यह सामाजिक एकांकी विवाह की रूढ़ियों और स्त्री-शिक्षा के प्रति संकीर्ण सोच पर व्यंग्य करते हुए आत्मसम्मान और नैतिक साहस का संदेश देती है।
देखिए और समझिए
वीडियो पाठ
NCERT Hindi Tutor के वीडियो से अध्याय समझिए, फिर नीचे दिए गए नोट्स और प्रश्नोत्तर से दोहराव कीजिए।
अध्याय को समझें
सारांश, व्याख्या और महत्वपूर्ण अध्ययन-बिंदु
आपकी तैयार की गई अध्ययन सामग्री को विषयानुसार उसी क्रम में व्यवस्थित किया गया है।
1. पाठ का परिचय
“रीढ़ की हड्डी” एक एकांकी है। यह पाठ भारतीय समाज में विवाह, लड़की की शिक्षा, स्त्री-सम्मान और रूढ़िवादी सोच पर व्यंग्य करता है। इस एकांकी में दिखाया गया है कि उस समय समाज में बहुत-से लोग लड़कों की ऊँची शिक्षा को आवश्यक मानते थे, लेकिन लड़कियों की शिक्षा से डरते थे। वे चाहते थे कि लड़की सुंदर, घरेलू, कम पढ़ी-लिखी और आज्ञाकारी हो।
इस एकांकी की मुख्य पात्र उमा है। वह पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी और साहसी लड़की है। वह अपने साथ हो रहे अपमान का विरोध करती है और समाज की गलत सोच को चुनौती देती है।
2. लेखक परिचय — जगदीशचंद्र माथुर
जगदीशचंद्र माथुर हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार और एकांकीकार थे। उनका जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। वे प्रशासनिक सेवाओं में भी रहे और आकाशवाणी के महानिदेशक जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—
भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना आदि।
उनका नाटक “कोणार्क” बहुत प्रसिद्ध है। उनका निधन सन् 1978 में हुआ।
3. विधा — एकांकी
एकांकी नाटक का छोटा रूप होता है। इसमें एक ही मुख्य घटना, सीमित पात्र और कम समय में पूरा होने वाली कथा होती है।
इस पाठ में एकांकी के तत्व
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| एकांकी का नाम | रीढ़ की हड्डी |
| लेखक | जगदीशचंद्र माथुर |
| मुख्य पात्र | उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, गोपालप्रसाद, शंकर, रतन |
| स्थान | रामस्वरूप का घर |
| मुख्य समस्या | लड़की की शिक्षा और विवाह में रूढ़िवादी सोच |
| मुख्य विचार | स्त्री-सम्मान, आत्मबल और सामाजिक कुरीतियों का विरोध |
| परिणाम | उमा गलत सोच का विरोध करती है और रिश्ता टूट जाता है |
4. पात्र परिचय
1. उमा: उमा इस एकांकी की मुख्य पात्र है। वह बी.ए. पास, शिक्षित, स्वाभिमानी और साहसी लड़की है। वह अपने अपमान को चुपचाप सहन नहीं करती। वह लड़कियों को वस्तु समझने वाली मानसिकता का विरोध करती है।
2. रामस्वरूप: रामस्वरूप उमा के पिता हैं। वे बाहर से आधुनिक दिखते हैं, लेकिन समाज और विवाह की रूढ़ियों से डरते हैं। वे अपनी बेटी की पढ़ाई को छिपाते हैं ताकि रिश्ता तय हो जाए।
3. प्रेमा: प्रेमा उमा की माँ है। वह परंपरागत सोच वाली स्त्री है। उसे लगता है कि लड़कियों के लिए अधिक पढ़ाई-लिखाई आवश्यक नहीं है।
4. गोपालप्रसाद: गोपालप्रसाद लड़के के पिता हैं। वे रूढ़िवादी, चालाक और दिखावे वाले व्यक्ति हैं। वे पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते। उनके विचार स्त्री-शिक्षा के विरोधी हैं।
5. शंकर: शंकर गोपालप्रसाद का बेटा है। वह पढ़ा-लिखा है, मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, लेकिन उसमें नैतिक साहस की कमी है। वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूम चुका है, फिर भी लड़की से आदर्श व्यवहार की अपेक्षा करता है।
6. रतन: रतन रामस्वरूप का घरेलू सहायक है। वह हास्य उत्पन्न करने वाला पात्र है। अंत में उसका “बाबूजी, मक्खन!” कहना पूरे वातावरण को व्यंग्यपूर्ण बना देता है।
5. पाठ का सारांश
एकांकी की शुरुआत रामस्वरूप के घर से होती है। घर में लड़की देखने आने वाले मेहमानों के स्वागत की तैयारी चल रही है। रामस्वरूप कमरे को सजवा रहे हैं। वे रतन से तख्त बिछवाते हैं, चादर मँगवाते हैं और हारमोनियम-सितार रखवाते हैं ताकि उमा को अच्छी तरह प्रस्तुत किया जा सके।
उधर प्रेमा परेशान है क्योंकि उमा सजने-सँवरने को तैयार नहीं है। वह पाउडर लगाने से भी मना कर देती है। प्रेमा को लगता है कि आजकल लड़की चाहे सुंदर हो, लेकिन बिना सजावट के लोग उसे पसंद नहीं करते। रामस्वरूप भी चिंतित हैं क्योंकि लड़के वाले आने वाले हैं।
रामस्वरूप बताते हैं कि लड़के के पिता गोपालप्रसाद वकील हैं, सभाओं में जाते हैं, पढ़े-लिखे हैं, लेकिन बहू ऐसी चाहते हैं जो ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो। लड़का शंकर भी मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, पर वह भी यही सोच रखता है कि शादी और पढ़ाई अलग-अलग बातें हैं।
तभी गोपालप्रसाद और शंकर आते हैं। रामस्वरूप उनका बहुत आदर करते हैं। बातचीत में गोपालप्रसाद अपनी पुरानी पीढ़ी की ताकत, पढ़ाई और जीवनशैली की बहुत प्रशंसा करते हैं। फिर वे विवाह को “बिजनेस” कहकर बात शुरू करते हैं। इससे विवाह में लेन-देन और सौदेबाजी की मानसिकता स्पष्ट होती है।
नाश्ते के दौरान गोपालप्रसाद सुंदरता पर चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि लड़की का सुंदर होना बहुत जरूरी है। फिर वे साफ कहते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। उनका मानना है कि लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक जैसी नहीं होती। वे ऊँची शिक्षा को पुरुषों के लिए जरूरी मानते हैं, स्त्रियों के लिए नहीं।
इसके बाद उमा को बुलाया जाता है। वह सादे कपड़ों में आती है। उसके चश्मे को देखकर गोपालप्रसाद और शंकर चौंक जाते हैं। रामस्वरूप झूठ बोलते हैं कि उसकी आँखें दुख रही थीं, इसलिए चश्मा लगाया है। फिर उमा से गाना गाने को कहा जाता है। उमा अच्छा गाती है। उसके बाद उससे चित्रकला, सिलाई और इनामों के बारे में पूछा जाता है।
जब उससे बार-बार सवाल पूछे जाते हैं, तो उमा चुप नहीं रहती। वह कहती है कि जब कुर्सी-मेज बिकती है, तब दुकानदार उनसे कुछ नहीं पूछता, केवल खरीदार को दिखा देता है। इसी तरह उसे भी वस्तु की तरह दिखाया जा रहा है। उमा पूछती है कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उन्हें चोट नहीं लगती? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं?
उमा फिर शंकर की पोल खोलती है कि वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता था और वहाँ से भगाया गया था। वह स्पष्ट कहती है कि उसने बी.ए. पास किया है, कोई पाप या चोरी नहीं की है। उसे अपने मान-सम्मान का खयाल है।
गोपालप्रसाद क्रोधित हो जाते हैं। वे कहते हैं कि रामस्वरूप ने उन्हें धोखा दिया, क्योंकि उन्होंने कहा था कि लड़की केवल मैट्रिक तक पढ़ी है। वे रिश्ता तोड़कर जाने लगते हैं। तब उमा व्यंग्य से कहती है कि घर जाकर देखिए कि आपके बेटे के पास “रीढ़ की हड्डी” है या नहीं— यानी उसमें नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता है या नहीं।
अंत में गोपालप्रसाद और शंकर चले जाते हैं। रामस्वरूप कुर्सी पर बैठ जाते हैं और उमा रोने लगती है। तभी रतन आता है और कहता है— “बाबूजी, मक्खन!” इसी हास्य और व्यंग्यपूर्ण संवाद के साथ परदा गिर जाता है।
6. शीर्षक “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ
रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा रखती है। इस पाठ में यह केवल शरीर का अंग नहीं है, बल्कि आत्मसम्मान, नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक है।
उमा में वास्तविक “रीढ़ की हड्डी” है, क्योंकि वह अन्याय और अपमान का विरोध करती है। शंकर में “रीढ़ की हड्डी” नहीं है, क्योंकि वह पढ़ा-लिखा होने के बावजूद नैतिक रूप से कमजोर और डरपोक है।
7. मुख्य विषय-वस्तु
1. स्त्री-शिक्षा का महत्व: एकांकी बताती है कि शिक्षा केवल नौकरी पाने के लिए नहीं होती। शिक्षा व्यक्ति को आत्मबल, सोचने की शक्ति और अपने अधिकार पहचानने की क्षमता देती है।
2. विवाह में लड़कियों को वस्तु समझना: लड़की को देखने की प्रक्रिया में उमा को वस्तु की तरह परखा जाता है— उसकी सुंदरता, चाल, गाना, सिलाई और शिक्षा सबका हिसाब लगाया जाता है। उमा इसी मानसिकता का विरोध करती है।
3. रूढ़िवादी सोच पर व्यंग्य: गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे होकर भी संकीर्ण सोच रखते हैं। वे लड़के की पढ़ाई को जरूरी मानते हैं, पर लड़की की पढ़ाई को समस्या समझते हैं।
4. दिखावा और सामाजिक दबाव: रामस्वरूप अपनी बेटी की शिक्षा छिपाते हैं। वे बाहर से आधुनिक दिखना चाहते हैं, पर समाज के डर से गलत बातों का विरोध नहीं कर पाते।
5. आत्मसम्मान और साहस: उमा का चरित्र इस पाठ का सबसे बड़ा संदेश देता है— अन्याय और अपमान के सामने चुप रहना सही नहीं है।
8. महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अधेड़ | आधी उम्र का, ढलती उम्र का |
| तख्त | लकड़ी की बड़ी चौकी |
| गंदुमी | गेहुँए रंग का |
| डाट | रोक, अटकाव |
| जंजाल | झंझट, परेशानी |
| ठठोली | हँसी-मजाक, परिहास |
| करीना | ढंग, तरीका |
| दकियानूसी | पुराने विचारों वाला |
| तालीम | शिक्षा |
| चौपट | नष्ट, बिगड़ा हुआ |
| दस्तक | दरवाजे पर खटखटाना |
| फितरती | चालाक, चालबाज |
| खीस निपोरना | दाँत दिखाकर बेढंगी हँसी हँसना |
| खासियत | विशेषता |
| तशरीफ | आदरपूर्वक उपस्थिति |
| मार्जिन | सीमा, गुंजाइश |
| बालाई | ऊपर का हिस्सा |
| तकल्लुफ | दिखावटी शिष्टाचार |
| माफिक | अनुसार, अनुकूल |
| मुखातिब | संबोधित, बात करने वाला |
| निहायत | बहुत अधिक |
| जायचा | जन्मपत्री |
| अर्ज | निवेदन |
| अधीर | उतावला, धैर्यहीन |
9. महत्वपूर्ण मुहावरे और उनके अर्थ
| मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| भीगी बिल्ली की तरह | डरकर या दबकर रहना |
| मुँह फुलाना | नाराज होना |
| किस मर्ज की दवा होना | किसी काम का न होना |
| सिर चढ़ाना | बहुत अधिक छूट देना |
| सब कुछ उगल देना | सारी बात बता देना |
| काँटों में घसीटना | मुश्किल में डालना |
| इज्जत उतारना | अपमान करना |
| मुँह छिपाकर भागना | शर्मिंदा होकर भाग जाना |
| बाप सेर तो बेटा सवा सेर | बेटा पिता से भी बढ़कर होना |
10. प्रमुख संवाद और उनका महत्व
संवाद 1: “हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए।”
यह संवाद समाज की रूढ़िवादी सोच को दिखाता है। लड़के वाले चाहते हैं कि लड़की पढ़ी-लिखी न हो ताकि वह सवाल न करे और केवल घर तक सीमित रहे।
संवाद 2: “क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती?”
यह उमा का सबसे प्रभावशाली संवाद है। इससे पता चलता है कि वह अपने अपमान को समझती है और उसका विरोध करने का साहस रखती है।
संवाद 3: “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।”
यह संवाद उमा के आत्मविश्वास को दिखाता है। वह अपनी शिक्षा को छिपाना नहीं चाहती, क्योंकि शिक्षा कोई अपराध नहीं है।
संवाद 4: “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं।”
यह संवाद शीर्षक का अर्थ स्पष्ट करता है। यहाँ “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता है।
11. उमा का चरित्र-चित्रण
उमा इस एकांकी की सबसे मजबूत पात्र है। वह शिक्षित, आत्मसम्मानी और स्पष्ट विचारों वाली युवती है। वह समाज की गलत परंपराओं को चुपचाप स्वीकार नहीं करती। जब उसे वस्तु की तरह परखा जाता है, तो वह इसका विरोध करती है।
उसका चरित्र बताता है कि शिक्षा व्यक्ति को केवल डिग्री नहीं देती, बल्कि आत्मबल भी देती है। वह शंकर और उसके पिता की दोहरी मानसिकता को पहचानती है और उनके सामने सच बोलती है। वह अपने सम्मान के लिए रिश्ता टूटने से भी नहीं डरती।
12. गोपालप्रसाद का चरित्र-चित्रण
गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे और वकील हैं, लेकिन विचारों से रूढ़िवादी हैं। वे लड़के और लड़की के लिए अलग-अलग नियम मानते हैं। वे चाहते हैं कि लड़की सुंदर और घरेलू हो, पर अधिक शिक्षित न हो।
उनका चरित्र समाज के उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो बाहर से आधुनिक दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से पुराने और संकीर्ण विचार रखते हैं।
13. रामस्वरूप का चरित्र-चित्रण
रामस्वरूप उमा के पिता हैं। वे अपनी बेटी को पढ़ाते हैं, लेकिन उसकी पढ़ाई को छिपाते हैं। वे समाज और रिश्ते के दबाव में आकर गलत लोगों के सामने झुकते हैं। उनके अंदर विरोध करने का साहस नहीं है।
रामस्वरूप का चरित्र दिखाता है कि केवल पढ़ा-लिखा होना काफी नहीं, सही बात के पक्ष में खड़ा होना भी जरूरी है।
14. शंकर का चरित्र-चित्रण
शंकर मेडिकल कॉलेज का छात्र है, लेकिन उसमें नैतिक साहस की कमी है। वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता है और फिर भी अपने लिए आदर्श, कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहता है। वह अपने पिता के सामने भी दबा हुआ दिखाई देता है।
इसलिए उमा उसके बारे में कहती है कि उसमें “रीढ़ की हड्डी” नहीं है।
15. पाठ का संदेश
इस एकांकी का मुख्य संदेश है कि लड़कियाँ कोई वस्तु नहीं हैं जिन्हें विवाह के बाजार में परखा जाए। उन्हें भी सम्मान, शिक्षा, स्वतंत्र विचार और आत्मसम्मान का अधिकार है। समाज में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग नियम नहीं होने चाहिए।
पाठ यह भी सिखाता है कि वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति को सही-गलत पहचानने और अन्याय का विरोध करने का साहस दे।
16. परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
रीढ़ की हड्डी आत्मसम्मान और नैतिक साहस का प्रतीक है।
यह एकांकी स्त्री-शिक्षा और विवाह की रूढ़ियों पर व्यंग्य करती है।
उमा शिक्षित और स्वाभिमानी नारी का प्रतिनिधित्व करती है।
गोपालप्रसाद और शंकर दोहरी मानसिकता के प्रतीक हैं।
रामस्वरूप आधुनिक दिखते हैं, पर सामाजिक दबाव से डरते हैं।
रतन का अंतिम संवाद हास्य और व्यंग्य पैदा करता है।
पाठ का केंद्रीय विचार है— स्त्रियों को सम्मान और समान अवसर मिलना चाहिए।
एकांकी की संवाद शैली स्वाभाविक, हास्यपूर्ण और व्यंग्यात्मक है।
17. लघु सारांश
“रीढ़ की हड्डी” एक सामाजिक एकांकी है, जिसमें विवाह के नाम पर लड़कियों को वस्तु की तरह परखने और उनकी शिक्षा को कमतर समझने वाली मानसिकता पर व्यंग्य किया गया है। उमा एक पढ़ी-लिखी और स्वाभिमानी लड़की है। लड़के वाले उसे देखने आते हैं और उसकी सुंदरता, गाना, सिलाई आदि का परीक्षण करते हैं। वे ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहते। जब उमा को यह अपमानजनक व्यवहार महसूस होता है, तो वह उनका विरोध करती है और साफ कहती है कि उसने बी.ए. पास किया है, कोई अपराध नहीं किया। अंत में वह शंकर की नैतिक कमजोरी को उजागर करती है और कहती है कि देखिए, आपके बेटे में रीढ़ की हड्डी है या नहीं। यह एकांकी आत्मसम्मान, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक समानता का संदेश देती है।
पाठ 6 — रीढ़ की हड्डी
अभ्यास और पुनरावृत्ति
संपूर्ण प्रश्नोत्तर और भाषा-अभ्यास
प्रश्न, उत्तर, तर्क, काव्य-बोध, व्याकरण तथा गतिविधियाँ मूल अध्ययन सामग्री के क्रम में दी गई हैं।
मौलिक अध्ययन-मार्गदर्शिका: NCERT Hindi Tutor · ncerthinditutor.com
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
प्रश्न 1. एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ का शीर्षक किसका प्रतीक है?
(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
इस एकांकी में “रीढ़ की हड्डी” केवल शरीर का अंग नहीं है, बल्कि व्यक्ति के आत्म-सम्मान, साहस और नैतिक मजबूती का प्रतीक है। उमा में आत्मसम्मान और साहस है, इसलिए वह अन्याय और अपमान का विरोध करती है। दूसरी ओर शंकर पढ़ा-लिखा होने पर भी चरित्र और साहस में कमजोर दिखाई देता है। इसलिए यह विकल्प सबसे उपयुक्त है।
प्रश्न 2. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
इस एकांकी में समाज की गलत और रूढ़िवादी सोच पर व्यंग्य किया गया है। जैसे— लड़कियों को विवाह के लिए वस्तु की तरह देखना, पढ़ी-लिखी लड़की को पसंद न करना, लड़कों और लड़कियों की शिक्षा को अलग-अलग दृष्टि से देखना आदि। इसलिए यह एकांकी समाज की अनुचित मान्यताओं पर प्रहार करती है।
प्रश्न 3. “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?
(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
उमा यह बात शंकर के लिए कहती है। शंकर मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, लेकिन उसमें नैतिक साहस नहीं है। वह लड़कियों के हॉस्टल के पास अनुचित ढंग से घूमता है और पकड़े जाने पर मुँह छिपाकर भागता है। इससे उसकी चारित्रिक कमजोरी और साहस की कमी स्पष्ट होती है।
प्रश्न 4. “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ मैंने बी.ए. पास किया है” उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है?
(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उमा अपनी शिक्षा को अपराध नहीं मानती। वह स्पष्ट कहती है कि उसने बी.ए. पास किया है, कोई चोरी या पाप नहीं किया। उसकी शिक्षा ने उसे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और स्वतंत्र विचार दिए हैं। इसलिए उमा की दृष्टि में शिक्षा का सही अर्थ आत्मबल और स्वतंत्र सोच रखना है।
प्रश्न 5. गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?
(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे और सभ्य दिखते हैं, लेकिन उनके विचार रूढ़िवादी हैं। वे ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते। रामस्वरूप भी अपनी बेटी को पढ़ाते हैं, पर विवाह के लिए उसकी शिक्षा छिपाते हैं। वे भी समाज और परंपरा के दबाव में दिखावा करते हैं। इसलिए दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
प्रश्न 6. इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यतः कैसी है?
(ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
इस एकांकी के संवाद सामान्य बोलचाल की भाषा में हैं। पात्रों की बातचीत स्वाभाविक लगती है। साथ ही संवादों में समाज की गलत सोच पर तीखा व्यंग्य भी है। जैसे गोपालप्रसाद विवाह को “बिजनेस” की तरह देखते हैं और उमा “रीढ़ की हड्डी” वाले संवाद से शंकर की कमजोरी पर व्यंग्य करती है।
मेरी समझ मेरे विचार
प्रश्न 1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।
बाबू रामस्वरूप के व्यवहार में आधुनिकता और रूढ़िवादिता दोनों का अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है। वे अपनी बेटी उमा को पढ़ाते हैं, जिससे लगता है कि वे आधुनिक सोच वाले हैं। लेकिन जब विवाह की बात आती है तो वे उमा की शिक्षा छिपाने लगते हैं। वे गोपालप्रसाद से यह बात छिपाते हैं कि उमा बी.ए. पास है, क्योंकि लड़के वाले ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहते।
दूसरा उदाहरण यह है कि वे उमा को लड़के वालों के सामने सजाकर, गवाकर और उसके गुणों को दिखाकर प्रस्तुत करना चाहते हैं। यह व्यवहार बताता है कि वे विवाह में लड़की को परखने वाली पुरानी परंपरा से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
वे गोपालप्रसाद के दकियानूसी विचारों से भीतर-ही-भीतर असहमत हैं, लेकिन रिश्ता टूटने के डर से उनका विरोध नहीं करते। इससे पता चलता है कि रामस्वरूप आधुनिकता का दिखावा तो करते हैं, पर समाज की रूढ़ियों के सामने झुक जाते हैं।
प्रश्न 2. ‘रीढ़ की हड्डी’ के संदर्भ में दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
‘रीढ़ की हड्डी’ का संदर्भ इस एकांकी में दो पात्रों के लिए अलग-अलग अर्थों में आता है।
पहला पात्र उमा है। उमा के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ का अर्थ है— आत्मसम्मान, साहस और नैतिक दृढ़ता। वह अपने अपमान को सहन नहीं करती और लड़के वालों की गलत सोच का विरोध करती है। वह साफ कहती है कि पढ़ाई करना कोई अपराध नहीं है। इससे उसका साहसी और स्वाभिमानी व्यक्तित्व सामने आता है।
दूसरा पात्र शंकर है। शंकर के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ का प्रयोग व्यंग्य में हुआ है। उमा कहती है कि जाकर पता लगाइए कि आपके बेटे के पास रीढ़ की हड्डी है या नहीं। यहाँ इसका अर्थ है कि शंकर में नैतिक साहस और चरित्र की मजबूती नहीं है। वह पढ़ा-लिखा होकर भी डरपोक और कमजोर चरित्र वाला दिखाई देता है।
प्रश्न 3. “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
प्रेमा की इस बात से पता चलता है कि उस समय समाज में स्त्री-शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था। बहुत-से लोग मानते थे कि लड़कियों को अधिक पढ़ाने से वे परिवार और विवाह के लिए कठिन हो जाती हैं। स्त्रियों की शिक्षा को आवश्यकता नहीं, बल्कि “जंजाल” समझा जाता था।
प्रेमा स्वयं पुराने विचारों वाली हैं। उनके अनुसार लड़कियों को थोड़ी-बहुत पढ़ाई, गिनती और घरेलू ज्ञान ही काफी है। इससे पता चलता है कि उस समय लड़कियों की शिक्षा सीमित रखी जाती थी और उनसे मुख्य रूप से घर-गृहस्थी संभालने की अपेक्षा की जाती थी।
यह सोच समाज की रूढ़िवादी मानसिकता को दिखाती है, जहाँ स्त्री को स्वतंत्र विचार रखने वाली व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि घर और विवाह तक सीमित माना जाता था।
प्रश्न 4. लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’ शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?
लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’ शब्द को शीर्षक इसलिए चुना होगा क्योंकि यह आत्मसम्मान, नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक है। शरीर में रीढ़ की हड्डी व्यक्ति को सीधा खड़ा रखती है। इसी प्रकार जीवन में आत्मसम्मान और नैतिक साहस व्यक्ति को सही बात पर खड़ा रहने की शक्ति देते हैं।
इस एकांकी में उमा में वास्तविक “रीढ़ की हड्डी” है क्योंकि वह अपमान और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है। दूसरी ओर शंकर के पास शिक्षा तो है, लेकिन साहस और चरित्र की दृढ़ता नहीं है। इसलिए उमा व्यंग्यपूर्वक कहती है कि उसके पास रीढ़ की हड्डी है या नहीं।
यदि मैं इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखूँ, तो वह होगा— “उमा का आत्मसम्मान”। यह शीर्षक इसलिए उपयुक्त है क्योंकि पूरी एकांकी में उमा अपने सम्मान और अधिकार के लिए खड़ी होती है। वह यह सिद्ध करती है कि लड़की कोई वस्तु नहीं है, बल्कि सोचने-समझने और सम्मान पाने वाली स्वतंत्र व्यक्ति है।
एकांकी की पड़ताल
नीचे ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी से संबंधित बिंदुओं के उदाहरण दिए गए हैं—
| क्रम | बिंदु | एकांकी से उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. | एकांकी का नाम | रीढ़ की हड्डी |
| 2. | लेखक का नाम | जगदीशचंद्र माथुर |
| 3. | पात्र | उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद, रतन |
| 4. | परिवेश/देश-काल | रामस्वरूप का घर; वह समय जब विवाह के लिए लड़की को देखने की परंपरा और स्त्री-शिक्षा के प्रति संकीर्ण सोच समाज में प्रचलित थी। |
| 5. | रंग-निर्देश/मंच-निर्देश | “मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा… एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं।” |
| 6. | संवाद-निर्देश | “रामस्वरूप : हँ-हँ-हँ। आइए, आइए!” या “उमा : जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ।” |
| 7. | समस्या | विवाह के लिए लड़की को वस्तु की तरह देखना, अधिक पढ़ी-लिखी लड़की को अस्वीकार करना और स्त्रियों की शिक्षा को कमतर समझना। |
| 8. | संवाद | “क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती?” |
| 9. | मुख्य विचार | लड़कियों को भी शिक्षा, सम्मान, आत्मसम्मान और स्वतंत्र विचार का अधिकार है। |
| 10. | समाधान/परिणाम | उमा अपने अपमान का विरोध करती है। वह गोपालप्रसाद और शंकर की रूढ़िवादी सोच को चुनौती देती है। अंत में रिश्ता टूट जाता है, लेकिन उमा का आत्मसम्मान सुरक्षित रहता है। |
इस एकांकी में मंच-निर्देश, संवाद, पात्रों की गतिविधियाँ और सामाजिक समस्या मिलकर एक प्रभावशाली नाटकीय स्थिति बनाते हैं। पाठ में विवाह और स्त्री-शिक्षा से जुड़ी रूढ़ियों पर व्यंग्य किया गया है।
रंग-निर्देश
प्रश्न: अब इस एकांकी को कक्षा में प्रस्तुत करने का समय है। अपने समूह के साथ मिलकर एकांकी के किसी एक दृश्य का चुनाव कीजिए। उसकी तैयारी कीजिए और कक्षा में उसे प्रस्तुत कीजिए।
चुना गया दृश्य
हम एकांकी का वह दृश्य प्रस्तुत करेंगे जिसमें उमा लड़के वालों के सामने आती है और अंत में अपने आत्मसम्मान के लिए आवाज उठाती है।
पात्र
उमा
रामस्वरूप
गोपालप्रसाद
शंकर
प्रेमा
रतन
मंच पर एक साधारण कमरा दिखाया जाएगा। कमरे में एक तख्त, दो-तीन कुर्सियाँ, एक छोटी मेज, सितार या हारमोनियम और नाश्ते की ट्रे रखी जाएगी। इससे यह लगेगा कि घर में लड़की देखने के लिए मेहमान आए हैं।
रामस्वरूप साधारण कुरता-पाजामा पहनेंगे। गोपालप्रसाद थोड़े औपचारिक कपड़े पहनेंगे और हाथ में छड़ी रखेंगे। शंकर पढ़े-लिखे युवक की तरह कपड़े पहनेगा। उमा सादे कपड़ों में आएगी और चश्मा लगाएगी। रतन घरेलू सहायक के रूप में साधारण कपड़े पहनेगा।
रामस्वरूप को घबराहट और दिखावे के भाव से बोलना होगा। गोपालप्रसाद को घमंडी और रूढ़िवादी स्वभाव के साथ संवाद बोलने होंगे। शंकर को झेंपा हुआ और कमजोर व्यक्तित्व वाला दिखाना होगा। उमा को पहले शांत और फिर आत्मविश्वास से भरा हुआ दिखाना होगा।
इस दृश्य के माध्यम से हम दिखाएँगे कि लड़कियों को वस्तु की तरह परखना गलत है। लड़कियों की शिक्षा और आत्मसम्मान का सम्मान किया जाना चाहिए।
मेरी टिप्पणी
प्रश्न: “जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए। लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं— यानी बैकबोन, बैकबोन!”
उमा द्वारा शंकर के लिए कही गई उपर्युक्त बात पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उमा की यह टिप्पणी बहुत तीखी, साहसपूर्ण और व्यंग्यात्मक है। यहाँ “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ शरीर के अंग से नहीं, बल्कि नैतिक साहस और चरित्र की दृढ़ता से है। उमा शंकर को यह बताना चाहती है कि केवल ऊँची पढ़ाई कर लेना ही व्यक्ति को योग्य नहीं बनाता। व्यक्ति में आत्मसम्मान, सच्चाई और साहस भी होना चाहिए।
शंकर मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, लेकिन उसका व्यवहार कमजोर और डरपोक है। वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता है और पकड़े जाने पर मुँह छिपाकर भागता है। फिर भी वह अपने लिए कम पढ़ी-लिखी और आज्ञाकारी लड़की चाहता है। उमा इसी दोहरे चरित्र पर चोट करती है।
मेरे विचार से उमा की यह बात बिल्कुल उचित है, क्योंकि उसने अपने अपमान का विरोध किया और समाज की गलत सोच को सामने रखा। यह टिप्पणी बताती है कि वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति को सही और गलत पहचानने का साहस दे।
तुलना और विचार
प्रश्न 1: “गोपालप्रसाद : भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है।”
एकांकी में उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ एकांकी के पात्रों के व्यवहार में लड़कियों तथा लड़कों के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टि अभिव्यक्त हुई है। अब यह भी लिखिए कि आप इस भिन्नता को किस प्रकार समझते हैं?
एकांकी में कई स्थानों पर लड़कों और लड़कियों के प्रति भिन्न दृष्टि दिखाई देती है।
1. गोपालप्रसाद का विचार: गोपालप्रसाद कहते हैं कि लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात नहीं है। उनके अनुसार लड़कों को पढ़ना और योग्य बनना चाहिए, लेकिन लड़कियों की अधिक शिक्षा गृहस्थी के लिए ठीक नहीं है।
2. शंकर का विचार: शंकर कहता है— “जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।” इससे पता चलता है कि वह भी लड़कियों की पढ़ाई को केवल नौकरी से जोड़कर देखता है। उसके विचार में यदि लड़की नौकरी नहीं करेगी, तो उसे ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है।
3. रामस्वरूप का व्यवहार: रामस्वरूप उमा को पढ़ाते तो हैं, लेकिन लड़के वालों से उसकी बी.ए. की पढ़ाई छिपाते हैं। वे डरते हैं कि यदि लड़के वालों को पता चल गया कि उमा अधिक पढ़ी-लिखी है, तो रिश्ता टूट जाएगा।
4. प्रेमा की सोच: प्रेमा कहती हैं कि उनकी समझ में पढ़ाई-लिखाई के ये जंजाल नहीं आते। इससे पता चलता है कि वे भी लड़कियों की अधिक पढ़ाई को आवश्यक नहीं मानतीं।
मेरी समझ: मेरे विचार से यह भिन्नता समाज की रूढ़िवादी मानसिकता को दिखाती है। उस समय लड़कों को आगे बढ़ाने और लड़कियों को घर तक सीमित रखने की सोच प्रचलित थी। लड़कों की शिक्षा को सम्मान माना जाता था, जबकि लड़कियों की शिक्षा को समस्या समझा जाता था। यह सोच गलत है, क्योंकि शिक्षा लड़का-लड़की दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक है। शिक्षा व्यक्ति को आत्मविश्वास, विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता देती है।
प्रश्न 2: “मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
एकांकी में उमा अपने अधिकार और विचार खुलकर व्यक्त करती है। इससे उमा के व्यक्तित्व के विषय में क्या-क्या पता चलता है? आपके विचार से उसके व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ कैसे आई होंगी?
उमा के इस कथन से उसके व्यक्तित्व की कई विशेषताएँ सामने आती हैं।
1. स्वाभिमानी: उमा अपने सम्मान को बहुत महत्त्व देती है। वह यह स्वीकार नहीं करती कि उसे विवाह के नाम पर वस्तु की तरह परखा जाए।
2. साहसी: वह लड़के वालों के सामने बिना डरे सच बोलती है। वह गोपालप्रसाद और शंकर की गलत सोच का खुलकर विरोध करती है।
3. शिक्षित और विचारशील: उमा बी.ए. पास है। उसकी शिक्षा ने उसे सही-गलत समझने की शक्ति दी है। वह जानती है कि लड़कियों की शिक्षा अपराध नहीं, बल्कि अधिकार है।
4. स्पष्टवादी: उमा घुमा-फिराकर बात नहीं करती। वह साफ कहती है कि उसने कॉलेज में पढ़ाई की है और यह कोई पाप या चोरी नहीं है।
5. अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली: जब उसे अपमानित किया जाता है, तो वह चुप नहीं रहती। वह लड़कियों को वस्तु समझने वाली मानसिकता का विरोध करती है।
ये विशेषताएँ कैसे आई होंगी?
मेरे विचार से उमा के व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ उसकी शिक्षा और अनुभवों से आई होंगी। शिक्षा ने उसे आत्मबल और स्वतंत्र सोच दी। परिवार में उसे पढ़ने का अवसर मिला, इसलिए वह अपने अधिकारों को समझ सकी। साथ ही समाज में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को देखकर उसके भीतर विरोध की भावना पैदा हुई होगी। यही कारण है कि वह अपने सम्मान के लिए खड़ी होती है और रूढ़िवादी सोच को चुनौती देती है।
एकांकी का विस्तार
प्रश्न 1. एकांकी के अंत में रतन कहता है— “बाबूजी, मक्खन...” और परदा गिर जाता है। लेखक ने इस संवाद से एकांकी का अंत क्यों किया होगा?
लेखक ने “बाबूजी, मक्खन!” संवाद से एकांकी का अंत हास्य और व्यंग्य पैदा करने के लिए किया है। पूरे घर में लड़के वालों के स्वागत के लिए तैयारी हो रही थी। मक्खन न आने पर रामस्वरूप बहुत परेशान थे, क्योंकि वे मेहमानों को खुश करना चाहते थे। लेकिन अंत में जब रिश्ता टूट जाता है, गोपालप्रसाद और शंकर चले जाते हैं, उमा रोने लगती है, तब रतन मक्खन लेकर आता है।
यह स्थिति हास्यास्पद भी है और व्यंग्यपूर्ण भी। जिस मक्खन की चिंता पहले बहुत बड़ी लग रही थी, वह अब बिल्कुल बेकार हो गया। इससे लेखक दिखाते हैं कि समाज में लोग दिखावे, नाश्ते और बाहरी सजावट को ज्यादा महत्व देते हैं, लेकिन लड़की के आत्मसम्मान और विचारों को समझने की कोशिश नहीं करते। इसलिए यह अंत एक तीखी टिप्पणी की तरह है।
प्रश्न 2. एकांकी में यदि परदा दोबारा उठ जाए तो अगला दृश्य क्या होगा? अनुमान लगाइए और लिखिए।
यदि परदा दोबारा उठे, तो अगला दृश्य रामस्वरूप के घर का ही हो सकता है। गोपालप्रसाद और शंकर जा चुके हैं। कमरे में सन्नाटा है। उमा रो रही है। प्रेमा उसे समझा रही है और रामस्वरूप चुपचाप बैठे हैं।
कुछ देर बाद रामस्वरूप उमा से कहते हैं कि उन्हें समाज के डर से उसकी शिक्षा छिपानी पड़ी। उमा कहती है कि शिक्षा छिपाने की वस्तु नहीं है और विवाह के लिए लड़की का आत्मसम्मान बेचना ठीक नहीं है। प्रेमा भी धीरे-धीरे समझती है कि उमा ने गलत नहीं किया। वह कहती है कि बेटी ने अपना मान बचाया है।
अंत में रामस्वरूप को अपनी गलती का एहसास होता है। वे कहते हैं कि अब वे उमा की शिक्षा और व्यक्तित्व पर गर्व करेंगे और किसी ऐसे रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे जहाँ लड़की को वस्तु की तरह देखा जाए। इस प्रकार अगला दृश्य आत्मबोध और परिवर्तन का दृश्य हो सकता है।
व्याकरण की बात
मेरे शब्द
नीचे पाँच नए शब्द, उनके वाक्य, अनुमानित अर्थ और शब्दकोश के अनुसार अर्थ दिए गए हैं—
| शब्द | पाठ में/नया वाक्य | मेरा अनुमानित अर्थ | शब्दकोश के अनुसार अर्थ |
|---|---|---|---|
| दकियानूसी | गोपालप्रसाद के विचार दकियानूसी थे। | पुराने विचारों वाला | पुराने और रूढ़िवादी विचारों वाला |
| तकल्लुफ | मेहमानों के सामने बहुत तकल्लुफ किया गया। | दिखावा | बनावटी शिष्टाचार |
| फितरती | वह फितरती आदमी सबको अपनी बातों में फँसा लेता है। | चालाक | चालबाज, स्वभाव से चतुर |
| निहायत | उमा निहायत साहसी लड़की थी। | बहुत ज्यादा | अत्यधिक, बहुत |
| जायचा | विवाह से पहले जायचा मिलाने की बात हुई। | जन्मपत्री | जन्मपत्री, कुंडली |
भाषा में मुहावरे
1. “उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है— खाली हाथ।”
मुहावरा: भीगी बिल्ली की तरह अर्थ: डरकर या दबकर रहना। नया वाक्य: गलती करने के बाद मोहन शिक्षक के सामने भीगी बिल्ली की तरह खड़ा था।
2. “लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।”
मुहावरा: मुँह फुलाना अर्थ: नाराज होना। नया वाक्य: खिलौना न मिलने पर बच्चा मुँह फुलाकर बैठ गया।
3. “और तुम उसकी माँ, किस मर्ज की दवा हो?”
मुहावरा: किस मर्ज की दवा होना अर्थ: किसी काम का होना / समस्या का समाधान होना। नया वाक्य: यदि तुम मेरी मदद ही नहीं कर सकते, तो फिर किस मर्ज की दवा हो?
4. “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”
मुहावरा: सिर चढ़ाना अर्थ: बहुत अधिक छूट देना। नया वाक्य: बच्चों को इतना सिर मत चढ़ाओ कि वे बड़ों की बात ही न मानें।
5. “मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो।”
मुहावरा: सब-कुछ उगल देना अर्थ: सारी बात बता देना। नया वाक्य: पूछताछ में चोर ने सब-कुछ उगल दिया।
6. “यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे।”
मुहावरा: काँटों में घसीटना अर्थ: मुश्किल में डालना। नया वाक्य: बिना तैयारी के मुझे भाषण देने को कहकर तुमने मुझे काँटों में घसीट दिया।
7. “बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”
मुहावरा: इज्जत उतारना अर्थ: अपमान करना। नया वाक्य: सभा में किसी की इज्जत उतारना उचित नहीं है।
8. “लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
मुहावरा: मुँह छिपाकर भागना अर्थ: शर्मिंदा होकर भाग जाना। नया वाक्य: चोरी पकड़े जाने पर वह मुँह छिपाकर भाग गया।
संदर्भ में शब्द
प्रश्न: “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।” इस कहावत का प्रयोग सकारात्मक अर्थ में वाक्य बनाकर कीजिए।
मेरे पिता पढ़ाई में हमेशा प्रथम आते थे, लेकिन मेरे भाई ने तो पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सच है— बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।
जब बेटा अच्छे गुणों में पिता से भी आगे निकल जाए, तब यह कहावत सकारात्मक अर्थ में प्रयोग की जाती है।
गतिविधियाँ
आप भी संवाददाता
प्रश्न 1. मान लीजिए कि आप एक संवाददाता हैं और आपको उमा की कहानी का पता चलता है। अब आप उमा तथा अन्य पात्रों का साक्षात्कार लेकर उनका पक्ष दर्शकों के सामने प्रस्तुत कीजिए।
संवाददाता: नमस्कार दर्शकों! आज हम आपके सामने उमा की कहानी लेकर आए हैं। उमा एक शिक्षित और स्वाभिमानी युवती है, जिसने विवाह के नाम पर अपने अपमान को सहन नहीं किया। आइए, सबसे पहले उमा से बात करते हैं।
संवाददाता: उमा जी, आपने लड़के वालों के सामने विरोध क्यों किया? उमा: क्योंकि वे मुझे एक इंसान नहीं, बल्कि वस्तु की तरह परख रहे थे। वे मेरी पढ़ाई को दोष मान रहे थे। मैंने बी.ए. पास किया है, कोई अपराध नहीं किया।
संवाददाता: क्या आपको डर नहीं लगा कि रिश्ता टूट जाएगा? उमा: आत्मसम्मान से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता। ऐसा रिश्ता किस काम का जिसमें लड़की के विचारों और शिक्षा का सम्मान न हो?
संवाददाता: बाबू रामस्वरूप जी, आप क्या कहना चाहेंगे? रामस्वरूप: मुझे स्वीकार है कि मैंने समाज के दबाव में उमा की शिक्षा छिपाई। अब मुझे समझ में आया कि बेटी की शिक्षा पर गर्व करना चाहिए, उसे छिपाना नहीं चाहिए।
संवाददाता: प्रेमा जी, आपकी क्या राय है? प्रेमा: पहले मुझे लगता था कि लड़कियों की अधिक पढ़ाई से समस्या होती है, लेकिन आज समझ में आया कि पढ़ाई से लड़की में आत्मबल आता है।
संवाददाता: गोपालप्रसाद जी, आप ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू क्यों नहीं चाहते थे? गोपालप्रसाद: मुझे लगता था कि अधिक पढ़ी-लिखी लड़की घर नहीं संभाल पाएगी। लेकिन शायद हमारी सोच पुरानी थी।
संवाददाता: दर्शकों, उमा की कहानी हमें सिखाती है कि लड़कियों की शिक्षा और आत्मसम्मान का आदर करना चाहिए।
प्रश्न 2. मान लीजिए कि आप उमा के घर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं जब उसके घर में शंकर आया था। इस पूरे घटनाक्रम को जीवंत प्रसारण यानी लाइव रिपोर्ट की तरह प्रस्तुत कीजिए।
लाइव रिपोर्ट: नमस्कार दर्शकों! मैं इस समय बाबू रामस्वरूप के घर से सीधा प्रसारण कर रहा हूँ। यहाँ आज उनकी बेटी उमा को देखने के लिए गोपालप्रसाद और उनके पुत्र शंकर आए हैं। घर में सुबह से तैयारी चल रही है। कमरे में तख्त, चादर, सितार और नाश्ते की व्यवस्था की गई है।
अभी गोपालप्रसाद और शंकर कमरे में बैठे हैं। बातचीत में गोपालप्रसाद ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहिए। वे लड़कों और लड़कियों की पढ़ाई को अलग-अलग मानते हैं।
अब उमा कमरे में आई है। वह सादे कपड़ों में है और चश्मा लगाए हुए है। गोपालप्रसाद और शंकर उसके चश्मे को देखकर चौंक गए हैं। अब उमा से गाना गाने को कहा गया है। उमा ने बहुत सुंदर गीत गाया है।
लेकिन स्थिति अचानक बदल गई है। गोपालप्रसाद उमा से कई सवाल पूछ रहे हैं। उमा अब चुप नहीं रही। उसने साफ कहा है कि लड़कियाँ कोई कुर्सी-मेज नहीं हैं जिन्हें खरीदार की तरह परखा जाए। उसने यह भी बताया है कि वह बी.ए. पास है।
अब माहौल तनावपूर्ण हो गया है। गोपालप्रसाद गुस्से में उठ गए हैं। वे कह रहे हैं कि उनसे धोखा किया गया। उमा ने शंकर की नैतिक कमजोरी पर भी सवाल उठाया है और कहा है कि घर जाकर देखिए कि आपके बेटे में रीढ़ की हड्डी है या नहीं।
गोपालप्रसाद और शंकर घर से जा चुके हैं। उमा भावुक हो गई है। इसी बीच रतन मक्खन लेकर आया है। यह घटना समाज की रूढ़िवादी सोच पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। कैमरा पर्सन के साथ, मैं आपका संवाददाता, उमा के घर से।
भाषा संगम
वाक्य
“मक्खन वाले की दुकान दूर है।”
‘मक्खन’ शब्द अलग-अलग भाषाओं में
| भाषा | शब्द |
|---|---|
| हिंदी | मक्खन |
| संस्कृत | नवनीतम् |
| पंजाबी | मक्खण |
| उर्दू | मक्खन |
| कश्मीरी | ठॅन्य |
| सिंधी | मखुण |
| मराठी | लोणी |
| गुजराती | माखण / नवनीत |
| कोंकणी | लोणी |
| नेपाली | नौनी / माखन |
| बांग्ला | माखन / ननी |
| असमिया | माखन |
| मणिपुरी | माखोन |
| ओड़िआ | लहुणी / मक्खन |
| तेलुगु | वेन्नै / वेन्ना |
| तमिल | वेर्ण्टय् / वेण्णै |
| मलयालम | वेण्ण |
| कन्नड़ | वेण्णे |
अन्य भाषा में ‘मक्खन’
अंग्रेज़ी: Butter वाक्य: The butter shop is far away.
अपनी मातृभाषा में वाक्य
हिंदी में: मक्खन वाले की दुकान दूर है। सरल बोलचाल में: मक्खन की दुकान बहुत दूर है।