इस पृष्ठ पर अध्याय के क्रमबद्ध नोट्स, व्याख्या, गतिविधियाँ और पुनरावृत्ति बिंदु दिए गए हैं।
अध्याय नोट्स
परिचय
प्रकृति में भारी खगोलीय वस्तुओं से लेकर अवपरमाणुक कणों तक सब कुछ गतिमान है। तितलियों का उड़ना, साँप का रेंगना, समुद्र में ज्वार-भाटा, बादलों का घूमना और वाहनों का चलना गति के उदाहरण हैं।
जटिल गतियों को समझने के लिए वैज्ञानिक पहले उनके सरल, आदर्श रूपों का अध्ययन करते हैं। गति के तीन सामान्य प्रकार हैं—रेखीय गति, वृत्तीय गति और दोलनी गति। इस अध्याय में मुख्य रूप से सरल रेखीय गति और एकसमान वृत्तीय गति का अध्ययन किया गया है।
गति का वर्णन निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है—
- शब्दों द्वारा
- संख्याओं द्वारा
- समीकरणों द्वारा
- आलेख या ग्राफ द्वारा
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4.1 सरल रेखा में गति
जब कोई वस्तु किसी सरल रेखा के अनुदिश चलती है, तो उसकी गति सरल रेखीय गति कहलाती है। यह गति का सबसे सरल प्रकार है और इसे एकविमीय गति भी कहा जाता है।
इसके उदाहरण हैं—
- सीधे तरण-ताल में तैरता हुआ तैराक
- ऊर्ध्वाधर रूप से गिरती हुई गेंद
- सीधे राजमार्ग पर चलती कार
- सीधी पटरी पर चलती रेलगाड़ी
किसी वस्तु की गति का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग क्षणों पर उसकी स्थिति ज्ञात करना आवश्यक है।
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4.1.1 स्थिति का वर्णन करना
किसी वस्तु की स्थिति बताने के लिए सबसे पहले एक नियत बिंदु चुना जाता है, जिसे संदर्भ बिंदु कहते हैं।
किसी क्षण पर संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की दूरी और दिशा उस वस्तु की स्थिति बताती हैं।
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गति और विरामावस्था
- यदि संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की स्थिति समय के साथ बदलती है, तो वस्तु गतिशील है।
- यदि संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की स्थिति समय के साथ नहीं बदलती, तो वस्तु विरामावस्था में है।
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मूल बिंदु और दिशा
सरल रेखा पर संदर्भ बिंदु को प्रायः मूल बिंदु Oमाना जाता है।
- मूल बिंदु के दाहिनी ओर की स्थितियाँ सामान्यतः धनात्मक (+) मानी जाती हैं।
- मूल बिंदु के बाईं ओर की स्थितियाँ सामान्यतः ऋणात्मक (–) मानी जाती हैं।
मूल बिंदु और धनात्मक दिशा का चुनाव सुविधा के अनुसार किया जा सकता है, परंतु प्रश्न हल करते समय चुनी गई दिशा को बदलना नहीं चाहिए।
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समय का क्षण और समय अंतराल
- समय का क्षण घड़ी का किसी निश्चित समय पर पाठ्यांक है।
- समय अंतराल समय के दो क्षणों के बीच की अवधि है।
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4.1.2 चलित दूरी और विस्थापन
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चलित दूरी
किसी वस्तु द्वारा अपने पूरे पथ पर तय की गई कुल लंबाई को कुल चलित दूरी कहते हैं।
चलित दूरी एक अदिश राशि है क्योंकि इसे केवल आंकिक मान और मात्रक द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसकी कोई दिशा नहीं होती।
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विस्थापन
समय के किन्हीं दो क्षणों के बीच किसी वस्तु की स्थिति में होने वाला सकल परिवर्तन उसका विस्थापन कहलाता है।
विस्थापन के पूर्ण वर्णन के लिए उसका परिमाण और दिशा दोनों बताना आवश्यक है। इसलिए विस्थापन एक सदिश राशि है।
| आधार | चलित दूरी | विस्थापन |
|---|---|---|
| अर्थ | वस्तु द्वारा तय किए गए पूरे पथ की लंबाई | प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच सकल परिवर्तन |
| प्रकृति | अदिश राशि | सदिश राशि |
| दिशा | आवश्यक नहीं | आवश्यक |
| पथ पर निर्भरता | पथ पर निर्भर करती है | केवल प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों पर निर्भर करता है |
| मान | शून्य या धनात्मक | धनात्मक , ऋणात्मक या शून्य हो सकता है |
| SI मात्रक | मीटर (m) | मीटर (m) |
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महत्वपूर्ण संबंध
∣विस्थापन∣≤कुल चलित दूरी
- विस्थापन का परिमाण कभी भी चलित दूरी से अधिक नहीं हो सकता।
- यदि वस्तु सरल रेखा में बिना वापस लौटे एक ही दिशा में चलती है, तो—
चलित दूरी=∣विस्थापन∣
- यदि वस्तु प्रारंभिक स्थिति पर वापस आ जाए, तो उसका विस्थापन शून्य होगा, किंतु चलित दूरी शून्य नहीं होगी।
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उदाहरण
एक धावक Oसे Aतक 100 m चलता है और फिर 60 m वापस लौटकर Bपर रुकता है।
कुल चलित दूरी=100+60=160 mविस्थापन=40 m धनात्मक दिशा में
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4.1.3 माध्य चाल एवं माध्य वेग
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माध्य चाल
चाल बताती है कि कोई वस्तु कितनी तेज या धीमी गति से चल रही है। किसी वस्तु की माध्य चाल कुल चलित दूरी को कुल समय अंतराल से विभाजित करके प्राप्त होती है।
माध्य चाल=कुल चलित दूरीसमय अंतराल
माध्य चाल एक अदिश राशि है। इसकी कोई दिशा नहीं होती।
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एकसमान और असमान सरल रेखीय गति
एकसमान सरल रेखीय गति: यदि कोई वस्तु समान समय अंतरालों में समान दूरियाँ तय करती है, तो उसकी गति एकसमान सरल रेखीय गति कहलाती है। इसमें वस्तु की चाल अचर रहती है।
असमान सरल रेखीय गति: यदि वस्तु समान समय अंतरालों में असमान दूरियाँ तय करती है, तो उसकी गति असमान सरल रेखीय गति कहलाती है। इसमें चाल बढ़ सकती है, घट सकती है अथवा कभी बढ़ और कभी घट सकती है।
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माध्य वेग
माध्य वेग बताता है कि किसी वस्तु की स्थिति कितनी तेजी से और किस दिशा में बदल रही है।
माध्य वेग=स्थिति में परिवर्तनसमय अंतराल=विस्थापनसमय अंतराल
यदि माध्य वेग vav, विस्थापन sतथा समय अंतराल tहो, तो—
vav=st
माध्य वेग एक सदिश राशि है। इसकी दिशा विस्थापन की दिशा के समान होती है।
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SI मात्रक
माध्य चाल और माध्य वेग दोनों का SI मात्रक—
मीटर प्रति सेकंड m s-1
इन राशियों को किलोमीटर प्रति घंटा km h-1में भी व्यक्त किया जाता है।
1 km h-1=518 m s-1
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माध्य चाल और माध्य वेग में अंतर
| आधार | माध्य चाल | माध्य वेग |
|---|---|---|
| परिकलन | कुल दूरी ÷ समय | विस्थापन ÷ समय |
| प्रकृति | अदिश | सदिश |
| दिशा | नहीं होती | होती है |
| शून्य होने की दशा | वस्तु न चले | अंतिम स्थिति प्रारंभिक स्थिति के समान हो |
| परिमाणों का संबंध | विस्थापन पर आधारित नहीं | इसका परिमाण माध्य चाल से अधिक नहीं हो सकता |
यदि वस्तु सरल रेखा में एक ही दिशा में चलती है, तो—
माध्य चाल=∣माध्य वेग∣
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तरण-ताल का उदाहरण
एक तैराक 25 m लंबे तरण-ताल के दूसरे किनारे तक जाकर वापस लौटने में 50 s लेता है।
कुल दूरी=50 m, विस्थापन=0माध्य चाल=5050=1 m s-1माध्य वेग=050=0 m s-1
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तात्क्षणिक वेग
किसी विशेष क्षण पर वस्तु के वेग को तात्क्षणिक वेग कहते हैं। वाहन का चालमापी किसी क्षण पर उसके वेग के परिमाण का लगभग मान बताता है।
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भारत का योगदान
भारत में प्राचीनकाल से ही चाल को दूरी और समय के अनुपात के रूप में समझा जाता था। यह अवधारणा पाँचवीं शताब्दी के ग्रंथ आर्यभटीय में मिलती है। चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथ गणित कौमुदी में भी दूरी, चाल और समय पर आधारित उदाहरण दिए गए हैं।
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4.1.4 माध्य त्वरण
किसी वस्तु के वेग में होने वाले परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं।
किसी समय अंतराल में वस्तु का माध्य त्वरण उसके वेग में परिवर्तन को उस समय अंतराल से विभाजित करके प्राप्त होता है।
माध्य त्वरण=वेग-परिवर्तनसमय अंतरालमाध्य त्वरण=अंतिम वेग-प्रारंभिक वेगसमय अंतराल
यदि क्षण t1पर प्रारंभिक वेग uतथा क्षण t2पर अंतिम वेग vहो, तो—
aav=v-ut2-t1
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SI मात्रक
m s-2 अथवा m/s2
त्वरण एक सदिश राशि है। इसलिए इसके परिमाण और दिशा दोनों का उल्लेख आवश्यक है।
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त्वरण की दिशा
- यदि वेग का परिमाण बढ़ रहा है, तो त्वरण वेग की दिशा में होता है।
- यदि वेग का परिमाण घट रहा है, तो त्वरण वेग की दिशा के विपरीत होता है।
- त्वरण वेग के परिमाण, दिशा अथवा दोनों में परिवर्तन के कारण हो सकता है।
किसी वस्तु की चाल बहुत अधिक होने पर भी उसका त्वरण शून्य हो सकता है, यदि उसका वेग परिवर्तित नहीं हो रहा हो।
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नियत त्वरण
यदि समान समय अंतरालों में वस्तु के वेग में समान परिवर्तन होता है, तो उसका त्वरण नियत या अचर त्वरण कहलाता है।
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बस का उदाहरण
बस का वेग 10 s में 10 m s-1से बढ़कर 15 m s-1हो जाता है।
a=15-1010=0.5 m s-2
ब्रेक लगाने पर बस का वेग 5 s में 15 m s-1से शून्य हो जाता है।
a=0-155=-3 m s-2
ऋणात्मक चिह्न बताता है कि त्वरण की दिशा चुनी गई धनात्मक दिशा के विपरीत है।
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गुरुत्वीय त्वरण
पृथ्वी की ओर स्वतंत्र रूप से गिरती वस्तु का वेग प्रत्येक सेकंड लगभग 9.8 m s-1बढ़ता है। इसका त्वरण—
g=9.8 m s-2
यह त्वरण नीचे, पृथ्वी की ओर होता है।
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4.2 गति का आलेखीय निरूपण
गति का ग्राफीय निरूपण यह दर्शाता है कि समय के साथ किसी वस्तु की स्थिति, वेग या त्वरण किस प्रकार बदलता है।
ग्राफों से—
- दो वस्तुओं की गतियों की तुलना की जा सकती है।
- वेग, त्वरण और विस्थापन जैसी राशियाँ ज्ञात की जा सकती हैं।
- गति एकसमान है या असमान, यह पहचाना जा सकता है।
- समय के अलग-अलग क्षणों पर गति की प्रकृति समझी जा सकती है।
इस अध्याय के ग्राफ मुख्यतः एक दिशा में होने वाली सरल रेखीय गति से संबंधित हैं। इस विशेष स्थिति में दूरी और विस्थापन के परिमाण तथा चाल और वेग के परिमाण बराबर होते हैं।
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4.2.1 ग्राफ-आलेखन
ग्राफ बनाने की मुख्य प्रक्रिया निम्नलिखित है—
- ग्राफ पेपर पर एक-दूसरे के लंबवत दो रेखाएँ खींचें।
- प्रतिच्छेदन बिंदु Oको मूल बिंदु कहें।
- क्षैतिज रेखा OX, X-अक्ष कहलाती है।
- ऊर्ध्वाधर रेखा OY, Y-अक्ष कहलाती है।
- समय को सामान्यतः X-अक्ष पर दर्शाया जाता है।
- स्थिति, वेग या अन्य आश्रित राशि को Y-अक्ष पर दर्शाया जाता है।
- दोनों अक्षों के लिए सुविधाजनक मापक्रम चुनें।
- अक्षों पर राशि का नाम, मान और मात्रक अंकित करें।
- आँकड़ों के प्रत्येक युग्म के अनुसार बिंदु अंकित करें।
- सभी बिंदुओं को उपयुक्त रेखा या वक्र से जोड़ें।
ग्राफ किसी वस्तु के वास्तविक यात्रा-पथ का मानचित्र नहीं है। यह केवल बताता है कि समय के साथ कोई भौतिक राशि किस प्रकार बदलती है।
नियत चाल वाली गति में ग्राफ के मध्यवर्ती बिंदु मध्यवर्ती समयों पर वस्तु की स्थिति के सही मान प्रदान करते हैं।
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4.2.2 स्थिति-समय ग्राफ
स्थिति-समय ग्राफ समय के साथ वस्तु की स्थिति में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है।
- X-अक्ष पर समय लिया जाता है।
- Y-अक्ष पर स्थिति ली जाती है।
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ग्राफ की आकृति से गति की प्रकृति
| स्थिति - समय ग्राफ | गति की प्रकृति |
|---|---|
| तिरछी सरल रेखा | वस्तु नियत वेग से गतिमान है |
| वक्र रेखा | वस्तु का वेग बदल रहा है |
| समय - अक्ष के समांतर रेखा | वस्तु विरामावस्था में है |
| अधिक प्रवणता वाली रेखा | वेग का परिमाण अधिक है |
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स्थिति-समय ग्राफ की प्रवणता
दो बिंदुओं Aऔर Bके बीच—
प्रवणता=स्थिति में परिवर्तनसमय में परिवर्तन
अतः—
v=s2-s1t2-t1
इसलिए स्थिति-समय ग्राफ की प्रवणता वस्तु का माध्य वेग प्रदान करती है।
सरल रेखीय ग्राफ की प्रवणता अचर होती है, इसलिए वेग भी अचर होता है। वक्र स्थिति-समय ग्राफ बदलते हुए वेग को दर्शाता है।
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4.2.3 वेग-समय ग्राफ
वेग-समय ग्राफ समय के साथ वस्तु के वेग में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है।
- X-अक्ष पर समय लिया जाता है।
- Y-अक्ष पर वेग लिया जाता है।
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ग्राफ की आकृति से गति की प्रकृति
| वेग - समय ग्राफ | निष्कर्ष |
|---|---|
| समय - अक्ष के समांतर रेखा | वेग नियत और त्वरण शून्य है |
| ऊपर की ओर जाती सरल रेखा | वेग समान दर से बढ़ रहा है ; त्वरण नियत है |
| नीचे की ओर जाती सरल रेखा | वेग समान दर से घट रहा है ; त्वरण की दिशा वेग के विपरीत है |
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वेग-समय ग्राफ की प्रवणता
प्रवणता=वेग में परिवर्तनसमय में परिवर्तन
अतः—
a=v-ut2-t1
इसलिए वेग-समय ग्राफ की प्रवणता त्वरण प्रदान करती है।
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ग्राफ और समय-अक्ष के बीच का क्षेत्रफल
किसी समय अंतराल में वेग-समय ग्राफ की रेखा और समय-अक्ष के बीच परिबद्ध क्षेत्रफल उस समय अंतराल में वस्तु का विस्थापन बताता है।
विस्थापन=वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल
नियत वेग के लिए—
s=v×t
नियत त्वरण के लिए क्षेत्रफल को आयत और त्रिभुज के क्षेत्रफलों में बाँटकर विस्थापन ज्ञात किया जा सकता है।
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ग्राफों से प्राप्त मुख्य राशियाँ
| ग्राफ | प्रवणता से प्राप्त राशि | क्षेत्रफल से प्राप्त राशि |
|---|---|---|
| स्थिति - समय ग्राफ | वेग | लागू नहीं |
| वेग - समय ग्राफ | त्वरण | विस्थापन |
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4.3 सरल रेखा में नियत त्वरण से गति के लिए शुद्धगतिक समीकरण
नियत त्वरण से सरल रेखा में गतिमान वस्तु के लिए पाँच भौतिक राशियाँ प्रयुक्त होती हैं—
| प्रतीक | भौतिक राशि | SI मात्रक |
|---|---|---|
| u | आरंभिक वेग | m s -1 |
| v | अंतिम वेग | m s -1 |
| a | त्वरण | m s -2 |
| t | समय अंतराल | सेकंड (s) |
| s | विस्थापन | मीटर (m) |
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प्रथम शुद्धगतिक समीकरण
त्वरण की परिभाषा से—
a=v-ut
अतः—
v=u+at
यह समीकरण समय tके बाद अंतिम वेग ज्ञात करने में उपयोगी है।
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द्वितीय शुद्धगतिक समीकरण
वेग-समय ग्राफ के नीचे के क्षेत्रफल से—
s=ut+12v-ut
क्योंकि v-u=at, इसलिए—
s=ut+12at2
यह समीकरण समय tमें हुए विस्थापन को बताता है।
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तृतीय शुद्धगतिक समीकरण
पहले दो समीकरणों से समय tको विलुप्त करने पर—
v2=u2+2as
इस समीकरण में समय नहीं होता।
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समीकरण का चयन
| यदि यह राशि आवश्यक नहीं है | उपयुक्त समीकरण |
|---|---|
| विस्थापन s | v=u+at |
| अंतिम वेग v | s=ut+ 1 2 a t 2 |
| समय t | v 2 = u 2 +2as |
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प्रयोग की आवश्यक शर्त
ये तीनों शुद्धगतिक समीकरण केवल नियत त्वरण वाली सरल रेखीय गति के लिए मान्य हैं।
यदि वस्तु दोनों दिशाओं में चलती है, तो u, v, aऔर sके चिह्न चुनी गई धनात्मक दिशा के अनुसार लगाए जाने चाहिए।
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ब्रेक लगाने और सुरक्षित दूरी का संबंध
ब्रेक लगाने के बाद वाहन रुकने से पहले कुछ दूरी तय करता है। यह दूरी निम्न बातों पर निर्भर करती है—
- वाहन का आरंभिक वेग
- सड़क की सतह
- वाहन की ब्रेक क्षमता
- चालक का प्रतिक्रिया काल
समान -4 m s-2त्वरण पर 15 m s-1की चाल वाले वाहन की रुकने की दूरी लगभग 28.1 m है, जबकि चाल दोगुनी होकर 30 m s-1होने पर यह दूरी 112.5 m हो जाती है। इसलिए तेज गति पर वाहनों के बीच अधिक सुरक्षित दूरी रखना आवश्यक है।
वाहन-से-वाहन संप्रेषण तकनीक वाहनों को संकेतों का आदान-प्रदान करने और संभावित टक्कर के विषय में चालक को चेतावनी देने में सहायता कर सकती है।
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4.4 समतल में गति
सरल रेखीय गति को एकविमीय गति कहा जाता है। जब वस्तु की स्थिति दो दिशाओं में बदलती है और उसका पथ किसी समतल में होता है, तो इसे द्विविमीय गति कहते हैं।
उदाहरण—
- एक वाहन का दूसरे वाहन को पार करना
- ठोकर मारकर हवा में उछाली गई गेंद का पथ
- वृत्ताकार पथ पर घूमता उपग्रह
आकाश में उड़ते पक्षी, वायुयान या पर्वतीय मार्ग पर चलती कार जैसी गतियाँ त्रिविमीय गति के उदाहरण हैं।
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4.4.1 एकसमान वृत्तीय गति
जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ पर चलती है, तो उसकी गति वृत्तीय गति कहलाती है।
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वृत्तीय गति में दूरी और विस्थापन
यदि कोई वस्तु वृत्त के बिंदु Aसे Bहोते हुए Cतक जाती है—
- चलित दूरी वक्र ABCकी लंबाई होगी।
- विस्थापन सरल रेखा ACहोगा।
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एक पूर्ण परिक्रमा
यदि वृत्त की त्रिज्या Rहो, तो एक परिक्रमा में तय दूरी—
दूरी=2πR
एक पूर्ण परिक्रमा के बाद वस्तु प्रारंभिक स्थिति पर लौट आती है, इसलिए—
विस्थापन=0
यदि परिक्रमा पूर्ण करने का समय Tहो, तो माध्य चाल—
vav=2πRT
लेकिन एक पूर्ण परिक्रमा के लिए माध्य वेग—
माध्य वेग=0
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एकसमान वृत्तीय गति की परिभाषा
जब कोई वस्तु वृत्ताकार पथ पर अचर या एकसमान चाल से चलती है, तो उसकी गति एकसमान वृत्तीय गति कहलाती है।
चाल अचर, फिर भी त्वरण क्यों?
एकसमान वृत्तीय गति में—
- चाल अचर रहती है।
- वेग का परिमाण अचर रहता है।
- वेग की दिशा प्रत्येक बिंदु पर बदलती रहती है।
- दिशा बदलने के कारण वेग बदलता है।
- इसलिए वस्तु की गति त्वरणशील होती है।
वृत्त के किसी बिंदु पर वस्तु के वेग की दिशा उस बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश होती है।

यदि वृत्ताकार पथ में घूमते कंचे को मुक्त कर दिया जाए, तो वह मुक्त किए जाने के क्षण की गति की दिशा में सरल रेखा में चलने लगता है।
एकसमान वृत्तीय गति वास्तविक गति का आदर्श प्रतिरूप है। यह सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति और वृत्तीय मोड़ पर वाहन के मुड़ने जैसी जटिल गतियों को समझने में सहायता करता है।
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अध्याय का सारांश
- संदर्भ बिंदु के सापेक्ष वस्तु की दूरी और दिशा उसकी स्थिति बताते हैं।
- संदर्भ बिंदु के सापेक्ष स्थिति बदलने पर वस्तु गतिशील होती है।
- वस्तु द्वारा तय किए गए पूरे पथ की लंबाई चलित दूरी कहलाती है।
- प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच सकल परिवर्तन विस्थापन कहलाता है।
- विस्थापन का परिमाण चलित दूरी से अधिक नहीं हो सकता।
- माध्य चाल कुल दूरी और समय अंतराल का अनुपात है।
- माध्य वेग विस्थापन और समय अंतराल का अनुपात है।
- माध्य त्वरण वेग-परिवर्तन और समय अंतराल का अनुपात है।
- स्थिति-समय ग्राफ की प्रवणता से वेग प्राप्त होता है।
- वेग-समय ग्राफ की प्रवणता से त्वरण प्राप्त होता है।
- वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल विस्थापन बताता है।
- नियत त्वरण के लिए शुद्धगतिक समीकरण हैं—
v=u+ats=ut+12at2v2=u2+2as
- एकसमान वृत्तीय गति में चाल अचर होती है, परंतु वेग की दिशा लगातार बदलती है।
- पूर्ण वृत्तीय परिक्रमा में दूरी 2πRतथा विस्थापन शून्य होता है।
- वेग की दिशा में परिवर्तन के कारण एकसमान वृत्तीय गति भी त्वरणशील गति होती है।
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