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अध्याय 11: जनन – जीवन की निरंतरता

नीचे अध्याय के संपूर्ण नोट्स, सरल व्याख्या, महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ, गतिविधियाँ और पुनरावृत्ति बिंदु पढ़ें।

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कक्षा
9
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विज्ञान
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अन्वेषण
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Hindi
अध्याय 11 के संपूर्ण नोट्स एवं सारांश

इस पृष्ठ पर अध्याय के क्रमबद्ध नोट्स, व्याख्या, गतिविधियाँ और पुनरावृत्ति बिंदु दिए गए हैं।

अध्याय नोट्स

परिचय

प्रत्येक जीव का एक निश्चित जीवनकाल होता है। वह जन्म लेता है, वृद्धि करता है, परिपक्व होता है, जनन करता है और अंततः मर जाता है। किसी जीव की मृत्यु के बाद भी उसकी जाति का अस्तित्व जनन के कारण बना रहता है।

अध्याय 11 का चित्र 1

जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने समान नए जीव उत्पन्न करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक सूचना के स्थानांतरण को सुनिश्चित करता है।

जनन मुख्यतः दो प्रकार का होता है:

अध्याय 11 का चित्र 2
आधारअलैंगिक जननलैंगिक जनन
जनकों की संख्याएकसामान्यतः दो
युग्मकों का निर्माणनहीं होताहोता है
निषेचननहीं होतानर और मादा युग्मकों का निषेचन होता है
प्रमुख कोशिका विभाजनसमसूत्री विभाजनयुग्मक निर्माण में अर्धसूत्री विभाजन
संततिजनक के लगभग समानदोनों जनकों के लक्षणों का संयोजन
आनुवंशिक विविधताबहुत कमअधिक
प्रमुख लाभतेजी से संख्या बढ़नाबदलते परिवेश के प्रति अनुकूलन

अध्याय नोट्स

11.1 अलैंगिक जनन

अलैंगिक जनन में केवल एक जनक भाग लेता है और युग्मकों का संलयन नहीं होता। इससे उत्पन्न संतति सामान्यतः जनक के समान आनुवंशिक संरचना वाली होती है।

यह जनन अधिकांश एककोशिकीय जीवों, जैसे जीवाणु, अमीबा और यीस्ट, सरल बहुकोशिकीय जीवों, जैसे हाइड्रा और स्पंज, तथा अनेक पौधों में पाया जाता है।

अध्याय नोट्स

पौधों में प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के उदाहरण

  • आलू और अदरक जैसे गूदेदार भूमिगत तनों से नए पौधे निकलते हैं।
  • मनीप्लांट और गन्ने के तने की कर्तन से नया पौधा बनता है।
  • ब्रायोफिलम की पत्तियों के किनारों पर छोटे पादपक बनते हैं, जो नए पौधों में विकसित हो जाते हैं।

कायिक प्रवर्धन में पौधे के कायिक या वर्धनशील भागों—जड़, तना अथवा पत्ती—से नया पौधा उत्पन्न होता है।

अध्याय नोट्स

11.1.1 पौधों का कायिक प्रवर्धन कृषि में किस प्रकार उपयोगी है?

वैज्ञानिकों और बागवानी विशेषज्ञों ने प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन के आधार पर कर्तन, कलम बाँधना, परतन और ऊतक संवर्धन जैसी विधियाँ विकसित की हैं।

इनका कृषि में महत्त्व:

  • कम समय में बड़ी संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
  • वांछित गुणों वाले पौधों को उसी प्रकार बनाए रखा जा सकता है।
  • प्राप्त पौधे आनुवंशिक रूप से लगभग समान होते हैं।
  • बड़े स्तर पर एकसमान फसल उगाई जा सकती है।
  • ऊतक संवर्धन से बड़ी संख्या में स्वस्थ पादपक प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • विषाणु-संक्रमित पौधों को हटाकर अधिक उपज प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

आनुवंशिक विविधता कम होने के कारण ऐसे पौधों में किसी रोग के प्रति समान संवेदनशीलता भी हो सकती है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.1 — आइए, अन्वेषण करें

इस गतिविधि में माली या किसान द्वारा अपनाई जाने वाली कर्तन, कलम बाँधने और परतन की तकनीकों का अवलोकन किया जाता है।

कर्तन

अध्याय 11 का चित्र 5

कर्तन में पौधे के तने या शाखा का एक भाग काटकर मिट्टी में लगाया जाता है।

अध्याय नोट्स

विधि

  • स्वस्थ प्ररोह की कर्तन प्रातःकाल एकत्र की जाती है।
  • कर्तन के निचले आधे भाग की पत्तियाँ हटा दी जाती हैं।
  • उसे उसकी लगभग आधी लंबाई तक खाद मिली मिट्टी में 45°–60° के कोण पर लगाया जाता है।
  • नियमित रूप से पानी दिया जाता है।
  • कुछ समय बाद कर्तन से नई जड़ें और प्ररोह निकलते हैं।

उदाहरण: मनीप्लांट, गन्ना और गुलाब।

निष्कर्ष: तने के पर्वों और पर्वसंधियों से जड़ें तथा नई शाखाएँ निकलकर स्वतंत्र पौधा बना सकती हैं।

कलम बाँधना

अध्याय 11 का चित्र 6

कलम बाँधना वह विधि है जिसमें एक पौधे के तने के भाग को दूसरे पौधे के तने पर जोड़ दिया जाता है।

  • जिस पौधे की जड़ें बनी रहती हैं, उसे बद्धमूल पौधा या मूलवृंत कहा जाता है।
  • जो तने का भाग दूसरे पौधे पर लगाया जाता है, उसे कलम कहा जाता है।

अध्याय नोट्स

विधि

  • एक स्वस्थ बद्धमूल पौधा और वांछित किस्म की स्वस्थ कलम ली जाती है।
  • बद्धमूल की शाखा पर चीरा लगाया जाता है।
  • दूसरी किस्म की कलम को चीरे में स्थापित किया जाता है।
  • जोड़े गए स्थान को सूती कपड़े या रैपिंग फिल्म से ढक दिया जाता है।
  • बद्धमूल की अन्य शाखाएँ काटकर पौधे को नियमित जल दिया जाता है।

निष्कर्ष: इस तकनीक से दो पौधों के उपयोगी गुणों का लाभ एक ही पौधे में लिया जा सकता है। गुलाब और अनेक फलदार पौधों में इसका उपयोग किया जाता है।

अध्याय नोट्स

परतन

परतन में जनक पौधे की लचीली शाखा को उससे अलग किए बिना मिट्टी में दबाया जाता है।

अध्याय नोट्स

विधि

  • नींबू जैसे पौधे की पतली और लचीली टहनी चुनी जाती है।
  • टहनी के मध्य भाग को मिट्टी के नीचे दबाया जाता है।
  • नियमित रूप से पानी दिया जाता है।
  • लगभग 10–15 दिनों में दबे हुए भाग से जड़ें निकलने लगती हैं।
  • जड़ें विकसित होने के बाद शाखा को जनक पौधे से काट दिया जाता है।

निष्कर्ष: जड़युक्त शाखा स्वतंत्र पौधे के रूप में विकसित हो जाती है।

ऊतक संवर्धन

अध्याय 11 का चित्र 7

ऊतक संवर्धन में पौधे के किसी छोटे ऊतक, प्रायः प्ररोह शीर्ष या शीर्षस्थ विभज्योतक, को कृत्रिम पोषक माध्यम में उगाकर अनेक पादपक तैयार किए जाते हैं।

केले की खेती में इस तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे:

  • कम समय में अनेक पादपक बनते हैं।
  • एकसमान पौधे प्राप्त होते हैं।
  • स्वस्थ तथा विषाणुमुक्त पादपक तैयार किए जा सकते हैं।
  • अधिक उपज प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.2 — यीस्ट में मुकुलन

अध्याय नोट्स

विधि

  • परखनली में 20 mL शर्करा विलयन लिया जाता है।
  • इसमें एक चुटकी यीस्ट डालकर परखनली को रुई की डाट से बंद किया जाता है।
  • परखनली को गर्म स्थान पर रखा जाता है।
  • एक से दो घंटे बाद मिश्रण की एक बूँद स्लाइड पर लेकर सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है।

अध्याय नोट्स

अवलोकन

यीस्ट की जनक कोशिका पर छोटे गोलाकार उभार दिखाई देते हैं। इन्हें मुकुल कहते हैं।

अध्याय नोट्स

निष्कर्ष

यीस्ट में जनक कोशिका पर मुकुल बनता है। वह बढ़ता है और बाद में अलग होकर स्वतंत्र यीस्ट कोशिका बन जाता है। इस प्रक्रिया को मुकुलन कहते हैं।

अध्याय नोट्स

हाइड्रा में मुकुलन

हाइड्रा के शरीर के किसी विशेष स्थान पर बार-बार कोशिका विभाजन होने से एक छोटा उभार बनता है। यह उभार वृद्धि करके मुकुल बनता है और बाद में जनक हाइड्रा से अलग होकर स्वतंत्र जीव के रूप में रहने लगता है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.3 — ब्रेड पर कवक का बीजाणु निर्माण

अध्याय नोट्स

विधि

  • ब्रेड या रोटी के टुकड़े को थोड़ा नम किया जाता है।
  • उसे नम रुई और टिशू पेपर वाले डिब्बे में रखा जाता है।
  • डिब्बे को गर्म, नम और अँधेरे स्थान पर रखा जाता है।
  • लगभग तीन दिन बाद ब्रेड की सतह को आवर्धक लेंस से देखा जाता है।
  • थोड़ी-सी फफूँद को कॉटन ब्लू अभिरंजक के साथ स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है।

अध्याय नोट्स

अवलोकन

ब्रेड पर धागे जैसी कवक तंतु तथा गोलाकार थैलीनुमा संरचनाएँ दिखाई देती हैं। इनके भीतर अनेक छोटे बीजाणु होते हैं।

अध्याय नोट्स

निष्कर्ष

ब्रेड पर फफूँद वायु में पहले से उपस्थित बीजाणुओं के कारण उगती है। अनुकूल नमी, ताप और पोषक पदार्थ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर नए कवक बनाते हैं।

राइजोपस में बीजाणु थैली जैसी संरचना में बनते हैं, जबकि ऐस्पर्जिलस में वे कवक तंतु के फूले हुए सिरे पर बनते हैं।

बीजाणुओं की विशेषताएँ:

  • वे बहुत बड़ी संख्या में बनते हैं।
  • सामान्यतः एककोशिकीय और हल्के होते हैं।
  • वायु द्वारा दूर तक फैल सकते हैं।
  • नमी और पोषक पदार्थ मिलने पर तेजी से अंकुरित होते हैं।

लुई पाश्चर के प्रयोगों ने सिद्ध किया कि नया जीवन पहले से विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है।

अध्याय नोट्स

अलैंगिक जनन और समसूत्री विभाजन

अलैंगिक जनन की मुख्य कोशिकीय प्रक्रिया समसूत्री विभाजन है। इसमें बनने वाली दोनों संतति कोशिकाओं में जनक कोशिका के समान गुणसूत्र संख्या होती है। इसलिए आनुवंशिक रूप से समान संततियों को क्लोन कहा जाता है।

अध्याय नोट्स

11.2 लैंगिक जनन

लैंगिक जनन में नए जीव के निर्माण में दो जनकों का आनुवंशिक योगदान होता है। इसमें नर और मादा युग्मकों का संलयन होता है।

यदि दोनों जनक अपने सभी गुणसूत्र संतति को दे दें, तो प्रत्येक पीढ़ी में गुणसूत्रों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। इस समस्या का समाधान अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है, जिसमें युग्मकों की गुणसूत्र संख्या आधी हो जाती है।

अध्याय नोट्स

11.2.1 लैंगिक जनन में अर्धसूत्री विभाजन किस प्रकार विभिन्नताएँ उत्पन्न करता है?

गुणसूत्र केंद्रक में उपस्थित धागे जैसी संरचनाएँ हैं, जो आनुवंशिक सूचना वहन करती हैं।

मानव की सामान्य शरीर कोशिकाओं में:

  • गुणसूत्रों के 23 जोड़े होते हैं।
  • कुल गुणसूत्र संख्या 46 होती है।
  • प्रत्येक जोड़े का एक गुणसूत्र माता और दूसरा पिता से मिलता है।

अध्याय नोट्स

अर्धसूत्री विभाजन

अर्धसूत्री विभाजन वह विशेष कोशिका विभाजन है जिसमें द्विगुणित जनक कोशिका से अगुणित जनन कोशिकाएँ बनती हैं। इन जनन कोशिकाओं को युग्मक कहते हैं।

  • मानव की शरीर कोशिकाएँ: 46 गुणसूत्र
  • मानव के शुक्राणु और अंडाणु: 23 गुणसूत्र
  • निषेचन के बाद युग्मनज: 46 गुणसूत्र

अर्धसूत्री विभाजन के समय गुणसूत्रों का पृथक्करण और यादृच्छिक वितरण होता है। इससे प्रत्येक युग्मक में आनुवंशिक लक्षणों का अलग संयोजन पहुँच सकता है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.4 — मनकों से विभिन्नता को समझना

तीन जोड़ी अलग-अलग रंगों के मनके तीन गुणसूत्र जोड़ियों तथा विभिन्न लक्षणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक जोड़ी से एक मनका यादृच्छिक रूप से चुनने पर केवल तीन जोड़ियों से ही आठ अलग-अलग संयोजन बन सकते हैं।

मनुष्यों में 23 गुणसूत्र जोड़ियाँ होने के कारण अत्यधिक संख्या में आनुवंशिक संयोजन संभव हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने माता-पिता तथा भाई-बहनों से आनुवंशिक रूप से कुछ अलग होता है।

अध्याय नोट्स

विभिन्नता का महत्त्व

  • बदलते परिवेश में कुछ जीवों को बेहतर अनुकूलन मिलता है।
  • जाति की उत्तरजीविता की संभावना बढ़ती है।
  • लंबे समय में विभिन्नताएँ जैव-विकास में योगदान करती हैं।
  • कुछ व्यक्ति कम ऑक्सीजन वाले ऊँचे क्षेत्रों को बेहतर सहन कर सकते हैं।
  • कुछ व्यक्ति वयस्क होने के बाद भी दूध पचा सकते हैं।

अध्याय नोट्स

11.2.2 पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन

पुष्पी पादपों को आवृतबीजी भी कहा जाता है। इनमें पुष्प जनन अंग के रूप में कार्य करता है।

अध्याय नोट्स

पुष्प के चार मुख्य भाग

पुष्पीय भागसंरचना एवं कार्य
बाह्यदलसबसे बाहरी , प्रायः हरे भाग ; कली की रक्षा करते हैं
दलरंगीन और कभी - कभी सुगंधित ; परागणकारियों को आकर्षित करते हैं
पुंकेसरपुष्प का नर भाग ; तंतु और परागकोश से बना होता है
स्त्रीकेसरपुष्प का मादा भाग ; वर्तिकाग्र , वर्तिका और अंडाशय से बना होता है

अध्याय नोट्स

पुंकेसर

पुंकेसर में:

अध्याय 11 का चित्र 12
  • तंतु परागकोश को सहारा देता है।
  • परागकोश परागकण उत्पन्न करता है।
  • परागकणों में नर युग्मक होते हैं।

अध्याय नोट्स

स्त्रीकेसर

स्त्रीकेसर के तीन भाग होते हैं:

  • वर्तिकाग्र: शीर्ष पर स्थित सपाट या चिपचिपी संरचना, जो परागकण ग्रहण करती है।
  • वर्तिका: पतली नली, जो वर्तिकाग्र को अंडाशय से जोड़ती है।
  • अंडाशय: इसमें बीजांड होते हैं।
  • प्रत्येक बीजांड में एक अंड कोशिका या मादा युग्मक होता है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.5 — पुष्प के भागों का अध्ययन

विभिन्न पुष्पों को एकत्र कर उनके बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर का अवलोकन किया जाता है। अंडाशय की अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य काट देखकर उसके भीतर बीजांड पहचाने जाते हैं।

निष्कर्ष: सभी पुष्पों में चारों भाग होना आवश्यक नहीं है, परंतु एक संपूर्ण पुष्प में बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर उपस्थित होते हैं।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.6 — परागण और फल निर्माण की जाँच

मटर की पुष्पकलियों तथा खुले पुष्पों पर निम्न प्रयोग किया जाता है:

  • कुछ पुष्पकलियों और पुष्पों से पुंकेसर हटा दिए जाते हैं।
  • कुछ को मलमल की थैलियों से ढक दिया जाता है।
  • कुछ पुष्प बिना थैली के खुले छोड़े जाते हैं।
  • बाद में उनमें फल निर्माण का अवलोकन किया जाता है।

जिस पुष्पकली से पुंकेसर हटाकर उसे थैली में बंद कर दिया जाता है, उसमें फल नहीं बनता। अन्य स्थितियों में परागण होने पर फल बन सकता है।

निष्कर्ष: फल निर्माण के लिए परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का पहुँचना आवश्यक है।

अध्याय नोट्स

11.2.3 पुष्पों में परागण की प्रक्रिया किस प्रकार होती है?

परागण परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण की प्रक्रिया है।

स्व-परागण

अध्याय 11 का चित्र 13

जब परागकण:

  • उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर, या
  • उसी पौधे के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं,

तो इसे स्व-परागण कहते हैं।

अध्याय नोट्स

पर-परागण

जब एक पौधे के पुष्प से परागकण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं, तो इसे पर-परागण कहते हैं।

परागण न होने पर नर युग्मक बीजांड तक नहीं पहुँच पाएगा। इसलिए निषेचन, बीज और फल निर्माण नहीं हो सकेगा।

अध्याय नोट्स

11.2.4 परागण की युक्तियाँ और जननीय सफलता

परागण में सहायता करने वाले माध्यमों को परागणकारी माध्यम कहा जाता है। इनमें वायु, जल, कीट और पक्षी सम्मिलित हैं।

परागण का माध्यमउदाहरणप्रमुख अनुकूलन
वायुगेहूँ , मक्का , चावलछोटे और हल्के परागकण ; बहुत बड़ी संख्या ; लंबा व पंखनुमा वर्तिकाग्र
जलवैलिसनेरिया , हाइड्रिलाजलधाराएँ परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक ले जाती हैं
कीटसूरजमुखी , गुड़हल , गेंदाचमकीले रंग , सुगंध , मकरंद ; बड़े , चिपचिपे या काँटेदार परागकण
पक्षीकोरल ट्री , गुड़हलपक्षियों को आकर्षित करने वाले पुष्प तथा मकरंद

कीट-परागित पुष्पों का वर्तिकाग्र भी चिपचिपा होता है, जिससे वह कीटों द्वारा लाए गए परागकण ग्रहण कर सके।

अध्याय 11 का चित्र 14

अध्याय नोट्स

11.2.5 निषेचन एवं बीज निर्माण

संगत परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद वह अंकुरित होकर पराग नलिका बनाता है। यह नलिका वर्तिका से होते हुए अंडाशय और बीजांड तक पहुँचती है।

अध्याय 11 का चित्र 15

नर युग्मक पराग नलिका से होकर बीजांड में पहुँचता है और अंड कोशिका से संलयित होता है।

अध्याय नोट्स

नर युग्मक + अंड कोशिका → युग्मनज

युग्मकों के संलयन को निषेचन कहते हैं। निषेचित अंडाणु को युग्मनज कहा जाता है।

निषेचन के बाद:

  • युग्मनज → भ्रूण
  • बीजांड → बीज
  • अंडाशय → फल

बीजों का प्रकीर्णन वायु, जल और जंतुओं द्वारा होता है। उचित जल, वायु और तापमान मिलने पर बीज अंकुरित होकर नया पौधा बनाता है।

अध्याय नोट्स

क्रियाकलाप 11.7 — परागण की सफलता का विश्लेषण

परागण युक्तिप्रति पुष्प परागकणों की अनुमानित संख्याबीजों की औसत संख्या
वायु - परागित घास , जैसे मक्का और गेहूँ5,00,000–10,00,00050–200
कीट - परागित पौधे , जैसे सूरजमुखी20,000–40,000800–1,000

अध्याय नोट्स

विश्लेषण

  • वायु-परागित पौधों में लगभग 2,500–20,000 परागकणों पर एक बीज बन सकता है।
  • कीट-परागित पौधों में लगभग 20–50 परागकणों पर एक बीज बन सकता है।
  • इसलिए कीट-परागण अपेक्षाकृत अधिक लक्षित और प्रभावी है।
  • वायु द्वारा बिखेरे गए अधिकांश परागकण वर्तिकाग्र तक नहीं पहुँचते।
  • अत्यधिक संख्या में परागकण बनाना इस क्षति की पूर्ति करता है और सफल परागण की संभावना बढ़ाता है।

अध्याय नोट्स

11.3 जंतुओं में लैंगिक जनन

जंतुओं में लैंगिक जनन के दौरान नर और मादा युग्मकों का संलयन होता है। निषेचन दो प्रकार से हो सकता है।

बाह्य निषेचन

अध्याय 11 का चित्र 17

जब निषेचन मादा के शरीर के बाहर होता है, तो इसे बाह्य निषेचन कहते हैं।

उदाहरण: मेंढक और अधिकांश मछलियाँ।

मादा जल में अंडे छोड़ती है और नर उन पर शुक्राणु छोड़ता है। बहुत-से अंडे बह जाते हैं या दूसरे जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं। इसलिए इन जंतुओं में बहुत अधिक अंडे उत्पन्न होते हैं।

अध्याय नोट्स

आंतरिक निषेचन

जब निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।

उदाहरण: सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी।

इसमें युग्मक, निषेचित अंडे और भ्रूण अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहते हैं। इसलिए संतति की उत्तरजीविता अधिक होती है।

अध्याय नोट्स

11.4 जंतुओं में जनन संबंधी विभिन्नताएँ

जंतुपर्यावासनिषेचनअंडों की संख्यासंतति की उत्तरजीविता
मछलीजलबाह्य100–1,000 तककम
मेंढकजल / भूमिबाह्य5,000–50,000 तककम
छिपकलीभूमिआंतरिक2–20 तकमध्यम
पक्षीजल / भूमिआंतरिक1–15 तकमध्यम से उच्च

अध्याय नोट्स

विकास की विभिन्न विधियाँ

  • मछलियों, उभयचरों और अनेक कीटों के अंडों में सीमित पीतक होता है।
  • अंडे से लार्वा निकलता है, जो भोजन ग्रहण करके वृद्धि करता है।
  • लार्वा बाद में रूपांतरण द्वारा वयस्क बनता है।
  • तितली का जीवन-चक्र: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क।
अध्याय 11 का चित्र 18
  • सरीसृपों और पक्षियों के अंडों में भ्रूण के विकास के लिए पर्याप्त पीतक होता है।
  • स्तनधारियों में युग्मनज मादा के शरीर के भीतर विकसित होता है।
  • कुछ जंतुओं की संतति जन्म के तुरंत बाद चलने और भोजन खोजने में सक्षम होती है।
  • मानव शिशु लंबे समय तक माता-पिता की देखभाल पर निर्भर रहता है।
  • स्तनधारी अपने बच्चों को जन्म के बाद स्तनपान कराते हैं।

अध्याय नोट्स

11.5 मानव में जनन

मानव में आंतरिक निषेचन होता है। शुक्राणु और अंडाणु के संलयन से युग्मनज बनता है। युग्मनज भ्रूण और बाद में गर्भस्थ शिशु में विकसित होता है।

अध्याय नोट्स

11.5.1 जनन परिपक्वता

बच्चे के वयस्क होने के दौरान शरीर में शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं। जनन अंग परिपक्व होकर युग्मक उत्पन्न करने लगते हैं:

  • लड़कों में शुक्राणु
  • लड़कियों में अंडाणु

इस अवस्था को यौवनारंभ या जनन परिपक्वता का आरंभ कहा जाता है।

अध्याय नोट्स

11.5.2 नर जनन तंत्र में कौन-कौन से अंग हैं?

नर जनन तंत्र के मुख्य अंग हैं:

अध्याय नोट्स

वृषण

  • दो अंडाकार अंग होते हैं।
  • इनमें शुक्राणु बनते हैं।
अध्याय 11 का चित्र 19
  • ये नर हार्मोन भी उत्पन्न करते हैं।
  • हार्मोन यौवनारंभ के शारीरिक परिवर्तनों और शुक्राणु उत्पादन को नियंत्रित करते हैं।

अध्याय नोट्स

वृषणकोश

  • त्वचा की थैली है जिसमें वृषण स्थित होते हैं।
  • यह वृषणों को शरीर के सामान्य तापमान से थोड़ा ठंडा रखता है।
  • कम तापमान शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है।

अध्याय नोट्स

शुक्रवाहिनी

यह लंबी नली वृषण से शुक्राणुओं को मूत्रमार्ग तक ले जाती है।

अध्याय नोट्स

शुक्राशय और प्रोस्टेट ग्रंथि

इन ग्रंथियों का तरल स्राव:

  • शुक्राणुओं को पोषण देता है।
अध्याय 11 का चित्र 20
  • उन्हें सक्रिय और गतिशील बनाए रखता है।

अध्याय नोट्स

मूत्रमार्ग और शिश्न

मूत्रमार्ग मूत्र तथा शुक्राणुयुक्त द्रव के बाहर निकलने का मार्ग है। यह शिश्न से होकर गुजरता है।

अध्याय नोट्स

शुक्राणु की संरचना

  • शीर्ष: आनुवंशिक पदार्थ रखता है।
  • पूँछ: शुक्राणु को अंडाणु की ओर तैरने में सहायता करती है।

अध्याय नोट्स

11.5.3 मादा जनन तंत्र के अंग कौन-कौन से हैं?

मादा जनन तंत्र में निम्न अंग होते हैं:

अध्याय 11 का चित्र 21

अध्याय नोट्स

अंडाशय

  • एक जोड़ी अंडाशय होते हैं।
  • इनमें अंडाणु बनते हैं।
  • ये मादा हार्मोन स्रावित करते हैं।

अध्याय नोट्स

डिंबवाहिनी या अंडवाहिनी

प्रत्येक अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। सामान्यतः अंडाणु और शुक्राणु का संलयन इसी नलिका में होता है।

अध्याय नोट्स

गर्भाशय

  • पेशीय, थैले जैसी संरचना है।
  • इसमें भ्रूण का आरोपण और विकास होता है।

अध्याय नोट्स

गर्भाशय ग्रीवा

यह संकरा भाग गर्भाशय को योनि से जोड़ता है।

अध्याय नोट्स

योनि

यह गर्भाशय ग्रीवा से बाहर तक जाने वाला पेशीय मार्ग है। इसे जन्म मार्ग भी कहा जाता है।

अध्याय नोट्स

11.5.4 जनन कोशिकाएँ कैसे बनती हैं?

युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं। यह वृषणों और अंडाशयों में होता है।

युग्मक अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बनते हैं। इस कारण उनकी गुणसूत्र संख्या शरीर कोशिकाओं की तुलना में आधी होती है।

अध्याय 11 का चित्र 22
विशेषताशुक्राणुअंडाणु
आकारअत्यंत सूक्ष्मबड़ा
उत्पादित संख्यालाखोंकम
संग्रहीत पोषक पदार्थअनुपस्थितउपस्थित
गतिशीलतासक्रिय रूप से गतिशीलअचल
गुणसूत्र संख्या2323

निषेचन के समय दोनों युग्मकों के मिलने से युग्मनज में पुनः 46 गुणसूत्र हो जाते हैं।

अध्याय नोट्स

11.5.5 जब एक शुक्राणु एक अंडाणु से युग्मित होता है तब क्या होता है?

जन्म के समय लड़की के अंडाशयों में लाखों अपरिपक्व अंडाणु होते हैं। यौवनारंभ के बाद सामान्यतः प्रत्येक माह किसी एक अंडाशय से एक परिपक्व अंडाणु निकलता है। इसे अंडोत्सर्ग कहते हैं।

अध्याय नोट्स

निषेचन और आरोपण का क्रम

  • अंडोत्सर्ग से पहले गर्भाशय का आंतरिक अस्तर मोटा होने लगता है।
  • अंडाणु अंडाशय से निकलकर डिंबवाहिनी में पहुँचता है।
  • मैथुन के समय लाखों शुक्राणु योनि में प्रवेश करते हैं।
  • शुक्राणु जनन मार्ग से होते हुए डिंबवाहिनी तक पहुँचते हैं।
  • एक शुक्राणु अंडाणु से युग्मित होकर युग्मनज बनाता है।
  • गर्भाशय की ओर जाते समय युग्मनज में अनेक समसूत्री विभाजन होते हैं।
  • विकसित हो रही कोशिकीय संरचना गर्भाशय के मोटे अस्तर में स्थापित हो जाती है।
  • इस प्रक्रिया को आरोपण कहते हैं और यहीं से गर्भावस्था आरंभ होती है।

अध्याय नोट्स

11.5.6 यदि अंडाणु निषेचित न हो तो क्या होता है?

यदि अंडाणु का निषेचन नहीं होता, तो वह लगभग एक दिन तक जीवनक्षम रहता है और बाद में नष्ट हो जाता है। अब मोटे तथा रक्त वाहिकाओं से समृद्ध गर्भाशय अस्तर की आवश्यकता नहीं रहती।

यह अस्तर कुछ रक्त के साथ योनि द्वारा शरीर से बाहर निकलता है। इस प्रक्रिया को रजोधर्म, मासिक धर्म या माहवारी कहते हैं। यह सामान्यतः 3–7 दिनों तक चलती है।

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अध्याय नोट्स

प्रारूपिक 28 दिन का मासिक चक्र

अवधिप्रमुख घटना
दिन 1–5मासिक धर्म ; गर्भाशय अस्तर का निस्तारण
दिन 6–14गर्भाशय अस्तर का पुनर्निर्माण और अंडाणु का परिपक्व होना
लगभग दिन 14अंडोत्सर्ग
दिन 15–28गर्भाशय अस्तर और मोटा तथा रक्त वाहिकाओं से समृद्ध होता है
निषेचन न होने परअस्तर विघटित होता है और नया चक्र आरंभ होता है

मासिक चक्र सामान्यतः 21–35 दिनों का हो सकता है। 28 दिन केवल एक प्रारूपिक अवधि है। इसलिए प्रत्येक लड़की में अंडोत्सर्ग हमेशा ठीक 14वें दिन हो, यह आवश्यक नहीं है।

मासिक धर्म सामान्यतः 10–14 वर्ष की आयु के बीच आरंभ होता है और लगभग 50 वर्ष की आयु में रजोनिवृत्ति तक जारी रह सकता है।

जिज्ञासा-सूत्र — शिशु का जैविक लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है?

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मनुष्यों में:

  • मादा के लिंग गुणसूत्र: XX
  • नर के लिंग गुणसूत्र: XY

माँ का अंडाणु हमेशा X गुणसूत्र देता है। पिता के शुक्राणु में X या Y गुणसूत्र हो सकता है।

  • X अंडाणु + X शुक्राणु → XX
  • X अंडाणु + Y शुक्राणु → XY

अतः शिशु का गुणसूत्रीय जैविक लिंग पिता से प्राप्त होने वाले X अथवा Y गुणसूत्र वाले शुक्राणु पर निर्भर करता है। इसके लिए माँ को उत्तरदायी ठहराना वैज्ञानिक रूप से गलत है।

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विज्ञान एवं समाज — मासिक धर्म के समय अपनाने योग्य स्वच्छता प्रथाएँ

  • सैनिटरी पैड, टैम्पन या मेंस्ट्रुअल कप जैसे उपयुक्त मासिक धर्म उत्पादों का उपयोग करें।
  • जननांग क्षेत्र को स्वच्छ जल से साफ रखें। साबुन का अत्यधिक उपयोग प्राकृतिक जीवाणु संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
  • उत्पाद बदलने से पहले और बाद में साबुन तथा जल से हाथ धोएँ।
  • उपयोग किए गए पैड को आवरण या अखबार में लपेटकर डस्टबिन में डालें।
  • पैड को शौचालय में न बहाएँ।
  • पुनः प्रयोज्य पैड को निर्माता के निर्देशानुसार साफ करें और दोबारा उपयोग से पहले पूरी तरह सुखाएँ।
  • पैड को सामान्यतः प्रत्येक 4–6 घंटे में बदलें। अधिक रक्त प्रवाह होने पर इसे जल्दी बदलें।
  • मासिक धर्म लज्जा का विषय नहीं, बल्कि स्वस्थ जनन तंत्र की एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है।

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11.5.7 गर्भावस्था और प्रसव

मानव गर्भावस्था सामान्यतः लगभग नौ महीने चलती है। इसे तीन त्रिमासों में विभाजित किया जाता है।

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पहला त्रिमास

  • निषेचित अंडाणु भ्रूण में विकसित होता है।
  • शुरुआती दो महीनों में प्रमुख अंगों का निर्माण आरंभ होता है।
  • लगभग नौवें सप्ताह से विकसित होते भ्रूण को गर्भ या फीटस कहा जाता है।

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दूसरा त्रिमास

  • गर्भ आकार में बड़ा और अधिक स्पष्ट होता है।
  • माँ सामान्यतः शिशु की गतिविधियों को अनुभव कर सकती है।

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तीसरा त्रिमास

  • शिशु तेजी से बढ़ता है।
  • उसके अंग गर्भाशय के बाहर जीवन के लिए तैयार होते हैं।

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प्रसव

प्रसव के समय गर्भाशय की मांसपेशियों में तीव्र संकुचन होते हैं। ये गर्भस्थ शिशु को जन्म मार्ग से बाहर निकालने में सहायता करते हैं। यदि सामान्य प्रसव माँ या शिशु के लिए सुरक्षित न हो, तो चिकित्सक आवश्यक चिकित्सीय या शल्य प्रक्रिया का उपयोग कर सकते हैं।

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जन्म के बाद देखभाल

  • स्तनपान शिशु को संपूर्ण पोषण और रोगों से सुरक्षा देता है।
  • नवजात के शरीर का उचित तापमान बनाए रखना चाहिए।
  • टीकाकरण समय पर कराया जाना चाहिए।
  • शिशु को सावधानी से संभालना चाहिए।
  • माँ को पौष्टिक भोजन और पर्याप्त विश्राम मिलना चाहिए।
  • धूम्रपान, मद्यपान और बिना चिकित्सीय सलाह के औषधि लेने से बचना चाहिए।

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11.5.8 गर्भावस्था के दौरान माँ का स्वास्थ्य

माँ का स्वास्थ्य शिशु की वृद्धि और सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है। गर्भवती महिला को:

  • प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर संतुलित आहार लेना चाहिए।
  • नियमित चिकित्सीय जाँच करानी चाहिए।
  • चिकित्सक की सलाह से हल्का व्यायाम करना चाहिए।
  • पर्याप्त विश्राम करना चाहिए।
  • धूम्रपान, मद्यपान और हानिकारक पदार्थों से बचना चाहिए।
  • बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई औषधि नहीं लेनी चाहिए।
  • परिवार से भावनात्मक सहयोग मिलना चाहिए।

कुछ माताओं को शिशु के जन्म के बाद उदासी, बेचैनी, थकान या व्यग्रता का अनुभव हो सकता है। इसे प्रसवोत्तर अवसाद कहा जाता है। यह उपचार योग्य स्थिति है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर, नर्स या आशा कार्यकर्ता से सहायता लेनी चाहिए।

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11.5.9 लैंगिक परिपक्वता से क्या अभिप्राय है?

लैंगिक परिपक्वता का अर्थ है कि शरीर जनन करने योग्य बन रहा है। इसके संकेत हैं:

  • लड़कों में शुक्राणु उत्पादन आरंभ होना।
  • लड़कियों में मासिक धर्म आरंभ होना।
  • जनन अंगों और द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास।

लैंगिक परिपक्वता का अर्थ यह नहीं है कि किशोर वयस्क जीवन के सभी उत्तरदायित्वों के लिए तैयार हो गया है। भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता विकसित होने में अधिक समय लगता है।

भावनात्मक परिपक्वता में:

  • भावनाओं पर नियंत्रण,
  • स्पष्ट संवाद,
  • दूसरों का सम्मान,
  • परिणामों को समझना,
  • सुविचारित और उत्तरदायी निर्णय लेना सम्मिलित है।

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11.5.10 अवांछित गर्भावस्था और संक्रमण को किस प्रकार रोका जा सकता है?

यौन क्रिया द्वारा कुछ संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुँच सकते हैं। इन्हें यौन संचारित संक्रमण (STIs) कहा जाता है।

प्रमुख उदाहरण:

  • सुजाक
  • हर्पीज
  • सिफिलिस
  • जननिक मस्से
  • एचआईवी संक्रमण, जिससे आगे चलकर एड्स हो सकता है

कंडोम यौन संचारित संक्रमणों के प्रसार के जोखिम को कम करता है और गर्भावस्था रोकने में भी सहायता करता है।

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गर्भनिरोधक विधियाँ

विधिकार्य
कंडोम या योनि आवरणशुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुँचने से रोकते हैं
गर्भनिरोधक गोलियाँहार्मोन में परिवर्तन करके अंडोत्सर्ग को प्रभावित करती हैं
कॉपर -T जैसी अंतर्गर्भाशयी युक्तिगर्भाशय में रखी जाकर गर्भधारण रोकती है
शल्य विधियाँपुरुष में शुक्रवाहिनी या महिला में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध किया जाता है

गर्भनिरोधक गोलियाँ और कॉपर-T गर्भधारण को रोक सकते हैं, लेकिन वे यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा नहीं देते। संक्रमणों से सुरक्षा के लिए कंडोम का उपयोग महत्त्वपूर्ण है।

अवांछित गर्भावस्था की स्थिति में केवल योग्य चिकित्सक की देखरेख में कानूनी और सुरक्षित चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। लिंग के आधार पर गर्भपात से समाज में लिंगानुपात असंतुलित होता है। अध्याय के अनुसार भारत में प्रसव-पूर्व लिंग का पता लगाना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

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अध्याय का सारांश

  • जनन नए जीवों के निर्माण की जैविक प्रक्रिया है, जो जीवन की निरंतरता बनाए रखती है।
  • जनन दो प्रकार का है—अलैंगिक और लैंगिक।
  • अलैंगिक जनन में एक जनक भाग लेता है और आनुवंशिक रूप से समान संतति बनती है।
  • मुकुलन, बीजाणु निर्माण और कायिक प्रवर्धन अलैंगिक जनन की प्रमुख विधियाँ हैं।
  • पौधों में कर्तन, कलम बाँधना, परतन और ऊतक संवर्धन द्वारा तेजी से वांछित पौधे तैयार किए जाते हैं।
  • लैंगिक जनन में नर और मादा युग्मकों के संलयन से युग्मनज बनता है।
  • अर्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित युग्मक बनते हैं और आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • पुष्प आवृतबीजी पौधों का जनन अंग है। इसके प्रमुख भाग बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर हैं।
  • परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण परागण कहलाता है।
  • परागण स्व-परागण या पर-परागण हो सकता है तथा वायु, जल, कीट और पक्षी इसके माध्यम बन सकते हैं।
  • निषेचन के बाद युग्मनज भ्रूण, बीजांड बीज और अंडाशय फल में विकसित होता है।
  • जंतुओं में बाह्य या आंतरिक निषेचन हो सकता है।
  • बाह्य निषेचन वाले जीव अधिक अंडे उत्पन्न करते हैं, पर उनकी संतति की उत्तरजीविता कम होती है।
  • मानव के नर जनन तंत्र में वृषण शुक्राणु उत्पन्न करते हैं, जबकि मादा जनन तंत्र में अंडाशय अंडाणु बनाते हैं।
  • निषेचन डिंबवाहिनी में होता है और विकसित संरचना गर्भाशय के अस्तर में आरोपित होती है।
  • निषेचन न होने पर गर्भाशय अस्तर का निस्तारण मासिक धर्म के रूप में होता है।
  • मानव गर्भावस्था लगभग नौ महीने की होती है और इसे तीन त्रिमासों में बाँटा जाता है।
  • गर्भावस्था में संतुलित आहार, चिकित्सीय जाँच, विश्राम और भावनात्मक सहयोग आवश्यक हैं।
  • लैंगिक परिपक्वता और भावनात्मक परिपक्वता अलग-अलग हैं।
  • कंडोम गर्भावस्था के साथ यौन संचारित संक्रमणों के जोखिम को कम करने में भी सहायता करता है।
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