कक्षा 9 विज्ञान के अध्याय ‘क्रियाशील ऊतक’ के ये नोट्स कोशिकाओं से ऊतकों के निर्माण, पादप और जंतु ऊतकों, पेशी-कंकाल तंत्र, संधियों, कंकाल तंत्र तथा पूर्णशक्तता को क्रमबद्ध रूप से समझाते हैं।
अध्याय नोट्स
परिचय
जीवन की शुरुआत एक कोशिका से होती है। यह कोशिका बार-बार विभाजित होकर अनेक कोशिकाएँ बनाती है। बाद में ये कोशिकाएँ विशेष कार्य करने के लिए त्वचा, पेशियों, अस्थियों, तंत्रिकाओं तथा विभिन्न अंगों का निर्माण करती हैं।
अध्याय नोट्स
संगठन के स्तर
कोशिका → ऊतक → अंग → अंग तंत्र → जीव
- कोशिका: जीवन की मूल संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई।
- ऊतक: समान संरचना वाली कोशिकाओं का समूह, जो मिलकर एक विशेष कार्य करता है।
- अंग: एक से अधिक प्रकार के ऊतकों से बनी संरचना।
- अंग तंत्र: कई अंगों का समूह, जो किसी विशेष जैव प्रक्रम को पूरा करता है।
- जीव: विभिन्न अंग तंत्रों से बना संपूर्ण सजीव।
अध्याय नोट्स
श्रम विभाजन
एककोशिकीय जीवों, जैसे अमीबा में एक ही कोशिका सभी आवश्यक कार्य करती है। बहुकोशिकीय जीवों में अलग-अलग ऊतक अलग-अलग कार्य करते हैं। इसे श्रम विभाजन कहते हैं। इससे शरीर अधिक कुशलता से जटिल जैव प्रक्रमों को पूरा कर पाता है।
उदाहरण:
- पेशीय ऊतक गति कराते हैं।
- तंत्रिका ऊतक संदेशों का संचार करते हैं।
- जाइलम जल और खनिजों का परिवहन करता है।
- फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
अध्याय नोट्स
3.1 पादप और जंतु ऊतक भिन्न क्यों हैं?
पादपों और जंतुओं की जीवन-शैली, पोषण और वृद्धि के तरीके अलग हैं। इसलिए उनके ऊतकों की संरचना और कार्यों में भी अंतर होता है।
| आधार | पादप ऊतक | जंतु ऊतक |
|---|---|---|
| गति | अधिकांश पादप एक स्थान पर स्थिर रहते हैं। | अधिकांश जंतु एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं। |
| कोशिका भित्ति | उपस्थित होती है, जिससे दृढ़ता मिलती है। | अनुपस्थित होती है, इसलिए कोशिकाएँ अधिक लचीली होती हैं। |
| सहारे की आवश्यकता | स्थिर और सीधा रहने के लिए मजबूत सहायक ऊतकों की आवश्यकता होती है। | गति के लिए पेशीय, अस्थि और संयोजी ऊतकों की आवश्यकता होती है। |
| पोषण | प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। | विभिन्न स्रोतों से भोजन प्राप्त करके उसका पाचन करते हैं। |
| वृद्धि | केवल कुछ निश्चित भागों में जीवनभर होती रहती है। | सामान्यतः वृद्धि शरीर के विभिन्न भागों में होती है और एक निश्चित आयु के बाद धीमी या बंद हो जाती है। |
| मृत ऊतक | कई सहायक और संवहन ऊतक मृत कोशिकाओं से बने हो सकते हैं। | अधिकांश ऊतक सजीव कोशिकाओं से बने होते हैं। |
| नियंत्रण | गति कम होने के कारण नियंत्रण अपेक्षाकृत सरल होता है। | तंत्रिका और पेशीय ऊतक अत्यधिक विकसित होते हैं। |
अध्याय नोट्स
3.2 पादपों में वृद्धि के लिए ऊतक
पौधे तीन प्रमुख प्रकार से वृद्धि करते हैं:
- जड़ों और तनों की लंबाई में वृद्धि
- तने की मोटाई या परिधि में वृद्धि
- काटे या चर लिए जाने के बाद पुनः वृद्धि
पौधों में वृद्धि सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाओं के कारण होती है। इन कोशिकाओं से बना ऊतक विभज्योतक ऊतक (Meristematic tissue) कहलाता है।
विभज्योतक ऊतक की विशेषताएँ
- कोशिकाएँ छोटी और सक्रिय होती हैं।
- कोशिका भित्ति पतली होती है।
- केंद्रक बड़ा और स्पष्ट होता है।
- कोशिकाद्रव्य सघन होता है।
- रसधानियाँ सामान्यतः अनुपस्थित होती हैं।
- कोशिकाओं के बीच बहुत कम या कोई अंतराकोशिकीय स्थान नहीं होता।
- कोशिकाएँ लगातार और तीव्र गति से विभाजित होती हैं।
विभज्योतक कोशिकाओं में रसधानियाँ क्यों नहीं होतीं?
रसधानियों का प्रमुख कार्य पदार्थों का भंडारण करना है। विभज्योतक कोशिकाएँ सक्रिय रूप से विभाजित होती हैं, इसलिए इन्हें भंडारण की तुलना में सघन कोशिकाद्रव्य और सक्रिय कोशिकांगों की अधिक आवश्यकता होती है।
3.2.1 शीर्षस्थ विभज्योतक — पौधे लंबाई में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?
शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem) जड़ों और प्ररोहों के अग्रभाग पर पाया जाता है।
कार्य
- जड़ों की लंबाई बढ़ाता है।
- तनों और शाखाओं की लंबाई बढ़ाता है।
- पौधे की ऊँचाई बढ़ाने में सहायता करता है।
- जड़ों को मिट्टी में गहराई तक जाने में सहायता करता है।
क्रियाकलाप 3.1 — प्याज की जड़ों में वृद्धि
उद्देश्य
यह पता लगाना कि जड़ के किस भाग के कारण उसकी लंबाई बढ़ती है।
आवश्यक सामग्री
- दो काँच के जार
- पानी
- प्याज के दो शल्क कंद
- मापक पट्टी
विधि
- दो जारों को पानी से भरकर उन्हें ‘क’ और ‘ख’ नाम दीजिए।
- दोनों जारों में एक-एक प्याज का शल्क कंद इस प्रकार रखिए कि उसका निचला भाग पानी को छुए।
- पहले तीन दिनों तक दोनों प्याजों की जड़ों की लंबाई मापिए।
- तीसरे दिन जार ‘ख’ की जड़ों के लगभग 1 सेंटीमीटर लंबे मूलाग्र काट दीजिए।
- अगले चार दिनों तक दोनों जारों की जड़ों की लंबाई मापकर तालिका में लिखिए।
अवलोकन
- जार ‘क’ की जड़ें लगातार लंबी होती रहती हैं।
- जार ‘ख’ की जड़ों के मूलाग्र काटने के बाद उनकी वृद्धि रुक जाती है।
निष्कर्ष
जड़ों की लंबाई में वृद्धि उनके मूलाग्र पर स्थित शीर्षस्थ विभज्योतक के कारण होती है। इसी प्रकार प्ररोह के अग्रभाग पर उपस्थित शीर्षस्थ विभज्योतक तने की लंबाई बढ़ाता है।
3.2.2 पार्श्व विभज्योतक — पौधे परिधि में किस प्रकार वृद्धि करते हैं?
द्विबीजपत्री पौधों के तने केवल लंबाई में ही नहीं, बल्कि समय के साथ मोटाई या परिधि में भी बढ़ते हैं।
तने की परिधि के अनुदिश वलय के रूप में स्थित विभज्योतक को पार्श्व विभज्योतक (Lateral meristem) कहते हैं।
कार्य
- तने और जड़ की मोटाई बढ़ाता है।
- भीतर और बाहर की ओर नई कोशिकाओं का निर्माण करता है।
- द्वितीयक वृद्धि में सहायता करता है।
- वृक्षों में वार्षिक वृद्धि वलय बनाने में योगदान देता है।
वार्षिक वृद्धि वलय
पेड़ के कटे हुए तने पर दिखाई देने वाले गोलाकार वलय वार्षिक वृद्धि वलय कहलाते हैं।
- इन वलयों को गिनकर वृक्ष की आयु का अनुमान लगाया जा सकता है।
- चौड़ा वलय अनुकूल वृद्धि-परिस्थितियों को दर्शाता है।
- संकरा वलय प्रतिकूल परिस्थितियों को दर्शाता है।
- इनकी सहायता से पुराने समय की जलवायु के बारे में भी जानकारी मिल सकती है।
3.2.3 अंतर्वेशी विभज्योतक — काट दिए जाने के बाद पौधे कैसे बढ़ते हैं?
अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary meristem) पर्व के आधार पर या पर्वसंधि के ठीक ऊपर पाया जाता है।
- पर्वसंधि: तने का वह स्थान जहाँ से पत्तियाँ या शाखाएँ निकलती हैं।
- पर्व: दो पर्वसंधियों के बीच का भाग।
कार्य
- काटे जाने के बाद पौधे की पुनः वृद्धि कराता है।
- घास को काटने या पशुओं द्वारा चरने के बाद फिर से उगने में सहायता करता है।
- झाड़ियों और बाड़ की छँटाई के बाद नई शाखाएँ बनने में सहायता करता है।
यदि युवा तने का शीर्ष काट दिया जाए, तो उसकी लंबाई में वृद्धि रुक सकती है, लेकिन पर्वसंधियों से नई शाखाएँ निकलने लगती हैं। इसलिए छँटाई करने पर पौधा अधिक घना दिखाई देता है।
तीनों विभज्योतकों की तुलना
| विभज्योतक | स्थिति | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|
| शीर्षस्थ विभज्योतक | जड़ और प्ररोह के अग्रभाग पर | लंबाई में वृद्धि |
| पार्श्व विभज्योतक | तने और जड़ की पार्श्व सतह पर | मोटाई या परिधि में वृद्धि |
| अंतर्वेशी विभज्योतक | पर्व के आधार या पर्वसंधि के पास | काटने के बाद पुनः वृद्धि |
विभेदन
विभज्योतक द्वारा बनी कुछ नई कोशिकाएँ विभाजन करती रहती हैं। दूसरी कोशिकाएँ विभाजन की क्षमता खोकर किसी विशेष कार्य के लिए अपना आकार और संरचना बदल लेती हैं।
इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहते हैं।
विभेदन के बाद बनी कोशिकाएँ स्थायी ऊतक का निर्माण करती हैं।
3.2.4 स्थायी ऊतक
वे ऊतक जिनकी कोशिकाएँ सामान्यतः विभाजन की क्षमता खो चुकी होती हैं और किसी विशेष कार्य के लिए विशेषीकृत हो जाती हैं, स्थायी ऊतक (Permanent tissue) कहलाते हैं।
स्थायी ऊतकों के प्रमुख कार्य
- सुरक्षा
- सहारा और दृढ़ता
- भोजन का भंडारण
- प्रकाश-संश्लेषण
- जल, खनिज और भोजन का परिवहन
स्थायी ऊतक दो प्रकार के होते हैं:
- सरल स्थायी ऊतक: एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं।
- जटिल स्थायी ऊतक: एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं।
(i) सुरक्षात्मक ऊतक — बाह्यत्वचा
बाह्यत्वचा (Epidermis) पौधे के शरीर की सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत होती है।
संरचना
- सामान्यतः कोशिकाओं की एक परत से बनी होती है।
- कोशिकाएँ चपटी, आयताकार और सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं।
- इनके बीच अंतराकोशिकीय स्थान बहुत कम होता है।
- बाह्यत्वचा पर क्यूटिन की मोमी परत होती है, जिसे उपत्वचा (Cuticle) कहते हैं।
कार्य
- पौधे को यांत्रिक क्षति से बचाती है।
- हानिकारक सूक्ष्मजीवों और परजीवियों से सुरक्षा करती है।
- जल की हानि को कम करती है।
- बाहरी वातावरण के हानिकारक प्रभावों से पौधे की रक्षा करती है।
मरुस्थलीय पौधों में बाह्यत्वचा
मरुस्थलीय पौधों में उपत्वचा अधिक मोटी होती है। इससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है और पौधा जल की बचत कर पाता है।
मूल रोम
जड़ों की बाह्यत्वचीय कोशिकाओं से निकलने वाले बाल जैसे उभार मूल रोम कहलाते हैं।
कार्य:
- जल और खनिजों के अवशोषण के लिए जड़ का सतह क्षेत्रफल बढ़ाना।
रंध्र
पत्तियों की बाह्यत्वचा में छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें रंध्र (Stomata) कहते हैं।
रंध्रों के कार्य:
- गैसीय विनिमय
- वाष्पोत्सर्जन
- जल परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करना
- कुछ अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन में सहायता करना
काग
वृद्ध पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे की कुछ कोशिकाएँ विभाजित होकर काग एधा (Cork cambium) बनाती हैं। इससे काग कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं।
- काग कोशिकाएँ मृत होती हैं।
- ये सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं।
- जल और गैसों के लिए लगभग अपारगम्य होती हैं।
- इनसे वृक्ष की छाल बनती है।
(ii) सहायक ऊतक — सरल स्थायी ऊतक
सरल स्थायी ऊतक एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इनके तीन प्रमुख प्रकार हैं:
- मृदूतक
- श्लेषोतक
- दृढ़ोतक
(क) मृदूतक
मृदूतक (Parenchyma) पतली भित्ति वाली सजीव कोशिकाओं से बना होता है।
संरचना
- कोशिकाएँ सजीव होती हैं।
- कोशिका भित्तियाँ पतली होती हैं।
- कोशिकाएँ विरल रूप से व्यवस्थित होती हैं।
- इनके बीच अंतराकोशिकीय स्थान पाए जाते हैं।
कार्य
- भोजन का भंडारण
- जल और अन्य पदार्थों का भंडारण
- पौधे के हरे भागों में प्रकाश-संश्लेषण
- घाव भरने और ऊतकों की मरम्मत में सहायता
- पौधे के भागों को सामान्य सहारा प्रदान करना
विशेषीकृत मृदूतक
- हरितलवक युक्त मृदूतक प्रकाश-संश्लेषण करता है।
- जलीय पौधों में मृदूतक के बड़े वायु-अवकाश उन्हें तैरने में सहायता करते हैं।
(ख) श्लेषोतक
श्लेषोतक (Collenchyma) सजीव कोशिकाओं से बना लचीला सहायक ऊतक है।
संरचना
- कोशिकाएँ सजीव होती हैं।
- कोशिकाओं के कोनों पर पेक्टिन का निक्षेप होता है।
- पेक्टिन के कारण कोशिका भित्तियाँ कोनों पर असमान रूप से मोटी होती हैं।
कार्य
- पौधों को सहारा देता है।
- तनों, पर्णवृंतों और प्रतानों को लचीलापन प्रदान करता है।
- पौधे के भागों को बिना टूटे झुकने देता है।
उदाहरण: धनिए का पर्णवृंत नरम और लचीला होता है क्योंकि उसमें श्लेषोतक पाया जाता है।
(ग) दृढ़ोतक
दृढ़ोतक (Sclerenchyma) पौधे को कठोरता और दृढ़ता प्रदान करता है।
संरचना
- कोशिका भित्तियाँ बहुत मोटी होती हैं।
- भित्तियों में लिग्निन का निक्षेप पाया जाता है।
- इसकी अधिकांश कोशिकाएँ परिपक्व अवस्था में मृत होती हैं।
- अंतराकोशिकीय स्थान सामान्यतः अनुपस्थित होते हैं।
कार्य
- पौधे को यांत्रिक शक्ति देता है।
- तने और पर्ण शिराओं को दृढ़ बनाता है।
- बीजों और गिरियों के कठोर आवरण का निर्माण करता है।
उदाहरण: नारियल के रेशे और अखरोट का कठोर छिलका।
सरल स्थायी ऊतकों की तुलना
| विशेषता | मृदूतक | श्लेषोतक | दृढ़ोतक |
|---|---|---|---|
| कोशिकाएँ | सजीव | सजीव | अधिकांशतः मृत |
| भित्ति | पतली | कोनों पर असमान रूप से मोटी | लिग्निनयुक्त और बहुत मोटी |
| अंतराकोशिकीय स्थान | उपस्थित | बहुत कम | अनुपस्थित |
| प्रमुख कार्य | भंडारण एवं प्रकाश-संश्लेषण | सहारा एवं लचीलापन | कठोरता एवं यांत्रिक शक्ति |
| उदाहरण | फल का गूदा, कोमल भाग | पर्णवृंत, प्रतान | नारियल का रेशा, अखरोट का छिलका |
(iii) संवहन ऊतक — जटिल स्थायी ऊतक
संवहन ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इनकी विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर पदार्थों का परिवहन करती हैं।
इसके दो प्रकार हैं:
- जाइलम
- फ्लोएम
जाइलम
जाइलम (Xylem) जड़ों से जल और खनिजों को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। यह पौधे को दृढ़ता भी प्रदान करता है।
जाइलम के घटक
- वाहिनिकाएँ
- वाहिकाएँ
- जाइलम मृदूतक
- जाइलम तंतु
वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ लंबी, नलिकाकार तथा मोटी भित्ति वाली होती हैं। जाइलम मृदूतक इसका प्रमुख जीवित घटक है, जबकि अन्य घटक मुख्यतः मृत होते हैं।
फ्लोएम
फ्लोएम (Phloem) पत्तियों में बने भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है।
फ्लोएम के घटक
- चालनी नलिकाएँ
- सहचर कोशिकाएँ
- फ्लोएम मृदूतक
- फ्लोएम तंतु
प्रमुख कार्य
- चालनी नलिकाएँ भोजन का परिवहन करती हैं।
- सहचर कोशिकाएँ चालनी नलिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं।
- फ्लोएम मृदूतक भोजन, राल, टैनिन और रबड़क्षीर का भंडारण करता है।
- फ्लोएम तंतु पौधे को दृढ़ता देते हैं।
जाइलम और फ्लोएम में अंतर
| आधार | जाइलम | फ्लोएम |
|---|---|---|
| परिवहन | जल और खनिज | भोजन |
| दिशा | मुख्यतः जड़ों से ऊपर की ओर | आवश्यकता के अनुसार विभिन्न दिशाओं में |
| कोशिकाएँ | अधिकांश घटक मृत | अधिकांश घटक सजीव |
| अतिरिक्त कार्य | पौधे को दृढ़ता देना | भोजन का वितरण और भंडारण |
पादपों में ऊतक तंत्र
पादप ऊतक तीन ऊतक तंत्रों में संगठित होते हैं:
- त्वचीय ऊतक तंत्र: बाहरी आवरण बनाता है और जल की हानि कम करता है।
- भरण ऊतक तंत्र: त्वचीय और संवहन ऊतकों के बीच का मुख्य भाग बनाता है। इसमें मृदूतक, श्लेषोतक और दृढ़ोतक आते हैं।
- संवहन ऊतक तंत्र: जाइलम और फ्लोएम से बना होता है तथा पदार्थों का परिवहन करता है।
अध्याय नोट्स
3.3 जंतु ऊतक
जंतुओं में भी समान प्रकार की कोशिकाएँ मिलकर विशेष कार्य करने वाले ऊतक बनाती हैं।
जंतु ऊतक चार प्रमुख प्रकार के होते हैं:
- उपकला ऊतक
- संयोजी ऊतक
- पेशीय ऊतक
- तंत्रिका ऊतक
3.3.1 उपकला ऊतक — संरचना और प्रकार्य
उपकला ऊतक (Epithelial tissue) शरीर का बाहरी आवरण बनाता है और आंतरिक अंगों को भीतर से आस्तरित करता है।
यह त्वचा, मुँह, फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं, आमाशय और आँतों में पाया जाता है।
सामान्य विशेषताएँ
- कोशिकाएँ सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं।
- कोशिकाओं के बीच बहुत कम स्थान होता है।
- यह शरीर और अंगों को सुरक्षा देता है।
- पदार्थों के अवशोषण, स्रवण, विसरण और गति में सहायता करता है।
कार्य के आधार पर प्रकार
| प्रमुख कार्य | संरचना | शरीर में स्थान |
|---|---|---|
| द्रवों और गैसों का विनिमय | पतली और चपटी कोशिकाओं की एक परत | फेफड़ों और रक्त वाहिकाओं का आस्तर |
| सुरक्षा | चपटी कोशिकाओं की अनेक परतें | त्वचा, मुँह और ग्रासनली |
| स्रवण | घनाकार या स्तंभाकार विशेषीकृत कोशिकाएँ | लार ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथियाँ और आमाशय |
| संवेदन | विशेष ग्राही कोशिकाएँ, कभी-कभी पक्ष्माभयुक्त | नासाछिद्र, स्वाद कलिकाएँ और आंतरिक कर्ण |
| अवशोषण | लंबी स्तंभाकार कोशिकाओं की एक परत | छोटी आँत का आस्तर |
3.3.2 हमारे शरीर के विभिन्न भाग किस प्रकार परस्पर जुड़े होते हैं?
शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों को जोड़ने तथा सहारा देने वाला ऊतक संयोजी ऊतक (Connective tissue) कहलाता है।
संयोजी ऊतक की कोशिकाएँ एक पदार्थ में स्थित होती हैं, जिसे आधात्री (Matrix) कहते हैं। आधात्री तरल, जेली जैसी या कठोर हो सकती है।
प्रमुख संयोजी ऊतक
| संयोजी ऊतक | विशेषता | कार्य |
|---|---|---|
| रक्त | तरल आधात्री | गैसों, पोषक पदार्थों, हार्मोन और अपशिष्टों का परिवहन |
| अस्थि | कैल्सियम और फॉस्फोरस युक्त कठोर आधात्री | सहारा, दृढ़ता और आंतरिक अंगों की सुरक्षा |
| उपास्थि | नरम और जेली जैसी आधात्री | लचीलापन और आघात-अवशोषण |
| कंडरा | मजबूत और लचीला ऊतक | पेशी को अस्थि से जोड़ना |
| स्नायु | मजबूत संयोजी ऊतक | अस्थि को अस्थि से जोड़ना और अत्यधिक गति रोकना |
क्रियाकलाप 3.2 — रक्त और उसके घटकों को समझना
दैनिक अनुभव एवं वैज्ञानिक कारण
- त्वचा कटने पर रक्त निकलना और बाद में थक्का बनना
बिंबाणु चोट के स्थान पर रक्त का थक्का बनाने में सहायता करते हैं।
- संक्रमित स्थान का लाल और सूजा हुआ होना
श्वेत रक्त कोशिकाएँ संक्रमित स्थान पर एकत्र होकर रोगाणुओं से लड़ती हैं। इसके कारण सूजन और मवाद बन सकता है।
- दौड़ने पर तेजी से साँस लेना और चेहरा लाल होना
पेशियों को अधिक ऑक्सीजन चाहिए होती है। इसलिए श्वसन दर और रक्त प्रवाह बढ़ जाता है।
रक्त के प्रमुख घटक
- प्लाज्मा: रक्त का तरल भाग; कुल आयतन का लगभग 55 प्रतिशत।
- लाल रक्त कोशिकाएँ: ऑक्सीजन का परिवहन करती हैं। इनमें लौह-समृद्ध हीमोग्लोबिन पाया जाता है।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ: संक्रमण से रक्षा करती हैं।
- बिंबाणु: रक्त का थक्का बनाने में सहायता करते हैं।
क्रियाकलाप 3.3 — संयोजी ऊतकों की पहचान
| क्रिया | अनुभव | पहचाना गया ऊतक |
|---|---|---|
| कोहनी को छूना | कठोर और दृढ़ संरचना | अस्थि |
| कान या नाक को दबाकर मोड़ना | नरम, लचीली और पुनः आकार लेने वाली संरचना | उपास्थि |
| अग्रबाहु छूकर अँगुलियाँ हिलाना | गति का प्रभाव अग्रबाहु तक अनुभव होता है | कंडरा |
| घुटने को एक सीमा तक मोड़ना | एक सीमा के बाद गति रुक जाती है | स्नायु |
निष्कर्ष
- अस्थि शरीर को सहारा और सुरक्षा देती है।
- उपास्थि लचीलापन और गद्दी जैसा प्रभाव देती है।
- कंडरा पेशी को अस्थि से जोड़ती है।
- स्नायु अस्थि को अस्थि से जोड़ता है तथा विस्थापन रोकता है।
3.3.3 क्या हम अपने शरीर में गति को नियंत्रित कर सकते हैं?
शरीर की गति पेशीय ऊतक के संकुचन और शिथिलन से होती है। पेशियाँ तीन प्रकार की होती हैं।
1. कंकाल पेशियाँ
ये अस्थियों से जुड़ी होती हैं और ऐच्छिक गति कराती हैं।
विशेषताएँ
- लंबी और बेलनाकार कोशिकाएँ
- अशाखित तंतु
- अनेक केंद्रक
- हल्की और गहरी धारियाँ
- हमारे सचेत नियंत्रण में कार्य करती हैं
उदाहरण: चलना, दौड़ना, लिखना और वस्तु उठाना।
2. चिकनी पेशियाँ
ये आंतरिक अंगों में पाई जाती हैं और अनैच्छिक गति कराती हैं।
विशेषताएँ
- तर्कुरूपी कोशिकाएँ
- एक केंद्रक
- धारियाँ अनुपस्थित
- धीमी और लगातार गति करती हैं
- सचेत नियंत्रण में नहीं होतीं
उदाहरण: आमाशय और आँत में भोजन की गति।
3. हृद पेशियाँ
ये केवल हृदय में पाई जाती हैं।
विशेषताएँ
- बेलनाकार और शाखित तंतु
- सामान्यतः एक केंद्रक
- हल्की धारियाँ
- अनैच्छिक, लयबद्ध और अथक गति
- जीवनभर बिना थके संकुचन करती हैं
पेशियों की तुलना
| विशेषता | कंकाल पेशी | चिकनी पेशी | हृद पेशी |
|---|---|---|---|
| नियंत्रण | ऐच्छिक | अनैच्छिक | अनैच्छिक |
| आकार | लंबा, बेलनाकार | तर्कुरूपी | बेलनाकार और शाखित |
| धारियाँ | उपस्थित | अनुपस्थित | हल्की उपस्थित |
| केंद्रक | अनेक | एक | सामान्यतः एक |
| स्थान | अस्थियों से जुड़ी | आंतरिक अंग | हृदय |
| गति | तेज, पर जल्दी थक सकती है | धीमी और सतत | लयबद्ध और अथक |
3.3.4 शरीर किस प्रकार संवेदन, संप्रेषण और अनुक्रिया करता है?
शरीर की गतिविधियों का नियंत्रण और समन्वय तंत्रिका ऊतक (Nervous tissue) करता है।
- मस्तिष्क शरीर का प्रमुख नियंत्रण केंद्र है।
- तंत्रिका ऊतक संवेदनाओं को ग्रहण करता है।
- यह संदेशों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुँचाता है।
- पेशियाँ तंत्रिका ऊतक से निर्देश प्राप्त करके कार्य करती हैं।
तंत्रिका ऊतक की कोशिका को तंत्रिका कोशिका या न्यूरॉन (Neuron) कहते हैं।
न्यूरॉन के प्रमुख भाग—कोशिका-काय: इसमें केंद्रक होता है और यह कोशिकीय गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
- द्रुमिका: अन्य न्यूरॉनों या ग्राही कोशिकाओं से संकेत प्राप्त करती है।
- तंत्रिकाक्ष: कोशिका-काय से संदेश को आगे ले जाता है।
- एक्सॉन टर्मिनल: संदेश को अगली कोशिका तक पहुँचाता है।
उदाहरण के लिए, गर्म वस्तु छूने पर तंत्रिका ऊतक तुरंत संदेश भेजता है और हाथ पीछे खींच लिया जाता है।
अध्याय नोट्स
3.4 पेशी-कंकाल तंत्र
पेशी-कंकाल तंत्र (Musculoskeletal system) निम्नलिखित से मिलकर बना होता है:
- अस्थियाँ
- पेशियाँ
- संधियाँ
- उपास्थियाँ
- कंडराएँ
- स्नायु
प्रमुख कार्य
- शरीर को सीधा खड़ा रखना
- शरीर को आकार और सहारा देना
- गति करना
- शरीर की मुद्रा बनाए रखना
- कोमल आंतरिक अंगों की रक्षा करना
गति किस प्रकार होती है?
- तंत्रिका तंत्र पेशियों को संकेत देता है।
- पेशियाँ संकुचित होती हैं।
- कंडराएँ पेशी के बल को अस्थि तक पहुँचाती हैं।
- अस्थि संधि के चारों ओर गति करती है।
संधियाँ स्वयं अस्थियों को नहीं चलातीं। वास्तविक गति पेशियों के संकुचन से होती है।
क्रियाकलाप 3.4 — अस्थि और पेशी द्रव्यमान का अनुमान
उद्देश्य
यह अनुमान लगाना कि शरीर के कुल भार में अस्थियों और पेशियों का कितना योगदान है।
विधि
- अपना कुल शारीरिक भार मापिए।
- आयु और लिंग के अनुसार औसत अस्थि तथा पेशी द्रव्यमान प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
- शरीर के भार को संबंधित प्रतिशत से गुणा कीजिए।
सामान्य अनुमान
- वयस्क पुरुषों में पेशी द्रव्यमान लगभग 40–50 प्रतिशत हो सकता है।
- वयस्क महिलाओं में पेशी द्रव्यमान लगभग 30–40 प्रतिशत हो सकता है।
- वयस्कों में अस्थि द्रव्यमान लगभग 12–15 प्रतिशत होता है।
सूत्र
अस्थियों का अनुमानित भार = कुल भार × अस्थि प्रतिशत ÷ 100
पेशियों का अनुमानित भार = कुल भार × पेशी प्रतिशत ÷ 100
ये प्रतिशत आयु, लिंग, पोषण, व्यायाम और शारीरिक संरचना के अनुसार अलग हो सकते हैं।
3.4.1 पेशी-कंकाल तंत्र की क्रियाशीलता
शरीर के अलग-अलग भाग अलग-अलग दिशाओं में गति कर सकते हैं। ऐसा उनमें उपस्थित संधियों की संरचना के कारण होता है।
क्रियाकलाप 3.5 — शरीर की गतियों का अवलोकन
विद्यार्थी कोहनी, कंधे, घुटने, गर्दन, अँगुलियों, पैर की अँगुलियों और कलाई को हिलाकर उनकी गति का अवलोकन करते हैं।
तालिका 3.5 — शरीर द्वारा की जाने वाली विभिन्न गतियाँ
| शरीर के भाग | पूरा घुमाव | आंशिक घुमाव | झुकाव/मुड़ना | घूमना, बगल से ऊपर उठाना, ऊपर-नीचे या कोई अन्य गति |
|---|---|---|---|---|
| कोहनी | नहीं | नहीं | नहीं\ | अग्रबाहु को ऊपर-नीचे करना तथा मोड़ना-सीधा करना |
| कंधा | हाँ | हाँ | हाँ | हाथ को आगे-पीछे, बगल से ऊपर तथा गोलाकार घुमाना |
| घुटना | नहीं | नहीं | हाँ | पैर को पीछे की ओर मोड़ना और पुनः सीधा करना |
| गर्दन | नहीं | हाँ | हाँ | सिर को दाएँ-बाएँ घुमाना तथा ऊपर-नीचे झुकाना |
| अँगुलियाँ | नहीं | नहीं | हाँ | अँगुलियों को मोड़ना, सीधा करना, फैलाना और पास लाना |
| पैर की अँगुलियाँ | नहीं | नहीं | हाँ | सीमित रूप से मोड़ना, सीधा करना और फैलाना |
| कलाई | नहीं | हाँ | हाँ | हाथ को ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ तथा सीमित गोलाकार दिशा में घुमाना |
संधि
दो या दो से अधिक अस्थियों के बीच का जोड़ संधि (Joint) कहलाता है। संधियाँ अस्थियों को नियंत्रित सीमा में गति करने देती हैं।
अध्याय नोट्स
3.5 संधियों के प्रकार
3.5.1 कंदुक-खल्लिका संधि
इसे अंग्रेजी में Ball and Socket Joint कहते हैं।
संरचना
एक अस्थि का गोलाकार सिरा दूसरी अस्थि के कटोरी जैसे गड्ढे में फिट होता है।
गति
- आगे और पीछे
- दाएँ और बाएँ
- ऊपर और नीचे
- गोलाकार गति
उदाहरण: कंधे की संधि।
कंधा जत्रुकास्थि के साथ मिलकर कंधे की मेखला बनाता है, जो भुजा को कंकाल से जोड़ती है।
3.5.2 कोर संधि
इसे अंग्रेजी में Hinge Joint कहते हैं।
यह दरवाजे के कब्जे की तरह मुख्यतः एक दिशा में गति करती है।
गति
- मुड़ना
- सीधा होना
उदाहरण: कोहनी और घुटना।
घुटने में उपस्थित छोटी अस्थि को जानुफलक (Patella/Kneecap) कहते हैं। यह घुटने की संधि की रक्षा करती है।
3.5.3 धुराग्र संधि
इसे अंग्रेजी में Pivot Joint कहते हैं।
यह एक अस्थि को दूसरी अस्थि के चारों ओर घूमने देती है।
उदाहरण: खोपड़ी और मेरुदंड के बीच की संधि।
इसकी सहायता से हम:
- सिर को दाएँ-बाएँ घुमा सकते हैं।
- सिर को ऊपर-नीचे कर सकते हैं।
3.5.4 अचल संधियाँ
इन संधियों में अस्थियाँ आपस में मजबूती से जुड़ी होती हैं और गति नहीं कर सकतीं।
उदाहरण: खोपड़ी की अस्थियों के बीच की संधियाँ।
महत्त्व
- मस्तिष्क की रक्षा करती हैं।
- आँखों और कानों को सुरक्षित रखती हैं।
- शरीर की गति के समय खोपड़ी को दृढ़ बनाए रखती हैं।
संधियों का संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन
| संधि | गति | उदाहरण |
|---|---|---|
| कंदुक-खल्लिका | लगभग सभी दिशाओं में | कंधा |
| कोर | मुख्यतः एक दिशा में | कोहनी, घुटना |
| धुराग्र | घूर्णन या घूमना | गर्दन |
| अचल | कोई गति नहीं | खोपड़ी |
अध्याय नोट्स
3.6 कंकाल तंत्र
कंकाल तंत्र (Skeletal system) अस्थियों का ढाँचा है, जो शरीर को आकार, दृढ़ता और सहारा देता है।
इसके प्रमुख भाग हैं:
- खोपड़ी
- कशेरुक दंड
- पसली पिंजर
- हाथ-पैरों की अस्थियाँ
- कंधे और श्रोणि की मेखलाएँ
कंकाल तंत्र के कार्य
- शरीर को निश्चित आकार देना
- शरीर को सहारा देना
- मस्तिष्क, हृदय और फेफड़ों जैसे कोमल अंगों की रक्षा करना
- पेशियों और संधियों के साथ मिलकर गति कराना
- शरीर की मुद्रा बनाए रखना
खोपड़ी
- चपटी और दृढ़ अस्थियों से बनी होती है।
- मस्तिष्क, आँखों और कानों की रक्षा करती है।
- इसकी अधिकांश अस्थियाँ अचल संधियों से जुड़ी होती हैं।
कशेरुक दंड
खोपड़ी के आधार से निकलने वाला लचीला अस्थि-दंड कशेरुक दंड, मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी कहलाता है।
- यह छोटी-छोटी अस्थियों से बना होता है, जिन्हें कशेरुकाएँ कहते हैं।
- शरीर को सहारा देता है।
- सीधे खड़े होने में सहायता करता है।
- मेरुरज्जु की रक्षा करता है।
- दो कशेरुकाओं के बीच उपास्थि चक्रिका होती है।
- उपास्थि चक्रिका गद्दी जैसा प्रभाव और लचीलापन देती है।
पसली पिंजर
मानव शरीर में पसलियों के 12 जोड़े होते हैं।
- पसलियाँ मिलकर पसली पिंजर बनाती हैं।
- यह हृदय और फेफड़ों की रक्षा करता है।
- पसलियाँ पीछे मेरुदंड और सामने उरोस्थि से जुड़ी होती हैं।
- लचीली उपास्थि के कारण पसली पिंजर श्वसन के समय फैलता और सिकुड़ता है।
- इसके फैलने-सिकुड़ने से फेफड़ों में वायु का आवागमन संभव होता है।
कंकाल को स्वस्थ रखने के उपाय
- सही शारीरिक मुद्रा बनाए रखना
- कैल्सियम और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना
- नियमित व्यायाम करना
- योग करना
- चोटों से बचाव करना
अध्याय नोट्स
एक कोशिका से पूर्ण जीव तक — पूर्णशक्तता
कुछ परिपक्व पादप कोशिकाओं में उचित परिस्थितियों में एक संपूर्ण नया पौधा बनाने की क्षमता होती है। इस क्षमता को पूर्णशक्तता (Totipotency) कहते हैं।
एफ.सी. स्टीवर्ड का प्रयोग
वर्ष 1958 में एफ.सी. स्टीवर्ड ने गाजर की फ्लोएम कोशिकाओं का संवर्धन करके एक पूर्ण पौधा विकसित किया।
प्रयोग की प्रक्रिया
- गाजर के फ्लोएम से कोशिकाएँ ली गईं।
- उन्हें शर्करा, पोषक तत्वों और वृद्धि हार्मोनों से युक्त माध्यम में रखा गया।
- कोशिकाएँ विभाजित होकर कोशिकाओं का एक अविभेदित समूह बनाने लगीं।
- इन कोशिकाओं ने बाद में जड़ और प्ररोह बनाए।
- अंततः उनसे एक संपूर्ण गाजर का पौधा विकसित हो गया।
निर्विभेदन
जब परिपक्व और विशेषीकृत कोशिकाएँ पुनः विभाजन की क्षमता प्राप्त कर लेती हैं, तो इस प्रक्रिया को निर्विभेदन कहते हैं।
पुनःविभेदन
जब निर्विभेदित कोशिकाएँ पुनः विशेषीकृत होकर जड़, तना और पत्ती जैसे भाग बनाती हैं, तो इसे पुनःविभेदन कहते हैं।
पूर्णशक्तता का महत्त्व
- ऊतक संवर्धन द्वारा बड़ी संख्या में पौधे तैयार करना
- रोगमुक्त पौधे विकसित करना
- उपयोगी और उन्नत फसल किस्मों का उत्पादन
- दुर्लभ पौधों का संरक्षण
- पादप आनुवंशिक अभियांत्रिकी में उपयोग
अध्याय नोट्स
अध्याय का संक्षिप्त सारांश
- समान संरचना वाली कोशिकाओं का समूह, जो एक विशेष कार्य करता है, ऊतक कहलाता है।
- पौधों और जंतुओं में अनेक ऊतक समन्वित होकर जैव प्रक्रमों को पूरा करते हैं।
- पादप ऊतक मुख्यतः विभज्योतक और स्थायी ऊतकों में बाँटे जाते हैं।
- शीर्षस्थ विभज्योतक लंबाई, पार्श्व विभज्योतक मोटाई और अंतर्वेशी विभज्योतक पुनः वृद्धि कराता है।
- विभेदन द्वारा विभज्योतक कोशिकाएँ स्थायी ऊतकों में बदलती हैं।
- बाह्यत्वचा पौधे को जल-हानि, संक्रमण और यांत्रिक क्षति से बचाती है।
- मृदूतक भंडारण और प्रकाश-संश्लेषण करता है।
- श्लेषोतक सहारा और लचीलापन प्रदान करता है।
- दृढ़ोतक कठोरता और यांत्रिक शक्ति देता है।
- जाइलम जल तथा खनिजों का और फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
- जंतु ऊतक चार प्रकार के हैं—उपकला, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका।
- उपकला ऊतक शरीर का बाहरी आवरण और अंगों का आंतरिक आस्तर बनाता है।
- संयोजी ऊतक शरीर के अंगों को जोड़ता और सहारा देता है।
- कंकाल पेशी ऐच्छिक, चिकनी पेशी अनैच्छिक तथा हृद पेशी लयबद्ध गति करती है।
- तंत्रिका ऊतक संदेशों को ग्रहण और संचारित करके शरीर का नियंत्रण तथा समन्वय करता है।
- पेशी-कंकाल तंत्र शरीर को सहारा, सुरक्षा और गति प्रदान करता है।
- कंदुक-खल्लिका, कोर, धुराग्र और अचल संधियाँ अलग-अलग प्रकार की गतियाँ संभव बनाती हैं।
- कंकाल तंत्र में खोपड़ी, कशेरुक दंड और पसली पिंजर जैसे प्रमुख भाग सम्मिलित हैं।
- कुछ पादप कोशिकाएँ पूर्णशक्त होती हैं और उचित परिस्थितियों में उनसे संपूर्ण पौधा विकसित किया जा सकता है।
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