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अध्याय 13: पृथ्वी एक तंत्र – ऊर्जा, द्रव्य और जीवन

नीचे अध्याय के संपूर्ण नोट्स, सरल व्याख्या, महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ, गतिविधियाँ और पुनरावृत्ति बिंदु पढ़ें।

अन्वेषणहिंदी माध्यमनोट्स / व्याख्या
कक्षा
9
विषय
विज्ञान
पुस्तक
अन्वेषण
माध्यम
Hindi
अध्याय 13 के संपूर्ण नोट्स एवं सारांश

कक्षा 9 विज्ञान के अध्याय ‘पृथ्वी एक तंत्र – ऊर्जा, द्रव्य और जीवन’ के ये नोट्स पृथ्वी के मंडलों, सौर ऊर्जा, वायुमंडल, जलमंडल, पवनों, महासागरीय धाराओं और जैव-भू-रासायनिक चक्रों के परस्पर संबंध को समझाते हैं।

अध्याय नोट्स

1. परिचय

पृथ्वी पर जीवन का संचालन ऊर्जा और द्रव्य के निरंतर प्रवाह से होता है। सूर्य पृथ्वी के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी का गर्म आंतरिक भाग तथा वायु, जल और चट्टानों में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ भी ऊर्जा और द्रव्य के प्रवाह में योगदान देती हैं।

पृथ्वी एक परस्पर संबद्ध तंत्र है, जिसमें पाँच प्रमुख मंडल सम्मिलित हैं:

मंडलविवरण और उदाहरण
भूमंडलठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ और पृथ्वी का आंतरिक भाग; जैसे—दक्कन का पठार और थार मरुस्थल
जलमंडलमहासागर, नदियाँ, झीलें तथा भूजल जैसे द्रव जल के स्रोत
हिममंडलहिम, बर्फ, हिमालयी हिमानियाँ तथा ध्रुवीय हिम-छत्रक
वायुमंडलपृथ्वी के चारों ओर उपस्थित वायु का आवरण
जैवमंडलसभी जीव और उनके पर्यावास; जैसे—वन, खेत, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ और महासागरीय प्लवक

ये सभी मंडल एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक मंडल में होने वाला परिवर्तन दूसरे मंडलों को भी प्रभावित कर सकता है।

अध्याय नोट्स

2. क्रियाकलाप 13.1—आइए, अन्वेषण करें

उद्देश्य

पृथ्वी के विभिन्न मंडलों के बीच संबंधों को समझना।

प्रमुख अवलोकन

  • चित्र में भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल, वायुमंडल और जैवमंडल के उदाहरण पहचाने जाते हैं।
  • हिम पिघलकर झील या नदी में मिलती है। इस प्रकार हिममंडल का जल जलमंडल का भाग बन जाता है।
  • यदि कुछ वर्षों तक शीतकाल में हिमपात कम हो, तो ग्रीष्मकाल में झील का जल-स्तर घट सकता है।
  • जल की कमी से घास की वृद्धि कम होगी और भेड़ों के लिए भोजन कम उपलब्ध होगा।

निष्कर्ष

किसी एक मंडल में उत्पन्न विक्षोभ अन्य मंडलों में भी परिवर्तन ला सकता है। उदाहरण के लिए:

  • अरब सागर का जल अधिक गर्म होने पर वाष्पीकरण बढ़ता है।
  • इससे दक्षिण-पश्चिम मानसून में उतार-चढ़ाव आ सकता है।
  • कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और अन्य क्षेत्रों में सूखा पड़ सकता है।
  • हिमानियों के पिघलने से समुद्र का जल-स्तर बढ़ सकता है।
  • तटीय शहरों और जैवमंडल के पर्यावासों को खतरा हो सकता है।

अध्याय नोट्स

3. पृथ्वी का असमान ऊष्मीकरण

पृथ्वी पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर विकिरण है। यह ऊर्जा विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचती है।

विद्युतचुंबकीय तरंगों की विशेषताएँ

  • ये निर्वात में भी गति कर सकती हैं।
  • निर्वात में प्रकाश का वेग लगभग 3 × 10⁸ m/s होता है।
  • विद्युतचुंबकीय विकिरण के पूरे परास को विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम कहते हैं।
  • इसमें गामा किरणें, X-किरणें, पराबैंगनी किरणें, दृश्य प्रकाश, अवरक्त किरणें, सूक्ष्मतरंगें और रेडियो तरंगें सम्मिलित हैं।
  • गामा किरणें और X-किरणें अधिक ऊर्जावान तथा जीवन के लिए हानिकारक हो सकती हैं।
  • सूर्य की लगभग 99 प्रतिशत ऊर्जा पराबैंगनी, दृश्य और अवरक्त विकिरण के रूप में प्राप्त होती है।
  • अधिकांश गामा और X-किरणें ऊपरी वायुमंडल द्वारा रोक ली जाती हैं।

सूर्यातप

पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्राप्त सौर शक्ति को सूर्यातप कहते हैं। इसकी SI इकाई वाट प्रति वर्ग मीटर (W/m²) है।

यदि सूर्यातप 1 kW/m² हो, तो 1 m² क्षेत्रफल को एक घंटे में प्राप्त ऊर्जा:

ऊर्जा = तीव्रता × क्षेत्रफल × समय

$${E = 1000 \times 1 \times 3600 }{E = 3.6 \times 10^{6}\text{~J} }$$

यह ऊर्जा एक इकाई विद्युत ऊर्जा के बराबर है।

अन्ना मणि का योगदान

भारतीय मौसम वैज्ञानिक अन्ना मणि ने 1950 के दशक में भारत में सौर विकिरण का मानचित्रण किया। उन्होंने एस. रंगराजन के साथ Solar Radiation over India नामक पुस्तक प्रकाशित की। उनके कार्य से भारत की विशाल सौर ऊर्जा क्षमता को समझने में सहायता मिली।

अध्याय नोट्स

4. पृथ्वी की सतह पर सौर विकिरण की पारस्परिक क्रिया

विभिन्न पदार्थ सौर विकिरण की अलग-अलग मात्रा को अवशोषित और परावर्तित करते हैं।

  • गहरे रंग की सतहें अधिक प्रकाश अवशोषित करती हैं और जल्दी गर्म होती हैं।
  • हल्के रंग की सतहें अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं और अपेक्षाकृत ठंडी रहती हैं।
  • स्थल सामान्यतः जल की तुलना में जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है।
  • पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित ऊर्जा बाद में अवरक्त विकिरण के रूप में पुनः विकिरित होती है।

एल्बिडो

किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण का अंश एल्बिडो कहलाता है।

  • उच्च एल्बिडो वाली सतहें अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं और ठंडी रहती हैं।
  • निम्न एल्बिडो वाली सतहें अधिक विकिरण अवशोषित करती हैं और अधिक गर्म होती हैं।

उदाहरण:

पदार्थएल्बिडो
हिम0.80–0.90
बर्फ0.50–0.70
संदलित चट्टानें0.25–0.30

काली मृदा और महासागरीय जल का एल्बिडो अपेक्षाकृत कम होता है। इसलिए ये अधिक सौर ऊर्जा अवशोषित करते हैं।

भवनों का ऊष्मीकरण

कंक्रीट के पक्के मकान दिन में ऊष्मा संचित करके रात में उसका पुनः विकिरण करते हैं। इसलिए गर्मियों की रातों में वे अधिक गर्म लगते हैं। मिट्टी और लकड़ी से बने पारंपरिक घरों में ऊष्मा का पुनः विकिरण कम होता है, इसलिए वे अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं।

अध्याय नोट्स

5. क्रियाकलाप 13.2—आइए, पता लगाएँ

उद्देश्य

सामान्य पदार्थों की सतहों के एल्बिडो की तुलना करना।

विधि

विश्वसनीय पुस्तकों अथवा वेबसाइटों की सहायता से हिम, बर्फ, चट्टानों, हल्के रंग की मृदा, काली मृदा और महासागरीय जल के एल्बिडो का पता लगाया जाता है।

निष्कर्ष

  • हिम और बर्फ का एल्बिडो अधिक होता है।
  • वे आने वाले सौर विकिरण का बड़ा भाग परावर्तित कर देते हैं।
  • इसी कारण ध्रुवीय प्रदेश अत्यधिक ठंडे रहते हैं।
  • काली मृदा और महासागरीय जल का एल्बिडो कम होने के कारण वे अधिक ऊर्जा अवशोषित करते हैं।

अध्याय नोट्स

6. शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव

विशेष रूप से गर्मियों की रातों में शहर अपने आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म रहते हैं। इसे शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव कहते हैं।

कारण

  • शहरों में इस्पात, ईंट और कंक्रीट से बनी इमारतें अधिक होती हैं।
  • सड़कें कंक्रीट और डामर से बनाई जाती हैं।
  • ये पदार्थ अधिक सौर विकिरण अवशोषित करके ऊष्मा संचित करते हैं।
  • रात में यह संचित ऊष्मा पुनः विकिरित होती है।
  • शहरों में पेड़-पौधों और खुली मिट्टी का क्षेत्र कम होता है।

ग्रामीण क्षेत्र ठंडे क्यों रहते हैं?

ग्रामीण क्षेत्रों और वनों में अधिक वनस्पति होती है। वनस्पति छाया और वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण को ठंडा रखती है।

प्रभाव

  • वातानुकूलन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ती है।
  • शहरी पारितंत्रों पर दबाव बढ़ता है।
  • स्थानीय जलवायु में परिवर्तन होता है।

अध्याय नोट्स

7. अक्षांश और पृथ्वी का आकार

पृथ्वी गोलाकार है। इसलिए सूर्य की किरणें अलग-अलग अक्षांशों पर अलग-अलग कोणों से पड़ती हैं।

  • भूमध्यरेखा के पास सूर्य की किरणें छोटे क्षेत्र में केंद्रित होती हैं।
  • ध्रुवों के पास वही ऊर्जा बड़े क्षेत्र में फैल जाती है।
  • इसलिए भूमध्यरेखीय क्षेत्र पूरे वर्ष अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं।
  • ध्रुवीय प्रदेश अधिक ठंडे रहते हैं।

पृथ्वी की गोलाकार आकृति, घूर्णन अक्ष का झुकाव और सूर्य के चारों ओर परिक्रमा:

  • ऋतुओं में परिवर्तन करते हैं।
  • दिन की अवधि को प्रभावित करते हैं।
  • सौर विकिरण के असमान वितरण का कारण बनते हैं।

यही असमान ऊष्मीकरण वैश्विक पवनों और महासागरीय धाराओं को संचालित करता है।

अध्याय नोट्स

8. वायुमंडल की भूमिका

पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित वायु के आवरण को वायुमंडल कहते हैं। यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके चारों ओर बना रहता है।

वायुमंडल की संरचना

  • नाइट्रोजन—लगभग 78%
  • ऑक्सीजन—लगभग 21%
  • आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प तथा अन्य गैसें—अल्प मात्रा में

वायुमंडल की प्रमुख परतें

परतअनुमानित ऊँचाईप्रमुख विशेषता
क्षोभमंडल0–12 kmबादल, पवन, वर्षा और अधिकांश मौसमी घटनाएँ
समतापमंडल12–50 kmओजोन परत; ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता है
मध्यमंडलसमतापमंडल के ऊपरऊपरी वायुमंडलीय परत
तापमंडलमध्यमंडल के ऊपरअत्यंत विरल वायु
बहिर्मंडलसबसे बाहरी परतबाह्य अंतरिक्ष की ओर संक्रमण

क्षोभमंडल

  • पृथ्वी की सतह से गर्म होता है।
  • ऊँचाई बढ़ने पर तापमान लगभग 6.5°C प्रति किलोमीटर घटता है।
  • गर्म वायु ऊपर उठकर पवन, बादल, आँधी और तूफान उत्पन्न कर सकती है।

समतापमंडल

  • इसमें ओजोन परत उपस्थित होती है।
  • ओजोन पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करके इस परत को गर्म करती है।
  • ऊँचाई के साथ ताप बढ़ने से वायु का ऊर्ध्वाधर मिश्रण कम होता है। इसलिए यह परत अपेक्षाकृत शांत रहती है।

वायुमंडल की जीवन-रक्षक भूमिकाएँ

  1. हानिकारक सौर विकिरण को रोकना: ओजोन परत UV किरणों को अवशोषित करती है।
  2. पृथ्वी की ऊष्मा को बनाए रखना: पृथ्वी से पुनः विकिरित अवरक्त ऊर्जा को हरितगृह गैसें रोकती हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प प्रमुख हरितगृह गैसें हैं। प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव पृथ्वी को जीवन के अनुकूल गर्म रखता है। लेकिन मानवीय गतिविधियों से अतिरिक्त CO₂ बढ़ने पर वैश्विक तापमान बढ़ जाता है।

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9. ओजोन परत इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है?

ओजोन परत पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है।

ओजोन क्षरण

मानव-निर्मित क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) का उपयोग पहले रेफ्रिजरेटर और एरोसॉल में किया जाता था। इन रसायनों ने अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत को क्षति पहुँचाई। इस अत्यधिक क्षरण को ओजोन छिद्र कहा गया।

अधिक UV विकिरण:

  • मनुष्यों और अन्य जीवों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकता है।
  • पादपों और महासागरीय प्लवकों को प्रभावित कर सकता है।
  • पारितंत्रों का संतुलन बिगाड़ सकता है।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत CFCs के उपयोग में कमी लाई गई। इसके कारण ओजोन परत धीरे-धीरे पुनः स्वस्थ हो रही है।

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10. असमान ऊष्मण से पवन और महासागरीय धाराओं का उत्पन्न होना

उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलने वाली वायु को पवन कहते हैं।

पृथ्वी की सतह का असमान ऊष्मीकरण वायुदाब में अंतर उत्पन्न करता है। यही अंतर:

  • स्थानीय पवनों,
  • ग्रहीय पवनों और
  • महासागरीय धाराओं

को संचालित करता है।

अध्याय नोट्स

11. स्थानीय पवन

सीमित क्षेत्र में ताप और दाब के स्थानीय अंतर से बनने वाली पवनें स्थानीय पवन कहलाती हैं।

घाटी समीर

दिन में पर्वतीय ढलान घाटी के तल की तुलना में अधिक तेजी से गर्म होते हैं।

  • ढलान के ऊपर की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है।
  • वहाँ निम्न दाब बनता है।
  • घाटी की ठंडी वायु ढलान की ओर ऊपर बहती है।
  • इसे घाटी समीर कहते हैं।

पर्वतीय समीर

रात में पर्वतीय ढलान तेजी से ठंडे हो जाते हैं।

  • ढलान की वायु ठंडी और सघन हो जाती है।
  • यह वायु नीचे घाटी की ओर बहती है।
  • इसे पर्वतीय समीर कहते हैं।

ये पवनें पर्वतीय क्षेत्रों के तापमान, आर्द्रता, कृषि, मृदा और फसलों को प्रभावित करती हैं।

अध्याय नोट्स

12. ग्रहीय पवन

विशाल क्षेत्रों में दाब-पट्टियों के बीच चलने वाली नियमित पवनें ग्रहीय पवन कहलाती हैं।

दाब-पट्टियों का निर्माण

  • भूमध्यरेखा पर तीव्र ऊष्मीकरण से वायु ऊपर उठती है और भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी बनती है।
  • ऊपरी वायु ध्रुवों की ओर बढ़ती है।
  • लगभग 30° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों पर ठंडी होकर नीचे उतरती है तथा उपोष्ण उच्च दाब पट्टियाँ बनाती है।
  • लगभग 60° अक्षांशों पर गर्म और ठंडी वायु मिलने से उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टियाँ बनती हैं।
  • ध्रुवों पर अत्यधिक ठंडी और सघन वायु नीचे उतरकर ध्रुवीय उच्च दाब पट्टियाँ बनाती है।

पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव

पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवन सीधे मार्ग में नहीं चलती:

  • उत्तरी गोलार्ध में पवन दाईं ओर मुड़ती है।
  • दक्षिणी गोलार्ध में पवन बाईं ओर मुड़ती है।

अध्याय नोट्स

13. महासागरीय धाराएँ

महासागरीय जल की विशाल मात्रा के निरंतर प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं।

धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक

  • प्रबल ग्रहीय पवनें
  • जल के तापमान में अंतर
  • लवणता और घनत्व में अंतर
  • पृथ्वी का घूर्णन
  • महाद्वीपों का वितरण

भूमध्यरेखीय क्षेत्र का गर्म सतही जल ध्रुवों की ओर बहता है। गहरे स्तर का ठंडा और सघन जल भूमध्यरेखा की ओर लौटता है।

  • कम लवणता वाला जल कम सघन होने के कारण सतह के पास रहता है।
  • अधिक लवणता वाला जल अधिक सघन होकर नीचे चला जाता है।

महासागरीय भँवर

पृथ्वी के घूर्णन के कारण धाराएँ विशाल वृत्ताकार प्रवाह बनाती हैं, जिन्हें महासागरीय भँवर या गायर कहते हैं।

  • उत्तरी गोलार्ध में ये घड़ी की सुई की दिशा में घूमते हैं।
  • दक्षिणी गोलार्ध में ये घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घूमते हैं।

महत्त्व

  • भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा पहुँचाते हैं।
  • पृथ्वी के तापमान के अंतर को कम करते हैं।
  • पोषक तत्त्वों का परिवहन करते हैं।
  • समुद्री पारितंत्रों को सहारा देते हैं।
  • तटीय क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करते हैं।

उत्तरी अटलांटिक प्रवाह, गल्फ स्ट्रीम का विस्तार है। यह गर्म जल को यूरोप के उत्तर-पश्चिमी तट तक पहुँचाकर कई बंदरगाहों को शीतकाल में बर्फ से मुक्त रखता है।

अध्याय नोट्स

14. जैव-भू रासायनिक चक्र

सजीव अपने आसपास की वायु, जल, मृदा और चट्टानों से निरंतर द्रव्य तथा ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं।

जैविक और अजैविक घटकों के बीच द्रव्य तथा आवश्यक तत्त्वों के चक्रीय संचलन को जैव-भू रासायनिक चक्र कहते हैं।

महत्त्व

  • आवश्यक पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
  • सजीवों के लिए जल, कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन उपलब्ध कराते हैं।
  • पारितंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।
  • विभिन्न पृथ्वी-मंडलों को आपस में जोड़ते हैं।
  • पर्यावरणीय विक्षोभ से उबरने में पारितंत्रों की सहायता करते हैं।

अध्याय नोट्स

15. जल चक्र

जल का महासागरों, वायुमंडल, स्थल, हिम और जीवों के बीच निरंतर परिसंचरण जल चक्र कहलाता है।

प्रमुख प्रक्रियाएँ

  1. वाष्पीकरण: नदियों, झीलों और महासागरों से जल का वाष्प बनना।
  2. वाष्पोत्सर्जन: पादपों द्वारा जलवाष्प का उत्सर्जन।
  3. संघनन: जलवाष्प का ठंडा होकर बादल बनाना।
  4. वर्षण: वर्षा, हिम अथवा ओलों के रूप में जल का पृथ्वी पर लौटना।
  5. अपवाह: सतह पर बहते हुए जल का नदियों और महासागरों में पहुँचना।
  6. अंतःस्यंदन: जल का मृदा और चट्टानों में रिसना।
  7. भूजल पुनर्भरण: भूमिगत जल भंडारों का पुनः भरना।

मृदा और चट्टानों के खनिज रिसते हुए जल में घुल जाते हैं। ये पोषक तत्त्व स्थल और महासागर के जीवों के लिए उपयोगी होते हैं।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

  • गर्म वायुमंडल अधिक नमी धारण करता है।
  • कुछ क्षेत्रों में तीव्र वर्षा और बाढ़ बढ़ सकती है।
  • अन्य क्षेत्रों में सूखा पड़ सकता है।
  • हिमानियों के पिघलने से समुद्र का जल-स्तर बढ़ सकता है।
  • अचानक भारी वर्षा से अपवाह और मृदा अपरदन बढ़ता है।
  • कम अंतःस्यंदन से भूजल पुनर्भरण घटता है।
  • कृषि और तटीय शहरों पर संकट बढ़ता है।

अध्याय नोट्स

16. कार्बन चक्र

कार्बन प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और DNA जैसे जैविक अणुओं का प्रमुख घटक है। यह वायुमंडल, जैवमंडल, भूमंडल और जलमंडल के बीच चक्रित होता रहता है।

द्रुत कार्बन चक्र

  • पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय CO₂ को ग्लूकोस में बदलते हैं।
  • जंतु पादपों अथवा अन्य जंतुओं को खाकर कार्बन प्राप्त करते हैं।
  • पादपों और जंतुओं के श्वसन से CO₂ वायुमंडल में लौटती है।
  • मृत जीवों के अपघटन से भी कार्बन वापस पर्यावरण में पहुँचता है।

मंद कार्बन चक्र

  • मृत पादप और जंतु लाखों वर्षों तक भूमि में दबे रहते हैं।
  • वे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों में बदल सकते हैं।
  • इनके दहन से संचित कार्बन बहुत कम समय में CO₂ के रूप में वायुमंडल में पहुँच जाता है।

महासागरों की भूमिका

  • महासागर वायुमंडल से CO₂ अवशोषित करते हैं।
  • पादप प्लवक इसका उपयोग प्रकाश संश्लेषण में करते हैं।
  • समुद्री जीव कार्बोनेट का उपयोग खोल बनाने में करते हैं।
  • मृत समुद्री जीवों का कार्बन समुद्र तल पर लंबे समय तक संचित रह सकता है।

पाठ्यपुस्तक के अनुसार, जीवाश्म ईंधनों के दहन और वनोन्मूलन से 1960 के बाद वायुमंडलीय CO₂ लगभग 315 ppm से बढ़कर 420 ppm हो गई।

CO₂ की अत्यधिक मात्रा:

  • हरितगृह प्रभाव बढ़ाती है।
  • वैश्विक तापमान बढ़ाती है।
  • हिमानियों और समुद्री बर्फ को पिघलाती है।
  • समुद्र के जल-स्तर को बढ़ाती है।
  • चरम मौसमी घटनाएँ और अनियमित मानसून उत्पन्न कर सकती है।

अध्याय नोट्स

17. नाइट्रोजन चक्र

नाइट्रोजन प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों के निर्माण के लिए आवश्यक है। वायुमंडल में नाइट्रोजन का विशाल भंडार है, परंतु N₂ कम अभिक्रियाशील होने के कारण पादप और जंतु इसका प्रत्यक्ष उपयोग नहीं कर सकते।

प्रमुख चरण

1. नाइट्रोजन स्थिरीकरण

  • राइजोबियम फलीदार पादपों की जड़-ग्रंथियों में पाया जाता है।
  • एजोटोबैक्टर मृदा में पाया जाता है।
  • ये वायुमंडलीय N₂ को अमोनिया में बदलते हैं।
  • तड़ित भी थोड़ी मात्रा में नाइट्रोजन ऑक्साइड बनाकर स्थिरीकरण में सहायता करती है।

2. नाइट्रीकरण

  • नाइट्रोसोमोनास अमोनिया को नाइट्राइट में बदलता है।
  • नाइट्रोबैक्टर नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलता है।

3. स्वांगीकरण

पादप मृदा से नाइट्रेट जैसे नाइट्रोजन यौगिक अवशोषित करते हैं। जंतु पादपों या अन्य जंतुओं को खाकर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।

4. अमोनीकरण

मृत जीवों और अपशिष्टों को जीवाणु तथा कवक अपघटित करके अमोनिया जैसे नाइट्रोजन यौगिक मृदा में लौटाते हैं।

5. विनाइट्रीकरण

स्यूडोमोनास जैसे जीवाणु नाइट्रेट को पुनः नाइट्रोजन गैस में बदलकर वायुमंडल में छोड़ते हैं।

हाबर-बॉश प्रक्रिया

इस औद्योगिक प्रक्रिया में वायुमंडलीय नाइट्रोजन से अमोनिया बनाई जाती है। यह अधिकांश रासायनिक उर्वरकों के निर्माण का आधार है। इससे कृषि उत्पादन बढ़ा, परंतु:

  • इसमें अत्यधिक ऊर्जा खर्च होती है।
  • उर्वरकों का अधिक प्रयोग मृदा और जल को हानि पहुँचा सकता है।

अध्याय नोट्स

18. ऑक्सीजन चक्र

वायुमंडल में लगभग 21 प्रतिशत मुक्त ऑक्सीजन होती है। ऑक्सीजन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल और वसा जैसे जैविक अणुओं की महत्त्वपूर्ण घटक है।

ऑक्सीजन का उपयोग

  • पादप और जंतु श्वसन में ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।
  • ईंधनों के दहन में ऑक्सीजन प्रयुक्त होती है।
  • धातु ऑक्साइड और अन्य यौगिकों के निर्माण में ऑक्सीजन भाग लेती है।

ऑक्सीजन की पुनःपूर्ति

पादप प्रकाश संश्लेषण में सूर्य के प्रकाश, जल और CO₂ का उपयोग करके ग्लूकोस बनाते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

ऑक्सीजन के उपभोग और उत्पादन का संतुलन वायुमंडल, स्थल, महासागरों तथा जीवों के बीच ऑक्सीजन का परिसंचरण बनाए रखता है।

अध्याय नोट्स

19. पृथ्वी की प्रक्रियाओं पर मानवीय प्रभाव

मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के सभी मंडलों और जैव-भू रासायनिक चक्रों को प्रभावित करती हैं।

1. जीवाश्म ईंधनों का दहन

  • वायुमंडलीय CO₂ बढ़ती है।
  • हरितगृह प्रभाव और वैश्विक ताप बढ़ता है।
  • चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ती हैं।
  • जैव विविधता को हानि होती है।

2. महासागरीय अम्लीकरण

महासागर अधिक CO₂ अवशोषित करते हैं तो समुद्री जल अधिक अम्लीय हो जाता है। इससे:

  • सूक्ष्म प्लवक प्रभावित होते हैं।
  • प्रवाल भित्तियों को हानि होती है।
  • समुद्री खाद्य-जाल बाधित होता है।

गर्म महासागरीय जल CO₂ को कम अवशोषित करता है। इससे महासागरों की कार्बन संग्रहण क्षमता घटती है।

3. उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग

नाइट्रेट नदियों और झीलों में पहुँचकर शैवाल की अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इसे शैवाल प्रस्फुटन कहते हैं।

शैवालों के अपघटन में जल की ऑक्सीजन कम हो जाती है और मछलियाँ मर सकती हैं। पोषक तत्त्वों की अधिकता से जल निकाय में होने वाली इस प्रक्रिया को सुपोषण कहते हैं।

4. वनोन्मूलन

  • प्रकाश संश्लेषण और CO₂ अवशोषण घटता है।
  • वाष्पोत्सर्जन और स्थानीय वर्षा कम हो सकती है।
  • सतही एल्बिडो बदल जाता है।
  • मृदा अपरदन बढ़ता है।
  • पर्यावास नष्ट होते हैं।
  • जैव विविधता कम होती है।

5. वाहनों से प्रदूषण

वाहनों से निकली गैसें सूर्य के प्रकाश के साथ अभिक्रिया करके निचले वायुमंडल में धूमकुहरा और ओजोन बनाती हैं।

  • समतापमंडल की ओजोन जीवन-रक्षक है।
  • भूमि के निकट बनने वाली ओजोन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

पर्यावरण-संतुलन के उपाय

  • ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
  • सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग
  • वृक्षारोपण
  • जल संरक्षण
  • सतत कृषि
  • अपशिष्ट में कमी
  • वस्तुओं का पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग

अध्याय नोट्स

20. मिशन LiFE

मिशन LiFE—Lifestyle for Environment भारत के नेतृत्व वाली एक वैश्विक पहल है। इसे वर्ष 2021 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था।

उद्देश्य

लोगों को सजग, उत्तरदायी और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना।

प्रमुख संदेश

  • पृथ्वी एक परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है।
  • असंतुलित उपभोग पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ता है।
  • जल, भोजन और ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए।
  • अपशिष्ट कम करना चाहिए।
  • वस्तुओं का पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण करना चाहिए।
  • व्यक्तिगत तथा सामुदायिक प्रयास मिलकर सतत भविष्य बना सकते हैं।

अध्याय नोट्स

महत्त्वपूर्ण शब्दावली

शब्दअर्थ
पृथ्वी तंत्रपृथ्वी के विभिन्न मंडलों और उनकी पारस्परिक क्रियाओं से बनी संपूर्ण व्यवस्था
सौर विकिरणसूर्य से विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में प्राप्त ऊर्जा
सूर्यातपप्रति इकाई क्षेत्रफल पर पृथ्वी की सतह को प्राप्त सौर शक्ति
एल्बिडोकिसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण का अंश
शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभावशहरों का आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म होना
हरितगृह प्रभावहरितगृह गैसों द्वारा पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को रोकना
स्थानीय पवनसीमित क्षेत्र के ताप और दाब में अंतर से बनने वाली पवन
ग्रहीय पवनवैश्विक दाब-पट्टियों के बीच लंबी दूरी तक चलने वाली नियमित पवन
महासागरीय धारामहासागरीय जल की विशाल मात्रा का निरंतर दिशात्मक प्रवाह
जैव-भू रासायनिक चक्रजैविक और अजैविक घटकों के बीच तत्त्वों का चक्रीय संचलन
नाइट्रोजन स्थिरीकरणवायुमंडलीय N₂ का उपयोगी नाइट्रोजन यौगिकों में परिवर्तन
नाइट्रीकरणअमोनिया का नाइट्राइट और फिर नाइट्रेट में परिवर्तन
अमोनीकरणकार्बनिक नाइट्रोजन का अमोनिया में परिवर्तन
विनाइट्रीकरणनाइट्रेट का पुनः नाइट्रोजन गैस में परिवर्तन
सुपोषणअतिरिक्त पोषक तत्त्वों से शैवाल वृद्धि और जल में ऑक्सीजन की कमी
वाष्पोत्सर्जनपादपों के वायवीय भागों से जलवाष्प का निकलना

अध्याय नोट्स

अध्याय का सारांश

पृथ्वी एक परस्पर संबद्ध तंत्र है, जिसमें भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल, वायुमंडल और जैवमंडल सम्मिलित हैं। इनके बीच ऊर्जा और द्रव्य का निरंतर आदान-प्रदान होता है। सूर्य पृथ्वी की ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी की गोलाकार आकृति, अक्षांश, अक्ष का झुकाव तथा विभिन्न सतहों के एल्बिडो के कारण पृथ्वी की सतह असमान रूप से गर्म होती है।

असमान ऊष्मीकरण वायुदाब में अंतर उत्पन्न करता है, जिससे स्थानीय एवं ग्रहीय पवनें और महासागरीय धाराएँ बनती हैं। ये पवनें और धाराएँ पृथ्वी पर ऊष्मा तथा नमी का वितरण करके मौसम और जलवायु को प्रभावित करती हैं। वायुमंडल हानिकारक विकिरणों को रोकता है और प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव द्वारा पृथ्वी को जीवन के अनुकूल गर्म रखता है।

जल, कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैव-भू रासायनिक चक्रों द्वारा वायुमंडल, स्थल, महासागरों और जीवों के बीच निरंतर चक्रित होते हैं। ये चक्र पोषक तत्त्वों की उपलब्धता और पारितंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।

जीवाश्म ईंधनों का दहन, वनोन्मूलन, वाहनों का प्रदूषण और उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग इन प्राकृतिक चक्रों को बाधित करते हैं। इनके कारण वैश्विक तापन, महासागरीय अम्लीकरण, सुपोषण, मृदा अपरदन और जैव विविधता की हानि होती है। नवीकरणीय ऊर्जा, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सतत कृषि तथा मिशन LiFE के अनुरूप पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाकर पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन की रक्षा की जा सकती है।

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