलती है कि कठिन परिस्थिति में धैर्य और संतुलन बनाए रखना चाहिए। क्रोध से समस्या बढ़ती है, जबकि विनम्रता और मर्यादा से समस्या शांत हो सकती है। साथ ही, अन्याय या अनुचित आरोप के सामने साहस भी आवश्यक है। श्रीराम हमें विनम्रता और धैर्य सिखाते हैं, जबकि लक्ष्मण हमें निर्भीकता और आत्मसम्मान का महत्व बताते हैं।
अभ्यास और पुनरावृत्ति
संपूर्ण प्रश्नोत्तर और भाषा-अभ्यास
प्रश्न, उत्तर, तर्क, काव्य-बोध, व्याकरण तथा गतिविधियाँ मूल अध्ययन सामग्री के क्रम में दी गई हैं।
मौलिक अध्ययन-मार्गदर्शिका: NCERT Hindi Tutor · ncerthinditutor.com
मेरे उत्तर मेरे तर्क
प्रश्न 1. “पितु समेत किह किह निज नामा लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मन:स्थिति को दर्शाती है?
सही विकल्प — (ग) भय और शिष्टाचार
कारण: परशुराम का भयानक और क्रोधपूर्ण रूप देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा भयभीत हो गए। वे अपने पिता सहित अपना-अपना नाम बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि उनके मन में परशुराम के प्रति डर भी था और बड़ों के प्रति शिष्टाचार भी।
प्रश्न 2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
सही विकल्प — (ख) शिष्टता
कारण: राजा जनक ने परशुराम के सामने सिर झुकाकर प्रणाम किया और सीता को भी बुलाकर उनसे प्रणाम करवाया। यह राजा जनक के शिष्ट, विनम्र और संस्कारी व्यवहार को दिखाता है। इसलिए यहाँ उनकी शिष्टता प्रकट होती है।
प्रश्न 3. “अति रिस बोले बचन कठोरा” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
सही विकल्प — (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
कारण: परशुराम शिव-धनुष को भगवान शिव का पवित्र और महान धनुष मानते थे। जब उन्होंने उसके टूटे हुए टुकड़े देखे, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और राजा जनक से कठोर वचन कहने लगे। इसलिए उनके क्रोध का मूल कारण शिव-धनुष का टूटना था।
प्रश्न 4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
सही विकल्प — (ख) विनम्रता और मर्यादा
कारण: श्रीराम ने परशुराम से बहुत विनम्रता से कहा कि शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा। राम ने क्रोधित परशुराम के सामने भी अहंकार या कठोरता नहीं दिखाई। इससे उनकी विनम्रता, शालीनता और मर्यादित व्यवहार प्रकट होता है।
प्रश्न 5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
सही विकल्प — (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
कारण: परशुराम ने सभा में सबको धमकी दी थी। लक्ष्मण को उनका यह क्रोध और धमकी अनुचित लगी। इसलिए वे मुस्कुराए और व्यंग्यपूर्ण वचन बोलकर परशुराम को चुनौती देने लगे। उनके शब्दों में निर्भीकता, तर्क और व्यंग्य का भाव था।
मेरी समझ मेरे विचार
प्रश्न 1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
“अरध निमेष कलप सम बीता” का अर्थ है— आधा क्षण भी कल्प के समान बहुत लंबा लगने लगा। यह पंक्ति सीता के संदर्भ में कही गई है।
जब सीता ने परशुराम के क्रोध और उनके कठोर स्वभाव के बारे में सुना, तो वे बहुत डर गईं। उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं परशुराम के क्रोध के कारण राम को कोई संकट न आ जाए और उनका विवाह रुक न जाए। इसी भय और चिंता के कारण सीता को थोड़ा-सा समय भी बहुत लंबा लगने लगा।
इस पंक्ति से सीता की चिंता, भय और मानसिक व्याकुलता प्रकट होती है।
प्रश्न 2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
इस पंक्ति में परशुराम कह रहे हैं कि जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, उसे सभा से अलग कर दिया जाए, नहीं तो वे सभी राजाओं को मार डालेंगे।
इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर बहुत भयावह प्रभाव पड़ा होगा। सभी राजा डर गए होंगे, क्योंकि परशुराम अत्यंत शक्तिशाली और क्रोधी माने जाते थे। उनकी बात केवल धमकी नहीं थी, बल्कि उनके पराक्रम के कारण सभी को सच लग रही थी।
सभा में भय, चिंता और तनाव फैल गया होगा। कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न भी हुए होंगे, क्योंकि उन्हें लगा होगा कि अब राम संकट में पड़ जाएँगे। इस पंक्ति से पता चलता है कि परशुराम के क्रोध ने पूरी सभा को भयभीत कर दिया था।
प्रश्न 3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
मेरी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग अधिक उचित है।
परशुराम पहले से ही अत्यंत क्रोधित थे। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति उन्हें व्यंग्य या चुनौती देता, तो उनका क्रोध और बढ़ सकता था। लक्ष्मण के तर्क और व्यंग्य से यही हुआ कि परशुराम और अधिक क्रोधित हो गए। दूसरी ओर, राम ने शांत, विनम्र और मर्यादित भाषा में बात की। उन्होंने परशुराम को “नाथ” कहकर संबोधित किया और स्वयं को उनका सेवक बताया।
क्रोध को शांत करने के लिए क्रोध या कटु वचन नहीं, बल्कि धैर्य और विनम्रता अधिक प्रभावी होते हैं। इसलिए इस प्रसंग में राम का मार्ग अधिक सही और उपयोगी है। राम का व्यवहार हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थिति में भी संयम, सम्मान और मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
प्रश्न 4. ‘हदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरा।’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
यह पंक्ति श्रीराम के धैर्य, संयम, गंभीरता, विनम्रता और भावनात्मक संतुलन को दर्शाती है।
सभा में सभी लोग परशुराम के क्रोध से भयभीत थे। सीता चिंतित थीं, राजा जनक डर के कारण उत्तर नहीं दे पा रहे थे, लक्ष्मण व्यंग्यपूर्ण उत्तर देने लगे और परशुराम क्रोध से भरे हुए थे। लेकिन श्रीराम न तो घबराए, न क्रोधित हुए और न ही अत्यधिक प्रसन्न दिखे। वे पूरी तरह शांत और संतुलित रहे।
राम का यही भावनात्मक संतुलन उन्हें अन्य पात्रों से अलग बनाता है। वे कठिन स्थिति में भी मर्यादा नहीं छोड़ते। वे क्रोध का उत्तर क्रोध से नहीं, बल्कि विनम्रता से देते हैं। इससे पता चलता है कि श्रीराम केवल वीर ही नहीं, बल्कि धीर, गंभीर, विनम्र और आदर्श व्यक्तित्व के स्वामी हैं।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
प्रश्न 1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
मैं राजा जनक की सभा में उपस्थित एक राजा था। सीता-स्वयंवर का वातावरण बहुत भव्य था। अनेक राजा वहाँ आए हुए थे। सभी की इच्छा थी कि वे शिव-धनुष को उठाकर सीता से विवाह करें, परंतु कोई भी उस धनुष को हिला तक नहीं सका। तभी श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से शिव-धनुष उठाया और वह टूट गया। सभा में आश्चर्य और आनंद छा गया।
लेकिन कुछ समय बाद परशुराम जी क्रोध से भरे हुए सभा में आए। उनका रूप बहुत भयानक था। उन्हें देखते ही सभी राजा भयभीत हो गए और अपना-अपना नाम बताकर उन्हें प्रणाम करने लगे। राजा जनक ने भी उन्हें प्रणाम किया और सीता से भी प्रणाम करवाया। राम और लक्ष्मण ने भी उनके चरणों में प्रणाम किया।
जब परशुराम जी ने भूमि पर शिव-धनुष के टूटे हुए टुकड़े देखे, तो उनका क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने राजा जनक से कठोर वचन कहे और पूछा कि धनुष किसने तोड़ा। राजा जनक डर के कारण चुप रहे। पूरी सभा भय और चिंता में डूब गई। सीता और उनकी माता भी चिंतित हो गईं।
तब श्रीराम ने बहुत विनम्रता से कहा कि शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा। परशुराम जी इससे शांत नहीं हुए। उन्होंने कहा कि जिसने धनुष तोड़ा है, वह उनका शत्रु है। यह सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराए और व्यंग्यपूर्ण उत्तर देने लगे। लक्ष्मण के वचनों से परशुराम जी और अधिक क्रोधित हो गए।
अंत में श्रीराम ने अपनी विनम्रता, धैर्य और मर्यादा से परिस्थिति को संभाला। धीरे-धीरे परशुराम जी का क्रोध शांत हुआ। जब उन्हें श्रीराम की दिव्यता का ज्ञान हुआ, तो वे शांत होकर चले गए। उस दिन मैंने देखा कि क्रोध को क्रोध से नहीं, बल्कि विनम्रता और धैर्य से शांत किया जा सकता है।
प्रश्न 2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? संकेत— सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?
राजा जनक परशुराम के क्रोध से बहुत डर गए थे, इसलिए वे उत्तर नहीं दे पा रहे थे। यह देखकर सभा में उपस्थित कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो गए होंगे, क्योंकि वे श्रीराम से ईर्ष्या करते थे। वे स्वयं शिव-धनुष नहीं उठा सके थे, जबकि राम ने उसे तोड़ दिया था। इसलिए वे चाहते होंगे कि राम और जनक किसी संकट में पड़ जाएँ।
उन राजाओं को लगा होगा कि परशुराम के क्रोध के कारण अब राम को दंड मिलेगा और सीता-विवाह में बाधा आ जाएगी। इसी कारण वे जनक की भयभीत स्थिति देखकर प्रसन्न हुए।
यह पंक्ति मनुष्य के व्यवहार की एक सच्चाई को उजागर करती है कि कुछ लोग दूसरों की सफलता से जलते हैं और उनके संकट में पड़ने पर भीतर-ही-भीतर प्रसन्न होते हैं। ऐसे लोग सामने से कुछ नहीं कहते, परंतु दूसरों की परेशानी में आनंद अनुभव करते हैं। इसे ईर्ष्या और कुटिलता कहा जाता है।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
संवादों की विशेषता और पंक्तियों के उदाहरण
1. राम की विनम्रता
पंक्ति: “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥”
इस पंक्ति में राम परशुराम को “नाथ” कहकर संबोधित करते हैं और धनुष तोड़ने वाले को उनका दास बताते हैं। इससे राम की विनम्रता और मर्यादा प्रकट होती है।
2. परशुराम का रौद्र रूप
पंक्ति: “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥”
इस पंक्ति में परशुराम क्रोध से भरे हुए कठोर वचन बोलते हैं। इससे उनका रौद्र रूप स्पष्ट दिखाई देता है।
3. लक्ष्मण का प्रत्युत्तर
पंक्ति: “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाइ। कबहुँ न असि रिस कीन्हहि गोसाइ॥”
इस पंक्ति में लक्ष्मण व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि हमने तो बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब आपने इतना क्रोध नहीं किया। इससे लक्ष्मण का निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण प्रत्युत्तर दिखाई देता है।
4. पौराणिक संदर्भ
पंक्ति: “धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
यहाँ “तिपुरारि” शब्द भगवान शिव के लिए आया है। शिव-धनुष का उल्लेख पौराणिक संदर्भ को स्पष्ट करता है।
5. नाटकीयता
पंक्ति: सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥”
इस पंक्ति में परशुराम सभा को चेतावनी देते हैं कि धनुष तोड़ने वाले को अलग कर दो, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे। इससे सभा में भय, तनाव और नाटकीयता उत्पन्न होती है।
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
| भाव / मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | “बिधि अब सँवरी बात बिगारी” | सीता की माता सुनयना | वे सोच रही हैं कि परशुराम के क्रोध से सीता का विवाह संकट में पड़ सकता है। |
| क्रोध | “अति रिस बोले बचन कठोरा” | परशुराम | शिव-धनुष टूट जाने के कारण परशुराम अत्यंत क्रोधित हैं। |
| व्यग्रता | “अरध निमेष कलप सम बीता” | सीता | परशुराम के क्रोध के कारण सीता भय और चिंता में हैं। उन्हें थोड़ा-सा समय भी बहुत लंबा लग रहा है। |
| भय | “उठे सकल भय बिकल भुआला” | सभा में उपस्थित राजा | परशुराम के भयानक रूप को देखकर सभी राजा डर गए। |
| संयम / विनम्रता | “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” | श्रीराम | राम क्रोधित परशुराम के सामने भी शांत और विनम्र बने रहते हैं। |
| ईर्ष्या / कुटिलता | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं” | अन्य कुटिल राजा | वे राम की सफलता से ईर्ष्या करते थे और जनक की परेशानी देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। |
विश्लेषण
प्रश्न. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।” परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
यह पंक्ति उस समय की है, जब परशुराम शिव-धनुष के टूटे हुए टुकड़ों को देखकर अत्यंत क्रोधित हो गए थे। उन्होंने राजा जनक से कठोर शब्दों में पूछा कि धनुष किसने तोड़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी धमकी दी कि यदि दोषी को तुरंत नहीं दिखाया गया, तो वे जनक के राज्य को नष्ट कर देंगे।
इस स्थिति में राजा जनक का चुप रहना केवल भय का परिणाम नहीं था, बल्कि उसमें विवेक भी था। परशुराम बहुत क्रोधित थे। यदि जनक तुरंत राम का नाम ले लेते, तो परशुराम का क्रोध सीधे राम पर आ सकता था और सभा में बड़ा विवाद हो सकता था। इसलिए जनक ने मौन रहकर स्थिति को और बिगड़ने से बचाने का प्रयास किया।
हाँ, यह भी सत्य है कि परशुराम के भयानक क्रोध से जनक भयभीत थे, इसलिए वे तुरंत उत्तर नहीं दे पाए। लेकिन राजा होने के कारण वे जानते थे कि ऐसे समय में जल्दबाजी से बोलना उचित नहीं होगा। उनके मौन में भय भी था और परिस्थिति को समझने वाला विवेक भी।
निष्कर्ष: इससे स्पष्ट होता है कि जनक का मौन भयजनित होने के साथ-साथ विवेकपूर्ण भी था। वे क्रोधित परशुराम के सामने बिना सोचे-समझे उत्तर देकर स्थिति को और अधिक गंभीर नहीं बनाना चाहते थे।
काव्य-पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
यदि मैं इन पंक्तियों को मंच पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर क्रोध, रोष, कठोरता और चेतावनी का भाव होता। इन पंक्तियों में परशुराम लक्ष्मण को डाँट रहे हैं और उन्हें चेतावनी दे रहे हैं कि वे बिना सोचे-समझे बोल रहे हैं। इसलिए मंच पर इन्हें बोलते समय आवाज़ गंभीर और तेज होती, भौंहें तनी हुई होतीं और चेहरे पर रौद्र भाव दिखाई देता।
(ख) निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे?
| पात्र | प्रदर्शित भाव |
|---|---|
| परशुराम | क्रोध, रौद्रता, अहंकार, चेतावनी |
| राजा जनक | भय, चिंता, विनम्रता, असमंजस |
| लक्ष्मण | साहस, व्यंग्य, निर्भीकता, प्रत्युत्तर |
| राम | विनम्रता, धैर्य, शांति, मर्यादा |
| सभा में उपस्थित अन्य राजा | भय, ईर्ष्या, कुटिल प्रसन्नता, असुरक्षा |
विषयों से संवाद
प्रश्न 1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
हमें जीवन में कई परिस्थितियों में विनम्रता, मर्यादा, धैर्य और उदात्त चरित्र का परिचय देना पड़ता है। जब कोई व्यक्ति हमसे क्रोध में बात करे, तब हमें भी क्रोध करने के स्थान पर शांत रहना चाहिए। इससे विवाद बढ़ने के बजाय कम होता है।
विद्यालय में यदि कोई मित्र हमसे गलत बात कह दे या हमारा मजाक उड़ाए, तो हमें तुरंत झगड़ा नहीं करना चाहिए। हमें धैर्य से बात समझानी चाहिए। परिवार में भी कभी-कभी बड़े हमें डाँटते हैं। उस समय हमें मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और विनम्रता से अपनी बात कहनी चाहिए।
कक्षा में समूह-कार्य करते समय भी धैर्य की आवश्यकता होती है। यदि किसी साथी की राय हमसे अलग हो, तो उसकी बात सुननी चाहिए। खेल के मैदान में हारने पर भी हमें संयम रखना चाहिए और जीतने पर अहंकार नहीं करना चाहिए।
इस प्रकार राम की तरह विनम्रता, मर्यादा और धैर्य हमें घर, विद्यालय, समाज, मित्रों के बीच और कठिन परिस्थितियों में दिखाना चाहिए। ये गुण हमें अच्छा विद्यार्थी, अच्छा मित्र और अच्छा नागरिक बनाते हैं।
प्रश्न 2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
स्वयंवर का एक प्रसिद्ध उदाहरण द्रौपदी स्वयंवर है। महाभारत में द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। इस स्वयंवर में अनेक राजाओं और वीरों को आमंत्रित किया गया था।
स्वयंवर में एक कठिन शर्त रखी गई थी। ऊपर घूमती हुई मछली की आँख को नीचे जल में उसका प्रतिबिंब देखकर निशाना लगाना था। अनेक राजा और योद्धा इस लक्ष्य को भेदने में असफल रहे। अंत में अर्जुन ने ब्राह्मण वेश में आकर यह कठिन लक्ष्य भेद दिया।
द्रौपदी ने अर्जुन को अपना वर चुना। इस प्रसंग से पता चलता है कि प्राचीन समय में स्वयंवर में कन्या के विवाह के लिए योग्य वर का चयन किसी परीक्षा, शौर्य या विशेष कौशल के आधार पर किया जाता था। यह प्रथा वीरता, योग्यता और पराक्रम को महत्व देती थी।
सृजन
प्रश्न 1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
सीता का मौन भाव: माता! यह कैसी स्थिति बन गई है? अभी कुछ देर पहले पूरी सभा में आनंद था। श्रीराम ने शिव-धनुष तोड़कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। मेरे मन में सुख और आशा थी, पर अब परशुराम जी के क्रोध को देखकर भय लग रहा है। कहीं इस क्रोध के कारण श्रीराम को कोई कष्ट न हो जाए।
सुनयना का मौन भाव: पुत्री! मैं भी बहुत चिंतित हूँ। विधाता ने बनी-बनाई बात कहीं बिगाड़ न दी हो। परशुराम जी बहुत क्रोधी और तेजस्वी हैं। यदि वे शांत न हुए, तो सभा में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
सीता का मौन भाव: माता! श्रीराम बहुत शांत और विनम्र हैं। मुझे विश्वास है कि वे अपनी मर्यादा और धैर्य से इस स्थिति को संभाल लेंगे। फिर भी लक्ष्मण जी के व्यंग्यपूर्ण वचन सुनकर मेरा मन काँप रहा है।
सुनयना का मौन भाव: बेटी! संकट की इस घड़ी में हमें धैर्य रखना चाहिए। श्रीराम का शांत स्वभाव ही इस क्रोध को शांत कर सकता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि सब मंगल हो।
सीता का मौन भाव: हाँ माता! मैं भी मन-ही-मन यही प्रार्थना कर रही हूँ कि परशुराम जी शांत हो जाएँ और श्रीराम पर कोई संकट न आए।
प्रश्न 2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। संकेत— लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि।
मैं सीता हूँ। स्वयंवर की सभा में जब श्रीराम ने शिव-धनुष तोड़ा, तो मेरे मन में आनंद और आशा का संचार हुआ। मुझे लगा कि अब मेरा विवाह ऐसे वीर, शांत और मर्यादित पुरुष से होगा, जो वास्तव में श्रेष्ठ हैं। परंतु कुछ ही समय बाद परशुराम जी क्रोध से भरे हुए सभा में आए। उनका भयानक रूप देखकर मेरा हृदय भय से भर गया।
जब उन्होंने शिव-धनुष तोड़ने वाले के विषय में कठोर वचन कहे, तो मेरे मन में चिंता होने लगी। मुझे डर था कि कहीं उनके क्रोध के कारण श्रीराम को कोई संकट न आ जाए। राजा जनक भी चुप थे, इसलिए मेरी चिंता और बढ़ गई।
फिर श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से परशुराम जी से बात की। उनके शांत और मर्यादित वचन सुनकर मुझे गर्व हुआ। मुझे लगा कि श्रीराम केवल पराक्रमी ही नहीं, बल्कि बहुत धैर्यवान और विनम्र भी हैं।
लेकिन जब लक्ष्मण जी ने परशुराम को व्यंग्यपूर्ण उत्तर देना शुरू किया, तो मेरे मन में कई भाव एक साथ उत्पन्न हुए। उनकी निर्भीकता देखकर मुझे गर्व भी हुआ, पर परशुराम के बढ़ते क्रोध को देखकर भय भी लगा। कभी-कभी लक्ष्मण जी के तीखे वचन सुनकर हल्की मुस्कान भी आती होगी, लेकिन तुरंत यह शंका भी उठती होगी कि कहीं बात और न बढ़ जाए।
इस पूरी घटना में मैंने देखा कि सभा में अलग-अलग पात्र अलग-अलग भावों से भरे थे। परशुराम क्रोध में थे, जनक भय और चिंता में थे, लक्ष्मण साहस और व्यंग्य से उत्तर दे रहे थे, पर श्रीराम शांत और संतुलित थे। मेरे लिए यह समय अत्यंत कठिन था, क्योंकि एक-एक पल युग के समान लंबा लग रहा था।
प्रश्न 3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
मेरा नाम __________ है। मैं कक्षा 9 का विद्यार्थी हूँ। मैं अपने माता-पिता, गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करता हूँ। मुझे पढ़ाई के साथ-साथ नई चीजें सीखना पसंद है।
मैं ईमानदारी, समय-पालन और अनुशासन को जीवन में बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ। मैं कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखने का प्रयास करता हूँ। मुझे अपने मित्रों की सहायता करना अच्छा लगता है।
मेरी रुचि पढ़ाई, खेल, लेखन और रचनात्मक कार्यों में है। मैं अपने जीवन में एक अच्छा, जिम्मेदार और उपयोगी नागरिक बनना चाहता हूँ। मेरा प्रयास रहता है कि मैं अपने व्यवहार से अपने परिवार, विद्यालय और समाज का नाम रोशन करूँ।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
परशुराम के लिए प्रयुक्त विभिन्न नाम
कविता में परशुराम के लिए कई नाम आए हैं—
| नाम | अर्थ |
|---|---|
| भृगुपति | भृगुवंश के स्वामी |
| परसुधर / परशुधर | परशु यानी फरसा धारण करने वाले |
| भृगुकुलकेतू | भृगुकुल के गौरव या दीपक |
| मुनि कोही | क्रोधी मुनि |
| भृगुपति | भृगुवंशी परशुराम |
कविता की विशेषताएँ और उदाहरण
| विशेषता | अर्थ | पुस्तक में दिया गया उदाहरण | एक और उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | “अरि करनी करि करिअ लराई” | “पितु समेत कहि कहि निज नामा” |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | “अरध निमेष कलप सम बीता” | “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू” |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | “पद सरोज मेले दोउ भाई” | “मार मद मोचन” |
| दोहा-चौपाई क्रम | चौपाई के बाद दोहा का प्रयोग | पाठ में चौपाइयों के बाद दोहा आता है | “बहुरि बिलोकि बिदेह सन…” |
| संवादात्मक शैली | पात्रों के कथन से कथा आगे बढ़ना | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा…” | “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा” |
| नाटकीयता | तनाव और उत्सुकता उत्पन्न होना | “न त मारे जैहहिं सब राजा” | “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू” |
बहुभाषिकता
अवधी शब्द, खड़ी बोली और मेरी भाषा में शब्द
| अवधी शब्द | खड़ी बोली हिंदी का शब्द | मेरी भाषा / बोलचाल का शब्द |
|---|---|---|
| कोही | क्रोधी | गुस्सैल |
| वेषु | वेष | रूप / पहनावा |
| भुआला | राजा | राजा |
| चितवहिं | देखते हैं | देखते हैं |
| बहोरि | फिर | फिर से |
| आसिष | आशीर्वाद | आशीर्वाद |
| ढोटा | पुत्र | बेटा |
| लोचन | आँखें | आँख |
| रिस | क्रोध | गुस्सा |
| बेगि | शीघ्र | जल्दी |
| महि | पृथ्वी | धरती |
| त्रास | भय | डर |
| बिधि | विधाता | भगवान |
| भीरु | भयभीत | डरा हुआ |
| आयसु | आज्ञा | आदेश |
| लरिकाइ | बचपन | बालपन |
लोक में भाषा
शब्दों से संबंधित लोकोक्तियाँ, अर्थ और वाक्य-प्रयोग
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ | वाक्य-प्रयोग |
|---|---|---|---|
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास और मनोबल से सफलता मिलती है। | परीक्षा में सफल होने के लिए मजबूत मन रखना जरूरी है, क्योंकि मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। |
| राम | राम नाम सत्य है। | जीवन नश्वर है, सत्य और ईश्वर ही स्थायी हैं। | मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंत में राम नाम सत्य है। |
| राजा | अंधेर नगरी चौपट राजा। | जहाँ शासन या व्यवस्था खराब हो। | जिस कक्षा में अनुशासन न हो, वहाँ अंधेर नगरी चौपट राजा जैसी स्थिति हो जाती है। |
| बात | बात का बतंगड़ बनाना। | छोटी बात को बहुत बढ़ा देना। | छोटी-सी गलती पर झगड़ा करना बात का बतंगड़ बनाना है। |
| सिर | सिर मुंडाते ही ओले पड़ना। | काम शुरू करते ही परेशानी आ जाना। | नया काम शुरू करते ही इतनी समस्याएँ आ गईं कि सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए। |
गद्य-रूप
प्रश्न. नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए—
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
परशुराम के कठोर प्रश्न और क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर राजा जनक बहुत डर गए। भय के कारण वे कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। जनक को इस स्थिति में देखकर सभा में उपस्थित कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। उन्हें लगा कि अब जनक और राम किसी संकट में पड़ सकते हैं।
उधर देवता, मुनि, नाग, नगर के पुरुष और स्त्रियाँ सभी बहुत चिंतित थे। परशुराम के क्रोध से सभी के हृदय में भय और तनाव भर गया था। पूरी सभा में चिंता और डर का वातावरण छा गया था।
गतिविधियाँ
प्रश्न 1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है।
| कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता सुनयना |
|---|---|---|---|---|---|
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | ✓ | ||||
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | ✓ | ||||
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | ✓ | ||||
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | ✓ | ||||
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | ✓ | ||||
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | ✓ | ||||
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | ✓ | ||||
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | ✓ |
प्रश्न 2. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
दृश्य नाटक: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
पात्र: सूत्रधार, राजा जनक, श्रीराम, लक्ष्मण, परशुराम, विश्वामित्र, सीता, सुनयना, राजा, सभा के लोग।
मंच पर राजा जनक की सभा दिखाई जाए। बीच में टूटे हुए शिव-धनुष के टुकड़े रखे जाएँ। एक ओर सीता और उनकी सखियाँ बैठी हों। दूसरी ओर राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र खड़े हों। पीछे राजाओं और नगरवासियों की भीड़ दिखाई जाए।
राम और लक्ष्मण राजकुमारों की वेशभूषा में हों। परशुराम जटाधारी, क्रोधपूर्ण रूप में, कंधे पर फरसा लिए हुए आएँ। राजा जनक राजसी वेशभूषा में हों। सीता और सुनयना पारंपरिक वस्त्रों में हों।
ध्वनि और संगीत: शुरू में मंगल ध्वनि और शंख की आवाज़ हो। परशुराम के आगमन पर गंभीर नगाड़े, तेज मृदंग और डर पैदा करने वाली ध्वनि हो। राम के बोलते समय मधुर और शांत संगीत बजे। लक्ष्मण के संवाद के समय हल्का व्यंग्यात्मक भाव दिखाने वाली धुन हो।
नाटक
सूत्रधार: राजा जनक की सभा में शिव-धनुष टूट चुका है। सभी लोग आश्चर्य और आनंद में हैं। तभी क्रोध से भरे परशुराम जी सभा में प्रवेश करते हैं।
परशुराम: कहो जनक! यह इतनी भीड़ क्यों है? यहाँ क्या हुआ है?
जनक: हे मुनिवर! यहाँ सीता-स्वयंवर का आयोजन था। इसी कारण अनेक राजा यहाँ आए हैं।
परशुराम: तो यह शिव-धनुष किसने तोड़ा? तुरंत बताओ, नहीं तो मैं तुम्हारे राज्य को नष्ट कर दूँगा।
सभा के राजा: हे मुनिवर! हम भयभीत हैं। कृपया क्रोध शांत कीजिए।
सीता की माता सुनयना: हाय! विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। अब न जाने क्या होगा।
राम: हे नाथ! शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है? मुझसे क्यों नहीं कहते?
परशुराम: राम! सेवक वह होता है जो सेवा करे। जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह मेरा शत्रु है। उसे सभा से अलग कर दो, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।
लक्ष्मण: हे मुनिवर! हमने बचपन में ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब आपने इतना क्रोध नहीं किया। इस धनुष पर इतनी ममता क्यों है?
परशुराम: अरे राजकुमार! तुम काल के वश होकर बिना सोचे बोल रहे हो। यह कोई साधारण धनुष नहीं था। यह भगवान शिव का धनुष था, जिसे सारा संसार जानता है।
राम: हे मुनिवर! आप क्रोध त्यागिए। हम आपके सेवक हैं। जो भी अपराध हुआ है, उसके लिए क्षमा कीजिए।
सूत्रधार: श्रीराम की विनम्रता और मर्यादित वचनों से अंत में परशुराम का क्रोध शांत होने लगा। उन्होंने राम की महानता को पहचाना और सभा से चले गए।
समापन संदेश: क्रोध को क्रोध से नहीं, बल्कि विनम्रता, धैर्य और मर्यादा से शांत किया जा सकता है।
प्रश्न 3. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
विषय: कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है
मैं इस विचार से सहमत हूँ कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है। सत्य बोलना आसान नहीं होता, विशेषकर तब जब सामने कोई शक्तिशाली, क्रोधित या प्रभावशाली व्यक्ति हो। फिर भी सत्य बोलने वाला व्यक्ति अंत में सम्मान पाता है।
यदि हम डरकर झूठ बोलते हैं, तो कुछ समय के लिए संकट टल सकता है, लेकिन बाद में बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। सत्य में शक्ति होती है। सत्य बोलने से हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है और लोग हम पर विश्वास करते हैं।
विद्यालय में यदि कोई विद्यार्थी गलती करता है, तो उसे अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। परीक्षा में नकल करने के बजाय कम अंक प्राप्त करना बेहतर है। परिवार में भी यदि हमसे कोई भूल हो जाए, तो उसे छिपाने के बजाय सच बोलना चाहिए।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद में भी कठिन परिस्थिति है। परशुराम क्रोध में हैं, सभा भयभीत है, फिर भी सत्य छिपाया नहीं जा सकता। श्रीराम विनम्रता से बात करते हैं और परिस्थिति को संभालते हैं। इससे सीख मिलती है कि सत्य बोलते समय भाषा भी संयमित और मर्यादित होनी चाहिए।
निष्कर्ष: कठिन परिस्थितियों में सत्य कहना साहस, ईमानदारी और चरित्र की मजबूती को दर्शाता है। सत्य बोलने वाला व्यक्ति समाज में विश्वास और सम्मान प्राप्त करता है।
मेरी पहेली
नीचे दिए गए शब्दों पर पहेलियाँ बनाई गई हैं।
1. समाचार
पहेली: मैं दूर-दूर की बातें लाता, नई घटना सबको बतलाता। कभी खुशी, कभी चिंता लाऊँ, बताओ मैं क्या कहलाऊँ?
समाचार
2. धनुष
पहेली: लकड़ी-सा तन, डोरी साथ, वीरों के हाथों मेरी बात। राम ने मुझको हाथ लगाया, सभा ने अद्भुत दृश्य पाया।
धनुष
3. मन
पहेली: न आँखों से दिखता हूँ, न हाथों से पकड़ा जाता। कभी खुश, कभी उदास, हर भाव मुझमें आता।
मन
4. नाग
पहेली: रेंग-रेंगकर चलता हूँ, फन फैलाकर डराता हूँ। कथा-कहानी में भी आता, धरती पर बिल में रह जाता।
नाग
5. नगर
पहेली: घर, सड़कें, बाजार यहाँ, लोगों का परिवार यहाँ। गाँव से बड़ा मेरा आकार, बताओ मेरा क्या नाम है यार?
नगर
भाषा संगम
इनके अतिरिक्त अन्य भाषा में
अंग्रेज़ी में धनुष को “Bow” कहते हैं।
वाक्य को अपनी मातृभाषा में लिखिए
मूल पंक्ति है—
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥”
सरल हिंदी में
परशुराम बहुत क्रोध में कठोर वचन बोलते हुए कहने लगे— “हे मूर्ख जनक! बताओ, इस धनुष को किसने तोड़ा?”
अंग्रेज़ी में
Parashurama spoke harsh words in great anger and said, “O foolish Janaka! Tell me, who broke this bow?”
बोलचाल की हिंदी में
परशुराम जी बहुत गुस्से में बोले— “अरे जनक! जल्दी बताओ, यह धनुष किसने तोड़ा?”