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अध्याय नोट्स
परिचय
जैव विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों के असंख्य रूपों और उनके पर्यावासों की विविधता से है। इसमें सूक्ष्मदर्शीय जीवों से लेकर विशाल वृक्ष, जैलीफिश से लेकर गरुड़ तथा हिमालय से लेकर अंडमान सागर की प्रवाल भित्तियाँ तक सम्मिलित हैं।
जैव विविधता का महत्त्व:
- महासागरीय सूक्ष्म शैवाल ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं।
- कवक और जीवाणु मृत पदार्थों का अपघटन करके मृदा को उर्वर बनाते हैं।
- पक्षी, मधुमक्खियाँ और चमगादड़ परागण में सहायता करते हैं।
- पादप सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाकर अधिकांश आहार-शृंखलाओं का आधार तैयार करते हैं।
- मानव भोजन, आवास, औषधि और आजीविका के लिए जैव विविधता पर निर्भर है।
- फसलों की विविध किस्में सूखा, पीड़क और प्रतिकूल मृदा के कारण फसल नष्ट होने का जोखिम कम करती हैं तथा खाद्य सुरक्षा मजबूत बनाती हैं।
जीवों के साझा गुणों और विकासात्मक संबंधों के आधार पर उनका समूहन जैविक वर्गीकरण कहलाता है।
अध्याय नोट्स
12.1 जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में भारत
भारत में उत्तर के पर्वत, पश्चिम के मरुस्थल, पूर्वोत्तर के वर्षावन, दक्षिण के पठार और लंबी समुद्री तटरेखाएँ पाई जाती हैं। इन क्षेत्रों की मृदा, तापमान और वर्षा अलग-अलग होने के कारण यहाँ अनेक प्रकार के पर्यावास और जीव पाए जाते हैं।
अध्याय नोट्स
स्थानिक जातियाँ
जो जातियाँ विश्व के किसी विशेष क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं और अन्यत्र नहीं मिलतीं, उन्हें विशेषक्षेत्री या स्थानिक जातियाँ कहते हैं।
भारत की कुछ स्थानिक जातियाँ:
- नीलगिरी तहर
- सिंहपुच्छी वानर या लॉयन टेल्ड मकाक
- घटपर्णी पौधा Nepenthes khasiana
- नीलकुरिंजी
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जैव विविधता हॉटस्पॉट
ऐसा क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में स्थानिक जातियाँ पाई जाती हैं और जिसके पर्यावास की अत्यधिक क्षति हुई है, जैव विविधता हॉटस्पॉट कहलाता है।
भारत से संबंधित प्रमुख वैश्विक हॉटस्पॉट हैं:
- पश्चिमी घाट
- इंडो-बर्मा क्षेत्र, जिसमें पूर्वोत्तर भारत भी शामिल है
- हिमालय
- सुंडालैंड, जिसमें निकोबार द्वीप समूह शामिल है
इनका संरक्षण आवश्यक है क्योंकि ये आहार जालों को बनाए रखने और पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायता करते हैं।
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12.2 जैव विविधता का विकास किस प्रकार हुआ?
वर्तमान जैव विविधता सदैव एक जैसी नहीं थी। जीवों में पाए जाने वाले छोटे-छोटे अंतर उनकी उत्तरजीविता और जनन की संभावनाओं को प्रभावित करते थे। लाभदायक अंतर जीवों को बदलती परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होने में सहायता करते थे।
अनेक पीढ़ियों तक इन अंतरों के संचित होने से जीवन के नए रूप विकसित हुए। इसलिए वर्तमान जैव विविधता:
- दीर्घकालीन परिवर्तनों का परिणाम है।
- जीवों और उनके परिवेश की पारस्परिक क्रियाओं से बनी है।
- वर्गीकरण द्वारा क्रमबद्ध रूप से समझी जा सकती है।
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विज्ञान को भारत का योगदान
- प्राचीन संगम तिनाई परंपरा में भूदृश्यों और उनमें रहने वाले जीव-समूहों का वर्गीकरण किया गया था।
- पवित्र उपवनों के संरक्षण ने स्थानीय स्तर पर अनेक पर्यावासों को सुरक्षित रखा।
- ये परंपराएँ आधुनिक पारिस्थितिक सिद्धांतों के अनुरूप प्रकृति की विकसित साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ को दर्शाती हैं।
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12.3 जीवों का वर्गीकरण कैसे करें?
जीवों को उनके पर्यावास, भोजन, सक्रियता के समय, शरीर की बनावट और अन्य विशेषताओं के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, जीवों का समूहन इस प्रकार किया जा सकता है:
- दिन में सक्रिय और रात में सक्रिय जीव
- जलीय, स्थलीय और वृक्षों पर रहने वाले जीव
- मांसाहारी, शाकाहारी और सर्वाहारी जीव
- पंख, पैर या अन्य बाहरी विशेषताओं वाले जीव
महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष: चयनित मानदंड बदलने पर एक ही जीव अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है। इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण में उपयोग किए जाने वाले लक्षणों का सावधानीपूर्वक चयन करते हैं।
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12.3.1 सजीवों को वर्गीकृत करने हेतु मानदंड
वैज्ञानिक पहले व्यापक और आसानी से दिखाई देने वाली विशेषताओं का अध्ययन करते हैं। इसके बाद अधिक विस्तृत लक्षणों को देखा जाता है।
प्रमुख मानदंड हैं:
- बाह्य विशेषताएँ: आकार, आमाप और शारीरिक संगठन।
- पोषण की विधि: स्वपोषी अथवा विषमपोषी।
- आंतरिक संरचनाएँ: कंकाल का प्रतिरूप, अंगों की उपस्थिति या अनुपस्थिति तथा ऊतक।
- कोशिका संरचना: एककोशिकीय या बहुकोशिकीय, पूर्वकेंद्री या सुकेंद्री तथा कोशिका भित्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति।
- पारिस्थितिकीय भूमिका: उत्पादक, उपभोक्ता अथवा अपघटक।
- जनन: लैंगिक अथवा अलैंगिक जनन।
- आनुवंशिक समानता: डीएनए और वंशागत गुणों में समानता।
जीवों की समान विशेषताएँ यह संकेत देती हैं कि वे संभवतः एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं।
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12.4 वर्गीकरण की आवश्यकता
जिस प्रकार हजारों बिखरी पुस्तकों वाले पुस्तकालय में किसी विशेष पुस्तक को खोजना कठिन होता है, उसी प्रकार बिना वर्गीकरण के पृथ्वी पर पाए जाने वाले करोड़ों जीवों का अध्ययन करना कठिन होगा।
जैविक वर्गीकरण:
- जीवों के अध्ययन को व्यवस्थित और क्रमबद्ध बनाता है।
- जीवों की समानताएँ और असमानताएँ समझाता है।
- उनके विकासात्मक और पारिस्थितिक संबंधों की जानकारी देता है।
- नए जीवों की पहचान और नामकरण में सहायता करता है।
- विलुप्ति के खतरे वाले जीवों की पहचान करके संरक्षण में सहायता करता है।
- विश्वभर के वैज्ञानिकों को एक समान प्रणाली में जानकारी साझा करने की सुविधा देता है।
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क्रियाकलाप 12.2 — पक्के बाघ अभयारण्य की केस स्टडी
पक्के बाघ अभयारण्य अरुणाचल प्रदेश में स्थित है। यहाँ वैज्ञानिकों ने पक्षियों की लगभग 300 जातियाँ अभिलेखित की हैं, जबकि संपूर्ण भारत में लगभग 1300 पक्षी जातियाँ पाई जाती हैं।
यह अभयारण्य धनेश पक्षियों की चार जातियों के लिए प्रसिद्ध है:
- लाल गर्दन वाला धनेश
- श्वेत-श्याम धनेश
- महाधनेश
- मोरछली धनेश
ये पक्षी:
- पुराने और विशाल वृक्षों के कोटरों में घोंसले बनाते हैं।
- विशेष प्रकार के फल खाते हैं।
- वृक्षों के आकार और फलों की उपलब्धता के अनुसार वन के अलग-अलग भागों में पाए जाते हैं।
केस स्टडी का निष्कर्ष: वर्गीकरण वैज्ञानिकों को मिलती-जुलती जातियों में अंतर करने, उनके वितरण को समझने और पर्यावास से उनके संबंधों का अध्ययन करने में सहायता करता है। पुराने विशाल वृक्षों के नष्ट होने से धनेशों के घोंसले, भोजन और जनसंख्या गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
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12.5 समय-समय पर विकसित हुई जैविक वर्गीकरण की प्रणालियाँ
| वैज्ञानिक / परंपरा | समय | वर्गीकरण प्रणाली और आधार |
|---|---|---|
| प्राचीन भारतीय ग्रंथ | प्राचीन काल | ऋग्वेद और वृहत संहिता में जीवों का वर्गीकरण पर्यावास , व्यवहार और पारिस्थितिक भूमिका के आधार पर किया गया । |
| अरस्तू | चौथी शताब्दी सामान्य संवत् पूर्व | जीवों को स्थल , जल और वायु के आधार पर समूहित किया । यह बाहरी विशेषताओं पर आधारित कृत्रिम प्रणाली थी । |
| कैरोलस लिनियस | 1758 | द्विजगत प्रणाली — प्लांटी और एनिमेलिया । |
| अर्न्स्ट हेकेल | 1866 | एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों के लिए प्रोटिस्टा जोड़कर तीन जगत प्रणाली दी । |
| हर्बर्ट एफ . कोपलैंड | 1938 | जीवाणुओं को मोनेरा में रखकर चार जगत प्रणाली दी । |
| रॉबर्ट एच . व्हिटेकर | 1969 | मोनेरा , प्रोटिस्टा , फंजाई , प्लांटी और एनिमेलिया की पाँच जगत प्रणाली प्रस्तुत की । |
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द्विजगत प्रणाली की सीमा
अमीबा, पैरामीशियम और जीवाणु जैसे जीवों को केवल पादप या जंतु में रखना कठिन था। अमीबा और पैरामीशियम गतिशील एवं विषमपोषी होते हैं, परंतु एककोशिकीय हैं। जीवाणुओं में झिल्ली-आबद्ध वास्तविक केंद्रक भी नहीं होता।
फंजाई को अलग जगत क्यों बनाया गया?
कवक पौधों की तरह सामान्यतः अचल होते हैं, लेकिन अपना भोजन नहीं बनाते। वे मृत, सड़े-गले पदार्थों या अन्य जीवों से पोषक तत्त्वों का अवशोषण करते हैं। इसलिए उन्हें प्लांटी से अलग करके फंजाई में रखा गया।
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12.6 पाँच जगत वर्गीकरण
पाँच जगत वर्गीकरण के मुख्य आधार हैं:
- कोशिका का प्रकार—पूर्वकेंद्री या सुकेंद्री
- कोशिका भित्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति
- संगठन का स्तर—एककोशिकीय या बहुकोशिकीय
- पोषण की विधि—स्वपोषी या विषमपोषी
| जगत | प्रमुख विशेषताएँ | उदाहरण |
|---|---|---|
| मोनेरा | एककोशिकीय , पूर्वकेंद्री | जीवाणु , आर्किया , सायनोबैक्टीरिया |
| प्रोटिस्टा | एककोशिकीय , सुकेंद्री ; कोशिका भित्ति उपस्थित या अनुपस्थित | अमीबा , पैरामीशियम , यूग्लीना , क्लैमाइडोमोनास |
| फंजाई | प्रायः बहुकोशिकीय , काइटिन की कोशिका भित्ति , विषमपोषी अपघटक | मशरूम , यीस्ट , ऐस्पर्जिलस |
| प्लांटी | बहुकोशिकीय , सेलुलोस की कोशिका भित्ति , स्वपोषी उत्पादक | मॉस , फर्न , घास , चीड़ , गुलाब |
| एनिमेलिया | बहुकोशिकीय , कोशिका भित्ति रहित , विषमपोषी उपभोक्ता | चींटी , मेंढक , पक्षी , बिल्ली , मानव |
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12.6.1 जगत मोनेरा — एककोशिकीय पूर्वकेंद्री जीव
मोनेरा के जीव एककोशिकीय और पूर्वकेंद्री होते हैं। इनमें झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक नहीं होता।
प्रमुख विशेषताएँ:
- मृदा, जल, वायु, उष्ण स्रोतों और अन्य चरम परिस्थितियों में पाए जाते हैं।
- मानव शरीर तथा रोमंथी जंतुओं की आहार नली में भी पाए जाते हैं।
- कुछ जीवाणु रोगजनक होते हैं।
- लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम लाभदायक जीवाणु हैं।
- कुछ जीवाणु गोबर से बायोगैस उत्पादन में सहायता करते हैं।
- कुछ तेल, कीटनाशक और वाहित मल जैसे प्रदूषकों का विघटन करते हैं।
- मोनेरा में स्वपोषी और अपघटक, दोनों प्रकार के जीव पाए जाते हैं।
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विशेष तथ्य
- सायनोबैक्टीरिया प्रारंभिक प्रकाश-संश्लेषी जीवों में थे।
- लगभग 2.5 अरब वर्ष पूर्व इनके द्वारा निर्मुक्त ऑक्सीजन के कारण वायुमंडल में ऑक्सीजन का संचय हुआ।
- इनके प्राचीन जीवाश्म स्ट्रोमेटोलाइट्स कहलाते हैं। ये राजस्थान और मध्य प्रदेश में पाए गए हैं।
- राम बक्स सिंह को आधुनिक बायोगैस का जनक कहा जाता है। उन्होंने 1957 में रामनगर, सीतापुर में भारत का पहला वैज्ञानिक रूप से अभिकल्पित बायोगैस संयंत्र स्थापित किया।
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12.6.2 जगत प्रोटिस्टा — एककोशिकीय सुकेंद्री जीव
प्रोटिस्टा में एककोशिकीय सुकेंद्री जीव शामिल होते हैं। इनमें वास्तविक, झिल्ली-आबद्ध केंद्रक पाया जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- कोशिका भित्ति अनुपस्थित या सेलुलोस की बनी हो सकती है।
- सामान्यतः जल या नम स्थानों में रहते हैं।
- कुछ स्वपोषी और कुछ विषमपोषी होते हैं।
- जलीय आहार-शृंखलाओं की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं।
- कुछ ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं।
- कुछ छोटे जीवों के भोजन बनते हैं।
- कुछ अपघटक बनकर पोषक तत्त्वों के चक्रण में सहायता करते हैं।
उदाहरण: अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना और क्लैमाइडोमोनास।
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12.6.3 जगत फंजाई — कोशिका भित्तियुक्त, विषमपोषी सुकेंद्री जीव
कवक प्रायः बहुकोशिकीय और सुकेंद्री होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते।
- महीन तंतुओं द्वारा मृत या सड़ते पदार्थों से पोषक तत्त्वों का अवशोषण करते हैं।
- तंतु मिलकर कवक-जाल या माइसीलियम बनाते हैं।
- अधिकांश कवक मृतपोषी होते हैं।
- कुछ सहजीवी और कुछ परजीवी होते हैं।
- बीजाणुओं द्वारा लैंगिक तथा अलैंगिक जनन करते हैं।
- गर्म और नम परिस्थितियों में अच्छी वृद्धि करते हैं।
- अपघटक के रूप में पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
उदाहरण: यीस्ट, ब्रेड मोल्ड, मशरूम, ऐस्पर्जिलस और पेनिसिलियम।
विशेष बात: यीस्ट एककोशिकीय होता है, फिर भी काइटिन की कोशिका भित्ति के कारण इसे फंजाई में रखा गया है।
ऐस्पर्जिलस और पेनिसिलियम का उपयोग एंजाइम तथा प्रतिजैविक औषधियाँ बनाने में किया जाता है। मशरूम की खेती कम स्थान, कम निवेश और लगभग 30–45 दिन में तैयार होने के कारण आजीविका का उपयोगी साधन है।
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12.6.4 जगत प्लांटी — कोशिका भित्तियुक्त, बहुकोशिकीय, स्वपोषी सुकेंद्री जीव
पादप बहुकोशिकीय, स्वपोषी और सुकेंद्री होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेलुलोस की बनी होती है, जो अवलंब और सुरक्षा प्रदान करती है।
पादप:
- प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
- अधिकांश आहार-शृंखलाओं का आधार तैयार करते हैं।
- जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं।
प्लांटी को पाँच वर्गों में बाँटा गया है—थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
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थैलोफाइटा—आद्य पौधे
थैलस का अर्थ अविभेदित काया है। थैलोफाइटा सबसे सरल पौधों में शामिल हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अधिकांशतः जल या नम स्थानों में पाए जाते हैं।
- शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभेदित नहीं होता।
- थैलस द्वारा जल, गैसों और पोषक तत्त्वों का सीधे आदान-प्रदान होता है।
- जलीय पर्यावासों के लिए पूर्णतः अनुकूलित होते हैं।
उदाहरण: स्पाइरोगाइरा।
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लाइकेन
लाइकेन शैवाल और कवक का सहजीवी संबंध है। कवक सुरक्षा देता है और शैवाल प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाता है।
- ये वायु प्रदूषण के प्राकृतिक जैव-सूचक हैं।
- कुछ लाइकेन, जिन्हें पत्थर के फूल कहा जाता है, मसाले के रूप में उपयोग होते हैं।
- कुछ का उपयोग औषधि तथा कपड़ों के लिए रंग बनाने में होता है।
- कुछ लाइकेन विषैले भी होते हैं, इसलिए उनकी सही पहचान आवश्यक है।
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ब्रायोफाइटा—प्रथम स्थलीय पौधे जिन्हें जनन के लिए जल चाहिए
ब्रायोफाइटा जल से स्थल की ओर पौधों के संक्रमण को दर्शाते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- नम चट्टानों, पुरानी दीवारों और मिट्टी पर हरे कालीन जैसे दिखाई देते हैं।
- शरीर थैलोफाइटा से अधिक विभेदित होता है।
- इनमें जड़ जैसी संरचनाएँ मूलाभास होती हैं।
- तने और पत्तियों जैसी सरल संरचनाएँ हो सकती हैं।
- वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट नहीं होतीं।
- संवहनी ऊतक अनुपस्थित होते हैं।
- नर जनन कोशिकाओं को मादा कोशिकाओं तक पहुँचने के लिए जल चाहिए।
इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है।
उदाहरण: मार्केंशिया और मॉस।
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टेरिडोफाइटा—स्थल के लिए अनुकूलन और परिवहन तंत्र
टेरिडोफाइटा में वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ पाई जाती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- इनमें संवहनी ऊतक उपस्थित होते हैं।
- जाइलम जल का परिवहन करता है।
- फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
- स्थल पर जीवन के लिए अधिक अनुकूलित होते हैं।
- जनन के लिए अभी भी जलीय परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं।
- बीज उत्पन्न नहीं करते।
उदाहरण: फर्न।
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जिम्नोस्पर्म—जलरहित जनन
जिम्नोस्पर्म का अर्थ अनावृत बीज वाले पौधे है। यहाँ जलरहित जनन का अर्थ है कि निषेचन के लिए बाहरी जल की आवश्यकता नहीं होती।
प्रमुख विशेषताएँ:
- ठंडे और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं।
- सुई या शल्क जैसी पत्तियाँ जल की हानि कम करती हैं।
- बीज भ्रूण की रक्षा करते और भोजन संचित रखते हैं।
- बीज फल में बंद नहीं होते।
- बीज प्रायः शंकुओं पर अनावृत रहते हैं।
उदाहरण: चीड़ और साइकैड।
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एंजियोस्पर्म—प्रभावी जनन एवं बीज प्रकीर्णन
एंजियोस्पर्म पुष्पी पौधे हैं तथा सर्वाधिक जटिलकाय संगठन वाले पादपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सुविकसित जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं।
- पुष्प परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं।
- बीज फल के भीतर बंद होते हैं।
- फल बीजों की सुरक्षा और प्रकीर्णन में सहायता करते हैं।
- बीजों का प्रकीर्णन कीटों, पक्षियों, जंतुओं, वायु या जल द्वारा हो सकता है।
- इनमें एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधे शामिल हैं।
- ये पृथ्वी का सर्वाधिक विविध पादप समूह हैं।
उदाहरण: गुलमोहर।
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विशेष तथ्य
होर्टस मलाबारिकस भारतीय पौधों पर लिखी गई प्राचीन वैज्ञानिक पुस्तकों में से एक है। इसे 17वीं शताब्दी में हेन्ड्रिक वान रीडे ने भारतीय वैद्य एवं वनस्पतिशास्त्री इट्टी अच्युतण और स्थानीय विशेषज्ञों की सहायता से संकलित किया था।
अध्याय नोट्स
तालिका 12.3—पादप समूहों के लाभ और चुनौतियाँ
| पादप समूह | प्रमुख उपलब्धि एवं लाभ | मुख्य चुनौती |
|---|---|---|
| थैलोफाइटा | सरल थैलस द्वारा जल , गैसों और पोषक तत्त्वों का सीधा आदान - प्रदान | स्थल पर जीवित नहीं रह सकते |
| ब्रायोफाइटा | स्थल पर निवास और काया में कुछ विभेदन | नमी तथा जनन के लिए जल पर निर्भरता ; संवहनी ऊतक अनुपस्थित |
| टेरिडोफाइटा | वास्तविक जड़ , तना , पत्तियाँ और संवहनी ऊतक | जनन के लिए जल आवश्यक ; बीज अनुपस्थित |
| जिम्नोस्पर्म | जल - स्वतंत्र निषेचन , बीज और शुष्कता के अनुकूल पत्तियाँ | बीज फलों से आवृत नहीं होते |
| एंजियोस्पर्म | पुष्प , फल , आवृत बीज और प्रभावी बीज - प्रकीर्णन | जनन विभिन्न परागण कारकों पर निर्भर हो सकता है |
विकासात्मक क्रम: आरंभिक पादप जल पर निर्भर थे। क्रमशः वास्तविक अंग, संवहनी ऊतक, बीज, जल-स्वतंत्र निषेचन, पुष्प और फल विकसित हुए।
अध्याय नोट्स
12.6.5 जगत एनिमेलिया—बहुकोशिकीय, विषमपोषी सुकेंद्री जीव
जंतु बहुकोशिकीय, सुकेंद्री और विषमपोषी जीव होते हैं। अधिकांश जंतु:
- चलन करते हैं।
- उद्दीपन के प्रति त्वरित अनुक्रिया दिखाते हैं।
- समन्वित व्यवहार करते हैं।
- भोजन खोजते और शिकारी से बचते हैं।
जंतुओं के वर्गीकरण का प्रमुख आधार पृष्ठरज्जु की उपस्थिति या अनुपस्थिति है। पृष्ठरज्जु एक लचीली छड़ाकार संरचना होती है।
- पृष्ठरज्जु रहित जंतु—नॉन कॉर्डेटा
- किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु वाले जंतु—कॉर्डेटा
- कॉर्डेटा को प्रोटोकॉर्डेटा और वर्टिब्रेटा में बाँटा गया है।
अध्याय नोट्स
अकशेरुकी जीव—पृष्ठरज्जु रहित जंतु
अकशेरुकी जीवों में पृष्ठरज्जु नहीं होती। फिर भी इनमें कोशिकीय स्तर से लेकर जटिल अंग-तंत्र स्तर तक अनेक प्रकार की शारीरिक संरचनाएँ पाई जाती हैं।
इनका अध्ययन बताता है कि समय के साथ:
- भोजन ग्रहण करने की विधियाँ बेहतर हुईं।
- दिशात्मक और नियंत्रित गति विकसित हुई।
- सुरक्षा प्रदान करने वाली संरचनाएँ बनीं।
- नियंत्रण और समन्वय अधिक विकसित हुआ।
पोरीफेरा—ऊतक रहित बहुकोशिकता

पोरीफेरा के जीवों को सामान्यतः स्पंज कहा जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- बहुकोशिकीय होते हैं, परंतु वास्तविक ऊतक और अंग नहीं होते।
- शरीर में अनेक छोटे छिद्र और नाल पाए जाते हैं।
- जल भोजन और ऑक्सीजन को कोशिकाओं तक पहुँचाता है।
- जल ही अपशिष्ट पदार्थों को बाहर ले जाता है।
- एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं।
- जलीय पर्यावरण में पाए जाते हैं।
विशेष तथ्य: एक किलोग्राम स्पंज प्रतिदिन लगभग 24,000 लीटर समुद्री जल को निस्यंदित कर सकता है।
अध्याय नोट्स
नाइडेरिया—वास्तविक ऊतक और सक्रिय भोजन ग्रहण
उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश और कोरल।
प्रमुख विशेषताएँ:
- ऊतक-स्तरीय संगठन होता है।
- विशेषीकृत कोशिकाएँ विशेष कार्य करती हैं।
- स्पर्शकों द्वारा शिकार पकड़ते हैं।
- शरीर में एक ही छिद्र होता है।
- यही छिद्र भोजन के अंतर्ग्रहण और अपशिष्ट निष्कासन, दोनों के लिए प्रयुक्त होता है।
अध्याय नोट्स
प्लैटीहेल्मिन्थीस—द्विपार्श्व सममिति और दिशात्मक गति
इन्हें चपटे कृमि कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- शरीर को एक तल से दो समान भागों में बाँटा जा सकता है।
- सिर, पूँछ, आगे और पीछे के भाग स्पष्ट होते हैं।
- शरीर चपटा होता है, जिससे गैसों का विसरण सरल होता है।
- भोजन और अपशिष्ट के लिए एक ही छिद्र होता है।
- अनेक चपटे कृमि परजीवी होते हैं।
- अंकुश और चूषक उन्हें परपोषी के शरीर से जुड़े रहने में सहायता करते हैं।
संक्रमण से बचने के लिए हाथ धोना, स्वच्छ भोजन खाना तथा उबला या निस्यंदित जल पीना आवश्यक है।
अध्याय नोट्स
नेमाटोडा—दो छिद्रों वाली सुव्यवस्थित शरीर रचना
इन्हें गोल कृमि कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- शरीर लंबा और बेलनाकार होता है।
- मिट्टी, जल या परपोषी के ऊतकों में पाए जाते हैं।
- शरीर में दो छिद्र—मुख और गुदा—होते हैं।
- अंग-तंत्र स्तर का संगठन पाया जाता है।
- नर और मादा कृमि अलग-अलग होते हैं।
ऐनेलिडा—खंडीभवन और देहगुहा

उदाहरण: केंचुआ।
प्रमुख विशेषताएँ:
- शरीर बेलनाकार और खंडों में विभाजित होता है।
- खंडीभवन से लचीलापन और गति पर अधिक नियंत्रण मिलता है।
- अंग-तंत्र स्तर का संगठन होता है।
- पेशियाँ गति करने में सहायता करती हैं।
- तंत्रिका रज्जु नियंत्रण और समन्वय करती है।
- शरीर में देहगुहा उपस्थित होती है।
अध्याय नोट्स
आर्थ्रोपोडा—संधित उपांग और बहिःकंकाल
आर्थ्रो का अर्थ संधित और पोडा का अर्थ पाद है।
उदाहरण: कीट, केकड़े और मकड़ियाँ।
प्रमुख विशेषताएँ:
- शरीर खंडयुक्त होता है।
- विभिन्न खंड अलग-अलग कार्यों के लिए विशेषीकृत होते हैं।
- संधित पाद या उपांग होते हैं।
- कठोर बहिःकंकाल पाया जाता है।
- बहिःकंकाल सुरक्षा देता और जल की हानि कम करता है।
- यह पेशियों को अवलंब देकर प्रभावी गति में सहायता करता है।
- बहिःकंकाल इन्हें शुष्क और अरक्षित पर्यावरण में जीवित रहने में सहायता करता है।
मोलस्का—कोमल काया के साथ अंग-तंत्र स्तर का संगठन उदाहरण: घोंघा, स्क्विड और ऑक्टोपस।

प्रमुख विशेषताएँ:
- शरीर कोमल होता है।
- अंग-तंत्र स्तर का संगठन पाया जाता है।
- कई मोलस्क में सुरक्षात्मक कवच होता है।
- शरीर में स्पष्ट सिर, पेशीय पाद और उभरा हुआ भाग पाया जाता है।
- अलग-अलग पर्यावरणों के अनुसार इनके मूल शरीर रूप में अनेक परिवर्तन मिलते हैं।
अध्याय नोट्स
एकाइनोडर्मेटा—पृष्ठरज्जु रहित आंतरिक अवलंबन
एकाइनो का अर्थ काँटेदार और डर्मा का अर्थ त्वचा है।
उदाहरण: स्टारफिश और समुद्री अर्चिन।
प्रमुख विशेषताएँ:
- केवल समुद्री पर्यावरण में पाए जाते हैं।
- कैल्सियम कार्बोनेट से बना कठोर अंतःकंकाल होता है।
- पृष्ठरज्जु अनुपस्थित होती है।
- अंतःकंकाल सुरक्षा और नियंत्रित गति में सहायता करता है।
- अपेक्षाकृत जटिल शरीर संगठन पाया जाता है।
अध्याय नोट्स
अकशेरुकी जीव—संक्षिप्त विवेचन
| समूह | संगठन का स्तर | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| पोरीफेरा | कोशिकीय | छिद्रयुक्त शरीर ; वास्तविक ऊतक अनुपस्थित |
| नाइडेरिया | ऊतक | स्पर्शक और एक शरीर - छिद्र |
| प्लैटीहेल्मिन्थीस | अंग | चपटा शरीर और द्विपार्श्व सममिति |
| नेमाटोडा | अंग - तंत्र | बेलनाकार शरीर ; मुख और गुदा |
| ऐनेलिडा | अंग - तंत्र | खंडीभवन और देहगुहा |
| आर्थ्रोपोडा | अंग - तंत्र | संधित उपांग और बहिःकंकाल |
| मोलस्का | अंग - तंत्र | कोमल शरीर ; कई में कवच |
| एकाइनोडर्मेटा | अंग - तंत्र | कैल्सियम कार्बोनेट का अंतःकंकाल |
स्पंज से एकाइनोडर्म तक शरीर संगठन की जटिलता बढ़ती दिखाई देती है। नई संरचनाएँ भोजन, गति और सुरक्षा को बेहतर बनाती हैं, परंतु उनके साथ नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं।
प्रोटोकॉर्डेट—पृष्ठरज्जु की उपस्थिति

उदाहरण: ऐम्फिऑक्सस।
प्रोटोकॉर्डेट में जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु उपस्थित होती है। यह संरचना:
- शरीर को आंतरिक अवलंब देती है।
- गति को सीमित नहीं करती।
- सरल अकशेरुकी रूपों से कशेरुकी जीवों की ओर परिवर्तन को समझने में सहायता करती है।
कशेरुकी—कशेरुक दंडयुक्त प्राणी

कशेरुकी प्राणियों में कशेरुक दंड या रीढ़ की हड्डी होती है।
इसके कार्य:
- शरीर को अवलंब देना।
- मस्तिष्क और मेरुरज्जु जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों की रक्षा करना।
- बड़े शरीर, प्रभावी गति और जटिल अंग-तंत्रों के विकास को संभव बनाना।
कशेरुकी जीव पाँच समूहों में विभाजित हैं:
- मत्स्य
- उभयचर
- सरीसृप
- पक्षी
- स्तनधारी
इनका वर्गीकरण पर्यावास, देहावरण और जनन के व्यापक प्रतिरूपों के आधार पर किया गया है।
अध्याय नोट्स
जैव विविधता एक सुरक्षा-कवच
- मैंग्रोव वनों ने 1999 के ओडिशा महाचक्रवात के प्रभाव को कम करने में सहायता की।
- पश्चिमी घाट की वन-विविधता क्यासानूर वन रोग जैसे किलनी-जनित रोगों के विरुद्ध जैविक अवरोधक का काम करती है।
- वन-मृदा के सूक्ष्मजीव प्रदूषकों का विघटन करके जल की गुणवत्ता सुधारते हैं।
- मैंग्रोव मृदा, तलछट और भारी धातुओं को रोककर समुद्र तथा नदियों में प्रदूषण फैलने से बचाते हैं।
अध्याय नोट्स
12.7 अनुकूलन—संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणाम
अनुकूलन ऐसी संरचनात्मक या प्रकार्यात्मक विशेषता है जो जीव को अपने पर्यावरण में जीवित रहने और जनन करने में सहायता करती है।
उदाहरण:
- मछलियों के पख और क्लोम तैरने तथा जल में श्वसन करने में सहायता करते हैं।
- पक्षियों के पंख और खोखली हड्डियाँ उड़ान में सहायक हैं।
- ऊँट में वसा का संचय शुष्क परिस्थितियों में उत्तरजीविता में सहायता करता है।
- ध्रुवीय भालू का मोटा फर अत्यधिक ठंड से सुरक्षा देता है।
- मादा स्तनधारियों की स्तन ग्रंथियाँ शिशुओं को पोषण देकर उनकी उत्तरजीविता बढ़ाती हैं।
वर्तमान प्राणी-विविधता लंबे समय से हुए संरचनात्मक परिवर्तनों और अलग-अलग पर्यावरणीय चुनौतियों का परिणाम है।
अध्याय नोट्स
12.7.1 वर्गीकरण की पदानुक्रमी प्रकृति
वर्गीकरण बड़े और व्यापक समूहों से छोटे एवं अधिक विशिष्ट समूहों की ओर बढ़ता है।
पदानुक्रम:
अध्याय नोट्स
जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति
नीचे की ओर जाने पर जीवों के बीच समानताएँ बढ़ती जाती हैं। प्रत्येक छोटा समूह अपने ऊपर वाले बड़े समूह का भाग होता है।
| स्तर | बाघ | मटर |
|---|---|---|
| जगत | एनिमेलिया | प्लांटी |
| संघ | कॉर्डेटा | मैग्नोलियोफाइटा |
| उपसंघ | वर्टिब्रेटा | — |
| वर्ग | मैमेलिया | मैग्नोलियोप्सिडा |
| गण | कार्निवोरा | फेबेलीस |
| कुल | फेलिडी | फेबेसी |
| वंश | Panthera | Pisum |
| जाति | Panthera tigris | Pisum sativum |
यह व्यवस्था घर के पते की तरह किसी जीव की सही पहचान और उसके संबंधों को समझने में सहायता करती है।
अध्याय नोट्स
12.8 वैज्ञानिक नामकरण—द्विनाम पद्धति
एक ही जीव के अलग-अलग भाषाओं में अलग नाम हो सकते हैं। इस भ्रम से बचने के लिए वैज्ञानिक एक सार्वभौमिक नामकरण प्रणाली का उपयोग करते हैं, जिसे द्विनाम पद्धति कहते हैं।
इसे 18वीं शताब्दी में कैरोलस लिनियस ने प्रस्तुत किया।
प्रत्येक वैज्ञानिक नाम के दो भाग होते हैं:
- वंश का नाम
- जाति का नाम
उदाहरण:
| सामान्य नाम | वैज्ञानिक नाम |
|---|---|
| बाघ | Panthera tigris |
| आम | Mangifera indica |
Panthera tigris और Panthera leo एक ही वंश Panthera में आते हैं। जाति समान जीवों के उस समूह को दर्शाती है जिसके सदस्य परस्पर जनन करके संतान उत्पन्न कर सकते हैं।
अध्याय नोट्स
आधुनिक तीन डोमेन पद्धति
डीएनए अध्ययनों से वैज्ञानिक जीवों के विकासात्मक संबंधों की अधिक सटीक तुलना कर सके। डीएनए में अधिक समानता सामान्य पूर्वज का संकेत देती है।
कार्ल वूस ने 1977 में तीन डोमेन प्रस्तावित किए:
- बैक्टीरिया
- आर्किया
- यूकैरिया
नई खोजों, सूक्ष्मदर्शियों, अभिरंजन तकनीकों और आनुवंशिक अध्ययनों के कारण वर्गीकरण प्रणालियाँ लगातार संशोधित होती रहती हैं। इससे विज्ञान की परिवर्तनशील और प्रमाण-आधारित प्रकृति स्पष्ट होती है।
वैज्ञानिक नाम लिखने के नियम प्रत्येक वैज्ञानिक नाम में वंश और जाति के दो भाग होते हैं।

- वंश का नाम पहले और जाति का नाम बाद में लिखा जाता है।
- वंश के नाम का पहला अक्षर अंग्रेजी के बड़े अक्षर में लिखा जाता है।
- जाति का नाम छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
- मुद्रित रूप में दोनों शब्द तिरछे अक्षरों में लिखे जाते हैं।
- हाथ से लिखते समय दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित किया जाता है।
- नाम लैटिन या लैटिनकृत रूप में लिखा जाता है।
अध्याय नोट्स
12.9 जीवाश्म—प्रमाण के रूप में
जीवाश्म पादपों और जंतुओं के परिरक्षित अवशेष होते हैं जो चट्टानों, रेत और मिट्टी की परतों में दबे मिलते हैं।
- पुरानी परतों में सामान्यतः अपेक्षाकृत सरल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं।
- नई परतों में अधिक जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं।
- जीवाश्म करोड़ों वर्षों में जीवन में हुए परिवर्तनों का प्राकृतिक अभिलेख हैं।
- भारत में डायनासोर, प्रारंभिक मानव और प्राचीन पौधों के अनेक जीवाश्म मिले हैं।
अध्याय नोट्स
बीरबल साहनी
बीरबल साहनी प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्होंने जीवाश्म पौधों का अध्ययन किया। उन्होंने लखनऊ में बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान की स्थापना की। उनके कार्यों ने आधुनिक पौधों और उनके पूर्वजों के संबंधों को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
अध्याय नोट्स
बैंगनी मेंढक
केरल में पाया जाने वाला बैंगनी मेंढक Nasikabatrachus sahyadrensis वर्ष के अधिकांश समय भूमिगत रहता है और मानसून में प्रजनन के लिए बाहर आता है। वर्ष 2003 में इसकी खोज ने प्राचीन उभयचर समूहों और पश्चिमी घाट के संरक्षण की आवश्यकता को समझने में सहायता की।
अध्याय नोट्स
12.10 जैव विविधता पर मंडराता खतरा
प्रत्येक जाति पारिस्थितिक तंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है:
- पादप भोजन और ऑक्सीजन बनाते हैं।
- जंतु परागण और बीज-प्रकीर्णन करते हैं।
- सूक्ष्मजीव पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
जैव विविधता के प्रमुख खतरे हैं:
- प्रदूषण
- वनों की कटाई
- संसाधनों का अत्यधिक उपयोग
- पर्यावासों का विनाश
- जलवायु परिवर्तन
एक जाति के विलुप्त होने पर उस पर निर्भर अन्य जातियों की संख्या भी कम हो सकती है और वे भी विलुप्त हो सकती हैं।
फुमडिस और संगाई हिरण

- फुमडिस लोकटक झील के तैरते घास के मैदान हैं।
- ये मणिपुर के केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान में पाए जाते हैं।
- ये मिट्टी, वनस्पतियों और जैविक पदार्थों की तैरती परतें हैं।
- इनकी मोटाई कुछ सेंटीमीटर से लगभग दो मीटर तक हो सकती है।
- यह पर्यावास संकटापन्न संगाई हिरण को आश्रय देता है।
- संगाई को नृत्य करने वाला हिरण भी कहा जाता है और यह मणिपुर की स्थानिक जाति है।
- इसे 1951 में विलुप्त घोषित किया गया था, परंतु 1953 में इसके विशिष्ट खुरों और लंबे पैरों के आधार पर पुनः खोजा गया।
- वर्तमान में यह IUCN की रेड डेटा सूची में शामिल है।
- फुमडिस का विनाश संगाई हिरण की जनसंख्या को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
अध्याय नोट्स
सारांश
- पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर जटिल पादपों और जंतुओं तक व्यापक जैव विविधता पाई जाती है।
- भारत विविध पर्यावासों और अनेक स्थानिक जातियों वाला जैव विविधता-समृद्ध देश है।
- जीवों का वर्गीकरण कोशिका संरचना, संगठन स्तर, पोषण, जनन, पारिस्थितिक भूमिका और आनुवंशिक समानता के आधार पर किया जाता है।
- व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली में मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया शामिल हैं।
- पादप जगत को थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में बाँटा गया है।
- पादपों में क्रमशः वास्तविक अंग, संवहनी ऊतक, बीज, जल-स्वतंत्र निषेचन, पुष्प और फल जैसी विशेषताएँ विकसित हुईं।
- जंतु पृष्ठरज्जु की उपस्थिति के आधार पर नॉन कॉर्डेटा और कॉर्डेटा में बाँटे जाते हैं।
- अकशेरुकी जंतुओं में पोरीफेरा से एकाइनोडर्मेटा तक शरीर संगठन के अलग-अलग स्तर दिखाई देते हैं।
- कशेरुकी जीवों में मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी शामिल हैं।
- वर्गीकरण का पदानुक्रम जगत से आरंभ होकर जाति तक जाता है।
- द्विनाम पद्धति प्रत्येक जीव को विश्वभर में मान्य वैज्ञानिक नाम प्रदान करती है।
- जीवाश्म पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और विकासात्मक परिवर्तनों के प्रमाण हैं।
- प्रदूषण, वनों की कटाई, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के प्रमुख खतरे हैं।
- जैव विविधता का संरक्षण पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन दोनों के लिए आवश्यक है।
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