कक्षा 7 जिज्ञासा अध्याय 9 के संपूर्ण नोट्स में मनुष्य और अन्य जंतुओं में पोषण, पाचन, अवशोषण, श्वसन, गैसों का विनिमय तथा प्रमुख अंग-तंत्र समझिए।
परिचय
सजीवों के शरीर में जीवन को बनाए रखने के लिए अनेक आवश्यक क्रियाएँ लगातार होती रहती हैं। इन क्रियाओं को सामूहिक रूप से जैव प्रक्रम कहा जाता है।
पोषण, परिसंचरण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन प्रमुख जैव प्रक्रम हैं।
इस अध्याय में हम मुख्य रूप से दो जैव प्रक्रमों का अध्ययन करेंगे—
- जंतुओं में पोषण
- जंतुओं में श्वसन
जंतु अलग-अलग प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं। उदाहरण के लिए—
- मधुमक्खियाँ और शकरखोरा पक्षी फूलों का मकरंद चूसते हैं।
- मानव शिशु और अन्य जंतुओं के शावक अपनी माँ का दूध पीते हैं।
- अजगर जैसे सर्प अपने शिकार को पूरा निगल लेते हैं।
- कुछ जलीय जंतु पानी में उपस्थित भोजन के छोटे-छोटे कणों को छानकर खाते हैं।
सभी जंतु भोजन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इस ऊर्जा की सहायता से वे चलने, दौड़ने, बढ़ने, शरीर की मरम्मत करने और अन्य जैव प्रक्रमों को पूरा करने में सक्षम होते हैं।
भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा जैसे जटिल घटक होते हैं। शरीर इन जटिल घटकों का सीधे उपयोग नहीं कर सकता। इसलिए इन्हें सरल पदार्थों में तोड़ा जाता है।
जटिल भोजन-घटकों को सरल और शरीर द्वारा उपयोग किए जा सकने वाले पदार्थों में बदलने की प्रक्रिया पाचन कहलाती है।
9.1 जंतुओं में पोषण
पोषण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई जीव भोजन ग्रहण करता है और उसका उपयोग ऊर्जा, वृद्धि, विकास तथा शरीर की मरम्मत के लिए करता है।
जंतुओं में भोजन का पाचन आहार नाल नामक एक लंबी नलिका में होता है। आहार नाल—
- मुख से प्रारंभ होती है
- गुदा पर समाप्त होती है
आहार नाल के विभिन्न भागों से पाचक रस स्रावित होते हैं। ये पाचक रस भोजन को सरल पदार्थों में बदल देते हैं। पचे हुए पोषक तत्व आहार नाल की दीवारों से अवशोषित होकर रक्त में पहुँच जाते हैं।
मानव आहार नाल के मुख्य भाग
मुख → ग्रासनली → आमाशय → क्षुद्रांत्र → बृहदांत्र → मलाशय → गुदा
पाचन में सहायता करने वाले दो प्रमुख संबद्ध अंग हैं—
- यकृत
- अग्न्याशय
9.1.1 मानव में पाचन
मानव में भोजन की यात्रा मुख से प्रारंभ होती है और आहार नाल के विभिन्न भागों से गुजरते हुए गुदा पर समाप्त होती है।
मुख गुहा से भोजन यात्रा का आरंभ
भोजन जैसे ही मुख में प्रवेश करता है, उसका पाचन शुरू हो जाता है। मुख में मुख्य रूप से दाँत, जीभ और लार भोजन के पाचन में सहायता करते हैं।

दाँतों का कार्य
हमारे दाँत भोजन को—
- काटते हैं,
- कुचलते हैं,
- चबाते हैं,
- छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं।
भोजन को दाँतों द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने की प्रक्रिया यांत्रिक पाचन कहलाती है।
भोजन के छोटे टुकड़े बन जाने से पाचक रस उस पर अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर पाते हैं।
जीभ का कार्य
जीभ—
- भोजन को लार के साथ मिलाती है।
- भोजन को चबाने में सहायता करती है।
- भोजन के स्वाद का अनुभव कराती है।
- चबाए हुए भोजन को निगलने के लिए पीछे की ओर धकेलती है।
लार का कार्य
मुख में स्थित लार ग्रंथियों से लार निकलती है। भोजन को देखने, सूँघने या उसके विषय में सोचने पर भी मुख में लार का स्राव बढ़ सकता है।
लार के दो प्रमुख कार्य हैं—
- भोजन को गीला और नरम बनाना
- मंड का पाचन प्रारंभ करना
रोटी, चावल और आलू जैसे खाद्य पदार्थों में मंड पाया जाता है। मंड एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है।
लार में उपस्थित पाचक रस मंड को सरल शर्करा में बदलने में सहायता करता है।
इसी कारण रोटी या चावल को 30–60 सेकंड तक चबाने पर उसका स्वाद हल्का मीठा लगने लगता है।
मंड पर लार की क्रिया
यदि बिना चबाए उबले चावल में आयोडीन विलयन डाला जाए, तो वह नीला-काला हो जाता है। यह मंड की उपस्थिति को दर्शाता है।
चबाए हुए चावल में आयोडीन डालने पर—
- नीला-काला रंग नहीं बनता, या
- बहुत हल्का नीला-काला रंग बनता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लार मंड के एक बड़े भाग को सरल शर्करा में बदल देती है।
मुख की स्वच्छता
मुख और दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए—
- दिन में दो बार दाँत साफ करने चाहिए।
- जीभ साफ करनी चाहिए।
- प्रत्येक भोजन के बाद कुल्ला करना चाहिए।
- मीठे खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में नहीं खाने चाहिए।
- नियमित रूप से दाँतों की जाँच करानी चाहिए।
मुख की स्वच्छता दंत क्षय और मुख की दुर्गंध से बचाती है।
भोजन नली (ग्रासनली) — मुख से आमाशय तक का पथ

चबाया हुआ भोजन लार के कारण गीला, मुलायम और निगलने योग्य बन जाता है। जीभ इसे पीछे की ओर धकेलती है और यह एक लंबी एवं लचीली नलिका में प्रवेश करता है, जिसे ग्रासनली या भोजन नली कहते हैं।
ग्रासनली मुख को आमाशय से जोड़ती है।
ग्रासनली की दीवारें बारी-बारी से—
- सिकुड़ती हैं,
- शिथिल होती हैं।
इस लहरदार गति से भोजन नीचे की ओर आमाशय में पहुँचता है।
आहार नाल की दीवारों के क्रमिक संकुचन और शिथिलन से भोजन को आगे धकेलने वाली गति को क्रमाकुंचन गति कहा जाता है।
यह गति केवल ग्रासनली में ही नहीं, बल्कि आहार नाल के अन्य भागों में भी होती है।
आमाशय
आमाशय एक थैलीनुमा पेशीय अंग है। इसकी दीवारें सिकुड़ती और शिथिल होती हैं, जिससे भोजन का मंथन होता है।

आमाशय में भोजन वहाँ स्रावित होने वाले पदार्थों के साथ मिल जाता है। आमाशय से मुख्य रूप से तीन पदार्थ निकलते हैं—
- अम्ल
- पाचक रस
- श्लेष्मा
पाचक रस का कार्य
आमाशय का पाचक रस भोजन में उपस्थित प्रोटीन को अपेक्षाकृत सरल पदार्थों में तोड़ता है।
अम्ल का कार्य
आमाशय में स्रावित अम्ल—
- प्रोटीन के पाचन में सहायता करता है।
- भोजन के साथ आए अनेक हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
श्लेष्मा का कार्य
श्लेष्मा आमाशय की भीतरी दीवार को अम्ल से बचाता है।
यदि श्लेष्मा न हो, तो आमाशय का अम्ल उसकी दीवार को नुकसान पहुँचा सकता है।
आमाशय में भोजन—
- आंशिक रूप से पचता है।
- मथकर अर्धतरल रूप में बदल जाता है।
- इसके बाद क्षुद्रांत्र में प्रवेश करता है।
क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)

आमाशय से आंशिक रूप से पचा हुआ भोजन क्षुद्रांत्र में पहुँचता है।
इसे छोटी आँत कहा जाता है, परंतु—
क्षुद्रांत्र लगभग 6 मीटर लंबी होती है और यह आहार नाल का सबसे लंबा भाग है।
क्षुद्रांत्र में—
- भोजन का अधिकांश पाचन पूरा होता है।
- पचे हुए पोषक तत्वों का अवशोषण होता है।
क्षुद्रांत्र को पाचक स्राव तीन स्रोतों से प्राप्त होते हैं—
- यकृत से
- अग्न्याशय से
- क्षुद्रांत्र की अपनी भित्तियों से
यकृत और पित्तरस
यकृत शरीर की एक बड़ी ग्रंथि है। इससे पित्तरस का स्राव होता है।
पित्तरस थोड़ा क्षारीय होता है। इसके प्रमुख कार्य हैं—
- आमाशय से आए अम्लीय भोजन को उदासीन करना।
- वसा को छोटी-छोटी गोलिकाओं में तोड़ना।
- वसा के पाचन को सरल बनाना।
पित्तरस वसा को छोटी गोलिकाओं में तोड़ता है, परंतु स्वयं वसा को पूरी तरह नहीं पचाता।
अग्न्याशय और अग्न्याशयी रस
अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस निकलता है। यह क्षारीय प्रकृति का होता है।
अग्न्याशयी रस—
- भोजन में उपस्थित अम्ल को उदासीन करता है।
- कार्बोहाइड्रेट को सरल पदार्थों में तोड़ता है।
- प्रोटीन के पाचन में सहायता करता है।
- वसा के पाचन में सहायता करता है।
क्षुद्रांत्र का पाचक रस
क्षुद्रांत्र की दीवारों से भी पाचक रस निकलता है। यह—
- आंशिक रूप से पचे कार्बोहाइड्रेट को सरल शर्करा में,
- प्रोटीन को सरल पदार्थों में,
- वसा को सरल पदार्थों में बदलता है।
पोषकों का अवशोषण
पचे हुए पोषक तत्वों का क्षुद्रांत्र की दीवारों से रक्त में प्रवेश करना अवशोषण कहलाता है।
क्षुद्रांत्र की भीतरी दीवार—

- बहुत पतली होती है।
- उस पर अँगुली जैसे हजारों छोटे उभार पाए जाते हैं।
इन उभारों को सामान्यतः आंत्रांकुर या विल्ली कहा जाता है।
आंत्रांकुर—
- क्षुद्रांत्र का सतही क्षेत्रफल बढ़ाते हैं।
- पोषक तत्वों के अवशोषण को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
- पचे हुए पोषकों को रक्त में पहुँचाते हैं।
रक्त इन पोषकों को शरीर के विभिन्न भागों तक ले जाता है। वहाँ इनका उपयोग—
- ऊर्जा प्राप्त करने,
- वृद्धि करने,
- शरीर की मरम्मत करने,
- शरीर को स्वस्थ रखने में होता है।
बृहदांत्र (बड़ी आँत)
क्षुद्रांत्र में अधिकांश पोषक तत्वों का पाचन और अवशोषण होने के बाद बचा हुआ अपचा भोजन बृहदांत्र में पहुँचता है।
बृहदांत्र लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है।
यह क्षुद्रांत्र से लंबाई में छोटी होती है, लेकिन चौड़ाई में अधिक होती है। इसी कारण इसे बड़ी आँत कहा जाता है।
बृहदांत्र के कार्य
बृहदांत्र—
- अपचे भोजन में से अधिकांश जल का अवशोषण करती है।
- कुछ लवणों का अवशोषण करती है।
- शेष अपशिष्ट को अर्धठोस बनाती है।
इस अर्धठोस अपशिष्ट को मल कहते हैं।
मल बृहदांत्र के निचले भाग में एकत्रित होता है। इस भाग को मलाशय कहते हैं।
अंत में मल को गुदा के द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
शरीर से अपचा और अनुपयोगी भोजन बाहर निकालने की प्रक्रिया बहिःक्षेपण कहलाती है।
रेशेदार भोजन का महत्व
फल, सब्जियाँ और साबुत अनाज में रेशे या फाइबर पाए जाते हैं।
रेशेदार भोजन—
- बड़ी आँत को सुचारु रूप से कार्य करने में सहायता करता है।
- मल को आगे बढ़ाने में सहायता करता है।
- मल त्याग को सरल बनाता है।
- कब्ज से बचाने में सहायक होता है।
बृहदांत्र में अनेक उपयोगी सूक्ष्मजीव भी पाए जाते हैं। ये—
- अपचे भोजन और रेशों को विघटित करते हैं।
- कुछ आवश्यक पोषक पदार्थ बनाते हैं।
- पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायता करते हैं।
दही, छाछ और अन्य किण्वित खाद्य पदार्थ पाचन तंत्र के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
भोजन की पूरी यात्रा
भोजन → मुख → ग्रासनली → आमाशय → क्षुद्रांत्र → बृहदांत्र → मलाशय → गुदा
9.1.2 क्या सभी जंतुओं में भोजन का पाचन मनुष्यों की भाँति ही होता है?
नहीं, सभी जंतुओं में पाचन मनुष्यों की तरह नहीं होता।
जंतुओं के भोजन, शरीर की बनावट और जीवन-शैली के अनुसार उनके पाचन तंत्र में विभिन्न अनुकूलन पाए जाते हैं।
रोमंथी जंतुओं में पाचन
गाय, भैंस, बकरी और अन्य घास खाने वाले जंतु घास को जल्दी-जल्दी आंशिक रूप से चबाकर निगल लेते हैं।

भोजन उनके आमाशय के प्रथम भाग में पहुँचता है, जहाँ उसका आंशिक पाचन होता है। बाद में यह भोजन छोटे-छोटे भागों में वापस मुख में लाया जाता है और फिर से अच्छी तरह चबाया जाता है।
आंशिक रूप से पचे भोजन को वापस मुख में लाकर दोबारा चबाने की प्रक्रिया रोमंथन कहलाती है।
रोमंथन करने वाले जंतुओं को रोमंथी जंतु कहते हैं।
उदाहरण—
- गाय
- भैंस
- बकरी
गाय प्रतिदिन लगभग 8 घंटे भोजन चबाने में लगा सकती है।
पक्षियों में पाचन

पक्षियों के दाँत नहीं होते। इसलिए वे भोजन को मनुष्यों की तरह दाँतों से नहीं चबा सकते।
पक्षियों के आमाशय में एक माँसपेशीय प्रकोष्ठ होता है, जिसे पेषणी या गिजार्ड कहते हैं।
पक्षी प्रायः भोजन के साथ छोटे कंकड़ और बजरी भी निगल लेते हैं।
पेषणी—
- संकुचित और शिथिल होती है।
- भोजन को पीसती है।
- निगले गए कंकड़ों की सहायता से भोजन को छोटे टुकड़ों में तोड़ती है।
इस प्रकार विभिन्न जंतुओं का पाचन तंत्र उनके भोजन के अनुसार अनुकूलित होता है।
9.2 जंतुओं में श्वसन
पचे हुए भोजन से प्राप्त पोषक तत्व शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाए जाते हैं। कुछ पोषक शरीर की वृद्धि और मरम्मत में काम आते हैं। शर्करा जैसे पोषक तत्वों से ऊर्जा प्राप्त की जाती है।
पोषक तत्वों से उपयोगी ऊर्जा मुक्त करने की प्रक्रिया श्वसन कहलाती है।
सभी सजीव श्वसन करते हैं। श्वसन के लिए सामान्यतः—
- भोजन से प्राप्त ग्लूकोस
- वातावरण से प्राप्त ऑक्सीजन
की आवश्यकता होती है।
श्वसन का शब्द समीकरण
ग्लूकोस + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा
इस प्रक्रिया में उत्पन्न ऊर्जा से हम—
- चलते हैं,
- दौड़ते हैं,
- खेलते हैं,
- पढ़ते हैं,
- सोचते हैं,
- शरीर के अन्य कार्य करते हैं।
9.2.1 मनुष्यों में श्वसन
मनुष्य निरंतर श्वास लेते और छोड़ते रहते हैं।
- वायु को शरीर के अंदर लेना अंतःश्वसन कहलाता है।
- वायु को शरीर से बाहर निकालना उच्छ्वसन कहलाता है।
श्वास लेने की प्रक्रिया से हम ऑक्सीजन प्राप्त करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं।
हम श्वास कैसे लेते हैं?
वायु को शरीर के अंदर लेने और बाहर निकालने की प्रक्रिया श्वास लेना कहलाती है।
मनुष्य कुछ समय तक भोजन या पानी के बिना रह सकता है, लेकिन श्वास लिए बिना केवल कुछ मिनट ही जीवित रह सकता है।
श्वास लेने के लिए शरीर में एक विशेष तंत्र होता है, जिसे श्वसन तंत्र कहते हैं।

मानव श्वसन तंत्र के प्रमुख भाग
- नासाद्वार
- नासा पथ
- श्वासनली
- फेफड़े
- कूपिकाएँ
- पसली पिंजर
- डायाफ्राम
नासाद्वार
श्वसन तंत्र का आरंभ नासाद्वार से होता है। वायु नासाद्वार से शरीर में प्रवेश करती और बाहर निकलती है।
नासा पथ
नासाद्वार से वायु नासा पथ में प्रवेश करती है। नासा पथ में—
- सूक्ष्म रोम होते हैं।
- श्लेष्मा पाया जाता है।
रोम और श्लेष्मा मिलकर—
- धूल,
- गंदगी,
- कुछ हानिकारक कणों को रोकते हैं।
इसलिए मुँह की अपेक्षा नाक से श्वास लेना अधिक सुरक्षित होता है।
श्वासनली
नासा पथ से वायु श्वासनली में जाती है। श्वासनली आगे दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है। एक शाखा दाएँ फेफड़े और दूसरी बाएँ फेफड़े में जाती है।
फेफड़ों में ये शाखाएँ और अधिक छोटी तथा महीन शाखाओं में बँट जाती हैं।
कूपिकाएँ
फेफड़ों की महीन शाखाओं के सिरों पर छोटे गुब्बारों जैसे कोष होते हैं, जिन्हें कूपिकाएँ कहते हैं।
कूपिकाओं में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का विनिमय होता है।
फेफड़े पसली पिंजर के अंदर सुरक्षित रहते हैं।
डायाफ्राम
डायाफ्राम फेफड़ों के नीचे स्थित एक गुंबदाकार पेशी है।
यह अंतःश्वसन और उच्छ्वसन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अंतःश्वसन की प्रक्रिया
जब हम श्वास अंदर लेते हैं—

- पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर गति करती हैं।
- डायाफ्राम नीचे की ओर जाता है।
- वक्ष गुहा का आकार बढ़ जाता है।
- फेफड़ों के लिए अधिक स्थान बनता है।
- बाहर की वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।
वक्ष गुहा का विस्तार होने से वायु फेफड़ों में खिंचती है।
उच्छ्वसन की प्रक्रिया
जब हम श्वास बाहर छोड़ते हैं—
- पसलियाँ नीचे और अंदर की ओर आती हैं।
- डायाफ्राम ऊपर की ओर अपनी पूर्व स्थिति में आता है।
- वक्ष गुहा का आकार कम हो जाता है।
- फेफड़ों से वायु बाहर निकल जाती है।
वक्ष गुहा का आकार कम होने से वायु फेफड़ों से बाहर धकेली जाती है।
श्वास लेने का मॉडल

श्वास लेने के मॉडल में—
- बोतल वक्ष गुहा को दर्शाती है।
- दो गुब्बारे फेफड़ों को दर्शाते हैं।
- वाई आकार की नली श्वासनली और उसकी शाखाओं को दर्शाती है।
- नीचे लगी रबर शीट डायाफ्राम को दर्शाती है।
रबर शीट को नीचे खींचने पर गुब्बारे फूलते हैं। यह अंतःश्वसन को दर्शाता है।
रबर शीट को ऊपर छोड़ने पर गुब्बारे पिचकते हैं। यह उच्छ्वसन को दर्शाता है।
हम श्वास के द्वारा क्या छोड़ते हैं?

हमारे द्वारा छोड़ी गई वायु में अंतःश्वसित वायु की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है।
इसे चूने के पानी के प्रयोग से सिद्ध किया जा सकता है।
जब उच्छ्वसित वायु को चूने के पानी में प्रवाहित किया जाता है, तो चूने का पानी दूधिया हो जाता है।
चूने का पानी कार्बन डाइऑक्साइड के संपर्क में आने पर दूधिया हो जाता है।
इससे सिद्ध होता है कि—
उच्छ्वसित वायु में अंतःश्वसित वायु की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है।
अंतःश्वसित और उच्छ्वसित वायु
अंतःश्वसित वायु में

- लगभग 21% ऑक्सीजन
- लगभग 0.04% कार्बन डाइऑक्साइड
उच्छ्वसित वायु में
- लगभग 16–17% ऑक्सीजन
- लगभग 4–5% कार्बन डाइऑक्साइड
इससे पता चलता है कि—
- शरीर अंतःश्वसित वायु की सारी ऑक्सीजन का उपयोग नहीं करता।
- उच्छ्वसित वायु में भी कुछ ऑक्सीजन बची रहती है।
- उच्छ्वसित वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है।
गैसों का विनिमय कैसे होता है?
गैसों का विनिमय फेफड़ों की कूपिकाओं में होता है।
कूपिकाओं की विशेषताएँ—

- इनकी दीवारें बहुत पतली होती हैं।
- इनके चारों ओर महीन रक्त-वाहिकाओं का जाल होता है।
- इनमें बड़ी संख्या में गैसों का विनिमय होता है।
ऑक्सीजन का परिवहन
कूपिकाओं में उपस्थित वायु से—
- ऑक्सीजन कूपिकाओं की पतली दीवार पार करती है।
- ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करती है।
- रक्त ऑक्सीजन को शरीर के सभी भागों तक पहुँचाता है।
कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन
शरीर की कोशिकाओं में श्वसन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड बनती है।
रक्त—
- कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर के भागों से फेफड़ों तक लाता है।
- इसे कूपिकाओं में छोड़ता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड उच्छ्वसन के समय बाहर निकल जाती है।
कूपिकाओं में ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करती है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त से बाहर निकलती है।
श्वास लेना और श्वसन में अंतर
| श्वास लेना | श्वसन |
|---|---|
| यह एक शारीरिक प्रक्रिया है। | यह एक रासायनिक प्रक्रिया है। |
| इसमें वायु शरीर के अंदर और बाहर जाती है। | इसमें ग्लूकोस ऑक्सीजन की सहायता से विघटित होता है। |
| इसमें अंतःश्वसन और उच्छ्वसन सम्मिलित हैं। | इसमें ऊर्जा मुक्त होती है। |
| इसका प्रमुख संबंध फेफड़ों से है। | यह शरीर की कोशिकाओं में होता है। |
| इससे शरीर को ऑक्सीजन मिलती है। | इससे शरीर को उपयोगी ऊर्जा मिलती है। |
श्वास लेना और श्वसन अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन दोनों जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
परिसंचरण तंत्र की भूमिका
शरीर में पोषक तत्वों, ऑक्सीजन और अन्य पदार्थों के परिवहन के लिए परिसंचरण तंत्र होता है।
परिसंचरण तंत्र में—
- हृदय
- रक्त
- रक्त-वाहिकाएँ
सम्मिलित होती हैं।
हृदय रक्त को पंप करता है। रक्त—
- पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है।
- ऑक्सीजन को कोशिकाओं तक ले जाता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को एकत्रित करता है।
9.2.2 क्या अन्य जंतु भी मानवों की भाँति श्वास लेते हैं?
सभी जंतु श्वास लेते हैं, लेकिन सभी जंतुओं के श्वास लेने के अंग और तरीके समान नहीं होते।
जंतुओं का श्वसन तंत्र उनके—
- शरीर की बनावट,
- आवास,
- जीवन की अवस्था
के अनुसार अनुकूलित होता है।
फेफड़ों से श्वास लेने वाले जंतु
निम्न जंतु फेफड़ों से श्वास लेते हैं—
- पक्षी
- हाथी
- शेर
- गाय
- बकरी
- छिपकली
- साँप
इन सभी में फेफड़े पाए जाते हैं, लेकिन उनके फेफड़ों की संरचना एक समान नहीं होती।
मछली में श्वसन
मछली जल में रहती है। इसमें श्वास लेने के लिए विशेष अंग पाए जाते हैं, जिन्हें क्लोम या गलफड़े कहते हैं।

क्लोमों में अनेक रक्त-वाहिकाएँ होती हैं।
मछली—
- पानी में घुली ऑक्सीजन को ग्रहण करती है।
- क्लोमों द्वारा ऑक्सीजन रक्त में पहुँचाती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड को पानी में छोड़ती है।
मछलियाँ पानी में घुली ऑक्सीजन को क्लोमों की सहायता से ग्रहण करती हैं।
मेंढक में श्वसन
मेंढक एक उभयचर जंतु है। यह जल और थल दोनों पर रह सकता है।
मेंढक अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अलग-अलग अंगों से श्वास लेता है।
- टैडपोल जल में क्लोमों से श्वास लेता है।
- वयस्क मेंढक थल पर फेफड़ों से श्वास लेता है।
- वयस्क मेंढक जल में अपनी त्वचा से गैसों का विनिमय करता है।
यह अनुकूलन उसे जल और थल दोनों में जीवित रहने में सहायता करता है।
केंचुए में श्वसन
केंचुए के फेफड़े या क्लोम नहीं होते।
केंचुआ अपनी नम त्वचा के द्वारा ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान करता है।
केंचुए की त्वचा का नम रहना आवश्यक है, क्योंकि गैसें नम त्वचा से ही आसानी से गुजर सकती हैं।
स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण बातें
पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के उपाय
- भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए।
- समय पर भोजन करना चाहिए।
- भूख से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए।
- फल, सब्जियाँ और साबुत अनाज खाना चाहिए।
- पर्याप्त जल पीना चाहिए।
- रेशेदार भोजन ग्रहण करना चाहिए।
- दही और छाछ जैसे किण्वित खाद्य पदार्थों को उचित मात्रा में लेना चाहिए।
- मुख और दाँतों की सफाई रखनी चाहिए।
श्वसन तंत्र को स्वस्थ रखने के उपाय
- नाक से श्वास लेना चाहिए।
- धूल और प्रदूषित वायु से बचना चाहिए।
- धूम्रपान से दूर रहना चाहिए।
- दूसरे व्यक्ति के धुएँ से भी बचना चाहिए।
- स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए।
- नियमित शारीरिक गतिविधि और उचित श्वसन अभ्यास किए जा सकते हैं।
धूम्रपान फेफड़ों को नुकसान पहुँचाता है और श्वसन रोगों का खतरा बढ़ाता है।
महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
जैव प्रक्रम
सजीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक शारीरिक क्रियाएँ जैव प्रक्रम कहलाती हैं।
पाचन
जटिल भोजन-घटकों को सरल और घुलनशील पदार्थों में बदलने की प्रक्रिया पाचन कहलाती है।
यांत्रिक पाचन
दाँतों द्वारा भोजन को काटने, कुचलने और छोटे टुकड़ों में बदलने की प्रक्रिया यांत्रिक पाचन कहलाती है।
अवशोषण
पचे हुए पोषक तत्वों का आहार नाल की दीवारों से रक्त में प्रवेश करना अवशोषण कहलाता है।
बहिःक्षेपण
अपचे और अनुपयोगी भोजन को गुदा द्वारा शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया बहिःक्षेपण कहलाती है।
रोमंथन
आंशिक रूप से पचे भोजन को वापस मुख में लाकर फिर से चबाने की प्रक्रिया रोमंथन कहलाती है।
श्वास लेना
वायु को शरीर के अंदर लेने और बाहर निकालने की प्रक्रिया श्वास लेना कहलाती है।
श्वसन
पोषक तत्वों के विघटन से उपयोगी ऊर्जा मुक्त करने की प्रक्रिया श्वसन कहलाती है।
अंतःश्वसन
वायु को शरीर के अंदर लेने की प्रक्रिया अंतःश्वसन कहलाती है।
उच्छ्वसन
वायु को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया उच्छ्वसन कहलाती है।
संक्षेप में
- पोषण, परिसंचरण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन सजीवों के आवश्यक जैव प्रक्रम हैं।
- जटिल भोजन को सरल पदार्थों में बदलने की प्रक्रिया पाचन कहलाती है।
- मानव पाचन तंत्र में मुख, ग्रासनली, आमाशय, क्षुद्रांत्र, बृहदांत्र, मलाशय और गुदा सम्मिलित होते हैं।
- यकृत और अग्न्याशय पाचन में सहायता करने वाले संबद्ध अंग हैं।
- मुख में दाँत भोजन का यांत्रिक पाचन करते हैं और लार मंड को सरल शर्करा में बदलने में सहायता करती है।
- ग्रासनली की दीवारों की लहरदार गति भोजन को आमाशय तक पहुँचाती है।
- आमाशय में अम्ल, पाचक रस और श्लेष्मा स्रावित होते हैं।
- आमाशय का पाचक रस प्रोटीन के पाचन में सहायता करता है और श्लेष्मा आमाशय की दीवार को अम्ल से बचाता है।
- क्षुद्रांत्र लगभग 6 मीटर लंबी होती है और आहार नाल का सबसे लंबा भाग है।
- क्षुद्रांत्र में भोजन का अधिकांश पाचन और पोषक तत्वों का अवशोषण होता है।
- यकृत से निकलने वाला पित्तरस अम्ल को उदासीन करता है और वसा को छोटी गोलिकाओं में तोड़ता है।
- अग्न्याशयी रस कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के पाचन में सहायता करता है।
- क्षुद्रांत्र के आंत्रांकुर अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल बढ़ाते हैं।
- बृहदांत्र अपचे भोजन में से जल और कुछ लवणों का अवशोषण करती है।
- मल मलाशय में एकत्रित होता है और गुदा द्वारा बाहर निकाला जाता है।
- गाय, भैंस और बकरी जैसे जंतु रोमंथी होते हैं।
- पक्षियों में भोजन को पीसने के लिए पेषणी या गिजार्ड होता है।
- ग्लूकोस + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा
- वायु को अंदर लेना अंतःश्वसन और बाहर निकालना उच्छ्वसन कहलाता है।
- मानव श्वसन तंत्र में नासाद्वार, नासा पथ, श्वासनली, फेफड़े, कूपिकाएँ और डायाफ्राम सम्मिलित हैं।
- अंतःश्वसन में पसलियाँ ऊपर-बाहर जाती हैं और डायाफ्राम नीचे जाता है।
- उच्छ्वसन में पसलियाँ नीचे-अंदर आती हैं और डायाफ्राम ऊपर आता है।
- फेफड़ों की कूपिकाओं में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का विनिमय होता है।
- अंतःश्वसित वायु में लगभग 21% ऑक्सीजन होती है, जबकि उच्छ्वसित वायु में लगभग 16–17% ऑक्सीजन बचती है।
- उच्छ्वसित वायु में अंतःश्वसित वायु की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है।
- श्वास लेना एक शारीरिक प्रक्रिया है, जबकि श्वसन एक रासायनिक प्रक्रिया है।
- मछलियाँ क्लोमों से, केंचुए नम त्वचा से और मेंढक अपनी अवस्था एवं आवास के अनुसार क्लोम, फेफड़े या त्वचा से श्वास लेते हैं।
- विभिन्न जंतुओं के पाचन और श्वसन के तरीके उनके भोजन तथा आवास के अनुरूप अनुकूलित होते हैं।
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